मिडिल ईस्ट में युद्ध (Middle East War) और इससे तेल की कीमतों (Crude Oil Price) में लगी आग ने दुनिया के तमाम देशों को झुलसा दिया है. जैसे-जैसे जंग आगे बढ़ रही हैं, तेल संकट भी गहराता जा रहा है, जिससे ग्लोबल टेंशन चरम पर है. शुरुआत में जहां अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सीनियर लीडर्स और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा था, तो अब ये युद्ध एक तेल युद्ध (Oil War) में बदल चुका है और मिसाइलों के निशाने पर एनर्जी साइट्स हैं.
Iran War ने जहां भारत समेत दुनियाभर के शेयर बाजारों को हिलाया, तो वहीं विदेशी निवेशकों के सेंटीमेंट पर भी इसका बेहद बुरा असर हुआ है. FPIs का मूड ऐसा खराब हुआ कि इस महीने अब तक उन्होंने तगड़ी बिकवाली करते हुए भारतीय शेयर बाजारों से 88,000 करोड़ रुपये से ज्यादा निकाले हैं.
युद्ध के टेंशन में भागे विदेशी निवेशक
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में ताबड़तोड़ तेजी और इस बीच भारतीय करेंसी रुपये में गिरावट ने विदेशी निवेशकों के सेंटीमेंट खराब कर दिया. बीते महीने के आखिर में यानी 28 फरवरी को शुरू हुए मिडिल ईस्ट युद्ध से मार्च महीने में अब तक एफपीआई ने जमकर बिकवाली की है. पहले पखवाड़े में ही इनके द्वारा 52,704 करोड़ रुपये (लगभग 5.73 अरब डॉलर) की निकासी की गई थी, जो बीते हफ्ते और भी बढ़ गई. मार्च में अब तक एफपीआई ने 88,180 करोड़ रुपये (9.6 अरब डॉलर) निकाले हैं.
युद्ध की टेंशन और इसके दुनिया के तमाम देशों में दिख रहे असर के चलते मार्च महीने में लगभग हर दिन विदेशी निवेशक सेलर बने हुए नजर आए हैं. महीने के तीन सप्ताह में ही निकासी का आंकड़ा 88,180 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है. इससे पहले फरवरी महीने में ही विदेशी निवेशकों की वापसी हुई थी. मार्च की इस बिकवाली के चलते 2026 में अब तक एफपीआई निकासी का आंकड़ा 1 लाख करोड़ रुपये के पार हो गया है.
तीन महीने बाद लौटे थे एफपीआई
बता दें कि इससे पिछले फरवरी महीने में ही भारतीय शेयर बाजारों में FPI की वापसी हुई थी और ये तीन महीने बाद देखने को मिली थी. आंकड़े देखें, तो नवंबर 2025 में विदेशी निवेशकों ने 3,765 करोड़ रुपये, दिसंबर 2025 में 22,611 करोड़ रुपये और जनवरी 2026 में 35,962 करोड़ रुपये निकाले थे. इसके बाद फरवरी महीने में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जो बीते 17 महीनों में सर्वाधिक निवेश था.
FPI की बेरुखी की वजह क्या?
विदेशी निवेशकों की बेरुखी के पीछे के कारणों की बात करें, तो एक नहीं कई हैं. मिडिल ईस्ट में जंग के बाद से क्रूड की कीमतों (Crude Oil Price) में तेज उछाल आया है. ये 28 फरवरी से पहले 70 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास ट्रेड कर रहा था, लेकिन युद्ध की शुरुआत के बाद तेजी से बढ़ा और फिलहाल 112 डॉलर के पार बना हुआ है.
इसके अलावा भारतीय रुपये में लगातार जारी गिरावट ने भी विदेशी निवेशकों का सेंटीमेंट बिगाड़ने में बड़ा रोल निभाया है. युद्ध से पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले Indian Currency Rupee की वैल्यू 91 के आसपास थी, जो अब 93 का स्तर पार कर चुकी है. कई एक्सपर्ट्स ने रुपया के 95 तक टूटने का अनुमान भी जाहिर किया है.
इस सेक्टर में जोरदार बिकवाली
ये बड़े कारण हैं, जो निवेशकों के निवेश के रिटर्न पर सीधा असर डालते हैं और विदेशी निवेशक भारतीय बाजारों से भागते हुए नजर आ रहे हैं. सबसे ज्यादा निकासी फाइनेंशियल सर्विसेज सेक्टर के जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर भारी दबाव देखने को मिला और सबसे ज्यादा बिकवाली इसी सेक्टर में देखने को मिली है.
(नोट- शेयर बाजार में किसी भी तरह के निवेश से पहले अपने मार्केट एक्सपर्ट्स की सलाह जरूर लें.)
आजतक बिजनेस डेस्क