क्या अमेरिका के बिना नहीं चल पाएगा यूरोप... ग्रीनलैंड पर ट्रंप टैरिफ के बाद अब क्या होगा?

यूरोप आज के समय में पूरी तरह से अमेरिका पर ही निर्भर है. खासकर जबसे रूस की एनर्जी और तेल पर प्रतिबंध लगे हैं, तबसे यूरोप अमेरिका पर और भी ज्‍यादा निर्भर हो चुका है.

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अमेरिका पर निर्भर है यूरोप. (Photo: White House/X) अमेरिका पर निर्भर है यूरोप. (Photo: White House/X)

हिमांशु द्विवेदी

  • नई दिल्‍ली,
  • 18 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:33 PM IST

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप अब अपने सहयोगियों पर भी टैरिफ लगाने लगे हैं. ग्रीनलैंड को पाने की चाह में ट्रंप ने 8 यूरोप के देशों पर 10 फीसदी का टैर‍िफ लगा दिया है. ये देश नाटो का भी हिस्‍सा हैं. ट्रंप ने टैरिफ लगाने के साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका कई सालों से डेनमार्क समेत यूरोपीय संघ के सभी देशों की सुरक्षा करते आ रहा है, जिसके लिए उसने कुछ भी नहीं लिया. अब उनके लिए कर्ज चुकाने का टाइम आ गया है. 

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ट्रंप के इस बयान से एक सवाल उठता है कि ट्रंप इतने खुलकर यूरोप के कई देशों पर टैरिफ लगा दे रहे हैं और दूसरी ओर, यूरोपीय संघ कोई ठोस कदम नहीं उठाता है.  क्‍या यूरोप सच में अमेरिका पूरी तरह से निर्भर है और अगर ये सच है तो क्‍यों? इसका जवाब ढूढंने पर कई तरह के फैक्‍ट्स मिले, जो कहीं न कही इस सवाल को सही साबित करते हैं कि यूरोप अमेरिका के बिना क्‍यों नहीं चल पाएगा? 

सुरक्षा और नाटो 

सुरक्षा और नाटो संगठन की रीढ़ अमेरिका ही है,  क्‍योंकि नाटो की 70% से ज्‍यादा की सैन्‍य क्षमता अमेरिका देता है. साथ ही यूरोप की परमाणु सुरक्षा (Nuclear Deterrence) अमेरिका, ब्रिटेन और  फ्रांस पर ही टिकी हुई हैं. इसके अलावा, रूस जैसे देशों का मुकाबला करने के लिए मिसाइल डिफेंस, सैटेलाइट इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स अमेरिका के पास ही है. अगर अमेरिका यहां से हट जाए तो नाटो सिर्फ एक कागजी संगठन बनकर रह जाएगा. 

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हथियार और सैन्य टेक्नोलॉजी

यूरोप के पास टैंक, सैनिक क्षमता तो भरपूर है, लेकिन एयर डॉमिनेंस, ड्रोन वॉरफेयर, लॉन्ग-रेंज मिसाइल सिस्टम और ग्लोबल मिलिट्री लॉजिस्टिक्स जैसी चीजों की कमी है और इसकी डिमांड अमेरिका ही पूरा करता आ रहा है. यह चीजें आधुनिक जरूरत हैं. यूक्रेन युद्ध में भी यूरोप अमेरिका पर ही निर्भर रहा है . 

आर्थिक तौर पर भी यूरोप अमेरिका से कमजोर 

आर्थिक तौर पर भी अमेरिका यूरोप से लगभग 1.5 गुना ज्‍यादा है. जहां पूरे यूरोप को मिलाकर कुल अनुमानित अर्थव्‍यवस्‍था 2025 में 19.99 ट्रिलियन डॉलर है, तो वहीं अकेले अमेरिका की साल 2025 में अर्थव्‍यवस्‍था 30.5 ट्रिलियन डॉलर है. इसके साथ ही ज़्यादातर यूरोपीय देश GDP का 2% भी रक्षा पर खर्च नहीं करते. अगर अमेरिका हटता है तो यूरोप को रक्षा बजट 2 से 3 गुना बढ़ाना होगा, जिससे टैक्‍स बढ़ जाएगा और वेलफेयर खर्च कम हो जाएगा. 

ऊर्जा और सप्लाई चेन 

ऊर्जा को लेकर अब पूरी तरीके से यूरोप अमेरिका पर टिका हुआ है. खासकर जबसे रूस पर कई प्रतिबंध लागू हुए, तबसे अमेरिका की एनर्जी का सबसे बड़ा आयातक यूरोप ही बना हुआ है. यूरोप ने अमेरिका से LNG आयात कई गुना बढ़ा दिया है. जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड और इटली ने नए LNG टर्मिनल भी बनाए हैं और बड़ी मात्रा में अमेरिका से ये चीजें आयात कर रहे हैं. 

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क्रूड ऑयल के मामले में भी यूरोप अब अमेरिका की ओर ही देख रहा है. यूरोप का अमेरिका, नॉर्वे और मध्य-पूर्व से कच्चा तेल का आयात बढ़ा है. अमेरिका से यूरोप को जाने वाला क्रूड ऑयल निर्यात रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा चुका है. एनर्जी के साथ ही यूरोप हाईटेक चिप्‍स की सप्‍लाई के लिए भी अमेरिका पर निर्भर है. अमेरिका डिफेंस, AI, सैटेलाइट और मिसाइल सिस्टम के लिए जरूरी चिप्स प्रोवाइड कराता है. 

क्‍या कभी आत्‍मनिर्भर बन पाएगा यूरोप? 
एक्‍सपर्ट्स का कहना है कि अमेरिका पर से धीरे-धीरे निर्भरता कम करके यूरोप भी आत्‍मनिर्भर बन सकता है, जैसा की पहले था. हालांकि इसके लिए 15 से 20 साल लग सकते हैं और यूरोप को कुछ चीजों को प्राथमिकता से करना होगा. इसमें EU की संयुक्त सेना बनाना, रक्षा उद्योग में भारी निवेश, जर्मनी, फ्रांस नेतृत्व करें और अमेरिका के टेक्नोलॉजी निर्भरता घटाना शामिल है.  

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