प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को पश्चिम बंगाल में थे. इस दौरान उन्होंने झाड़ग्राम की एक छोटी सी दुकान से झालमुड़ी ली और उसका स्वाद चखा. पीएम मोदी ने इसकी तस्वीरें सोशल मीडिया हैंडल पर शेयर कीं जो वायरल हो गई. साथ ही वायरल हो गई झालमुड़ी. फिर हुआ ये कि जो झालमुड़ी मुंह में जाते ही तीखे-नमकीन, खट्टे स्वाद का मिला-जुला बम ब्लास्ट करती थीं, अब उसके इतिहा की गहराई में उतरने की कोशिश की जा रही है.
किसी भी बंगाली के लिए झालमुड़ी सिर्फ एक स्नैक नहीं, बल्कि अहसासों की पूरी तिजोरी है. ये तिजोरी पूरी तरह खुली हुई है, इसमें कोई ताला नहीं है, क्योंकि कागज के शंकु आकार के टोपीनुमा ठेंगे में वैसे भी ताला नहीं लगता है. बंगाल में शाम के नाश्ते या कड़क चाय संग कुछ नमकीन की जो परंपरा रही है, झालमु़ड़ी ने उसे एक आकार में ढाला है. ये कल्चर कहलाता है 'जोल खबर' यानी स्नेकिंग, आसान भाषा में कुछ चट्ठा-मिट्ठा...
बंगाल का 'जोल खबर' कल्चर और झालमुड़ी
इस जोल खबर में बहुत कुछ है. आलुर चॉप है, बेगुनी है, चिंगरी चॉप है और तरह-तरह के तेलेभाजा (तले हुए स्नैक्स) भी हैं. झालमुड़ी इन सबके बीच ऐसा स्नैक है जो समय से परे है. आप दिन के किसी भी टाइम इसका फांका कर सकते हैं, बशर्ते आपको थोड़ा सा फ्री होने की जरूरत है. बस इसे 'भेलपुरी' से मत मिलाइये क्योंकि वो अलग है.
कोलकाता की हर गली-नुक्कड़ पर 'झालमुड़ी' वाला मिलेगा ही, क्योंकि गली होने की परिभाषा में झालमुड़ी वाले का होना जरूरी है. और जरूरी है कि उसके आस-पास चार-पांच लोग खड़े हों, वह बारी-बारी से कागज के ठेंगे में लाई (फूला चावल), उबले आलू के छोटे टुकड़े, कटे टमाटर, प्याज, बारीक हरी मिर्च, चनाचूर और कुछ नींबू-नमकीन मिलाकर सबको मिक्स कर रहा है.
फिर कुछ मसाले, कुरकुरी मूंगफली और आखिरी में सरसों के तेल की कुछ बूंदें. इन सबके मेल से कुछ कुरकुरा कुछ सौंधा सा जो मिक्सचर बनता है, वो मुंह में जाकर ऐसा स्वाद घोलता है कि उसे बयां करना मुश्किल है. अगर मिर्च ज्यादा तीखी लगी तो स्वाद का अहसास आंख और कान से भी हो सकता है, इसके बावजूद 'झालमुड़ी' का वो ठेंगा हाथ से छूटता नहीं हैं.
बंगाली में 'झाल' का मतलब होता है झन्नाटेदार तीखा या गरम, और यही तीखापन इस स्नैक को उसका नाम और पहचान देता है.
...तो कोलकाता की पहचान कैसे बनी 'झालमुड़ी'?
इस स्नैक की उत्पत्ति कोलकाता (तब कलकत्ता) से वैसे ही जुड़ी है जैसे औद्योगिक क्रांति के इतिहास में 'पलायन और प्रवासी'. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत उन बिहारी प्रवासी मजदूरों ने की, जो ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में, इस शहर में कुछ कमाई की आस में पहुंचे थे. तब कलकत्ता राजधानी के रूप में उभरता हुआ शहर था.
इंडस्ट्री से लेकर कला-साहित्य-संस्कृति सभी कुछ यहां आकार ले रहा था. ऐसे में हर 'बाहरी' जो दिल से कलकत्ता के रग-रग में बस चुका था, उसने लाई-चने के नाश्ते को तमाम मिलावटों के साथ और रिच किया. फिर तो स्वाद का जो चस्का लगा उससे पहचान में आई 'झालमुड़ी' और छा गई. 1947 के विभाजन के बाद, मुस्लिम बिहारी समुदाय के जरिए यह स्वाद बांग्लादेश तक भी पहुंचा.
एक तरीके से झालमुड़ी की शुरुआत भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी हिस्से में हुई. इसका पहला या सबसे शुरुआती रूप कैसा रहा होगा, ये कहना मुश्किल है, लेकिन इसके जैसे कुछ और स्नैक्स भी मिलते हैं, जैसे उत्तर और मध्य भारत में भेलपुरी, और दक्षिण भारत में चुरुमुरी.
बंगाल में स्ट्रीट फूड की परंपरा 19वीं सदी के ही बाद की है. क्योंकि इससे पहले के बंगाली साहित्य में भी इसका जिक्र नजर नहीं आता है. पारंपरिक भोजन पद्धति में भोजन को शुद्धता और आयुर्वेदिक नजरिये अधिक देखा गया.
पुनर्जागरण का दौर और झालमुड़ी
बंगाल पुनर्जागरण के दौरान स्ट्रीट फूड का चलन बढ़ा और 20वीं सदी की शुरुआत से लेकर 1950 के दशक तक तरह-तरह के तले हुए स्नैक्स लोगों के जुबान पर चढ़ गए, लेकिन इन सबके बीच सस्ती, मौलिक, सबसे आसान, झालमुड़ी ने अलग ही पहचान कायम की. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान कोलकाता की सड़कों पर झालमुड़ी बड़ी संख्या में पूर्वी हिस्से में पहुंचे मजदूरों के पेट भरने का आसान जरिया बनी.
मुरी सस्ती और पोषक थी फिर तो बिहारी लाई-चना और बंगाली तला-भुना ने जो हाथ मिलाया स्वाद का यही मेल ही आगे चलकर झालमुड़ी बन गया. जात-पांत, कुल-गांव और अमीर-गरीब से ऊपर उठकर सब इसके दीवाने हैं.
विकास पोरवाल