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IPC Section 156: उपद्रव की जानकारी होने पर भी नहीं उठाया ये कदम तो लागू होगी धारा 156

आईपीसी की धारा 156 में उस व्यक्ति के कर्मचारी, एजेंट या मैनेजर के दायित्व के बारे में प्रावधान किया गया है, जिसके फायदे के लिए बलवा किया जाता है. आइए जानते हैं कि आईपीसी की धारा 156 इस बारे में क्या बताती है?

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बलवे से लाभ लेने वाले व्यक्ति के कर्मचारी से जुड़ी है ये धारा बलवे से लाभ लेने वाले व्यक्ति के कर्मचारी से जुड़ी है ये धारा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बलवा से लाभ लेने वाले व्यक्ति के मैनेजर या एजेंट से जुड़ी है ये धारा
  • अंग्रेजी शासनकाल में लागू हुई थी आईपीसी
  • जुर्म और सजा का प्रावधान बताती है IPC

Indian Penal Code: भारतीय दंड संहिता में बलवा, दंगा और उपद्रव (Riot) के मामलों को लेकर कई प्रकार के कानूनी प्रावधान (Provision) और प्रक्रियाएं परिभाषित की गई हैं. जिनका इस्तेमाल संबंधित मामलों में किया जाता है. इसी तरह से आईपीसी की धारा 156 में उस व्यक्ति के एजेंट या मैनेजर के दायित्व के बारे में प्रावधान किया गया है, जिसके फायदे के लिए बलवा किया जाता है. आइए जानते हैं कि आईपीसी की धारा 156 इस बारे में क्या बताती है? 

आईपीसी की धारा 156 (Indian Penal Code Section 156) 
भारतीय दंड संहिता 1860 के अध्याय 8 की धारा 156 (Section 156) के अनुसार, जब कभी किसी ऐसे व्यक्ति के फायदे के लिए या उसकी ओर से उपद्रव (Riot) किया जाए, जो किसी भूमि (Land), जिसके विषय में ऐसा उपद्रव हो, का स्वामी या अधिवासी (Owner or occupant) हो या जो ऐसी भूमि में या उपद्रव को पैदा करने वाले किसी विवादग्रस्त विषय (Controversial subject) में कोई हित रखने का दावा (Claim) करता हो या उससे कोई फायदा स्वीकार या प्राप्त (Accept or receive benefits) करने वाले व्यक्ति के अभिकर्ता या प्रबंधक (Agent or manager) जो इस बात का विश्वास करने का कारण (Reason to believe) रखते हुए कि ऐसा उपद्रव किया जाना संभाव्य (Potential) है या जिस गैरकानूनी जनसमूह (illegal gathering) द्वारा ऐसा उपद्रव किया जाए, उस जनसमूह का होना सम्भाव्य है, अपनी क्षमता और शक्ति (Capacity and power) अनुसार सब कानूनी साधनों का उपयोग (Use of legal means) कर उस ग़ैरक़ानूनी जनसमूह (illegal gathering) को बिखरने या उपद्रव को दबाने का निवारण (Suppression prevention) नहीं करता तो दंडित (punished) किया जाएगा.

सजा का प्रावधान (Punishment provision)
ऐसे मामले में दोषी पाए गए स्वामी या अधिवासी के अभिकर्ता (Owner or agent of domicile) के लिए आर्थिक दंड (Monetary penalty) का प्रावधान किया गया है. यह एक जमानती (Bailable) और गैर-संज्ञेय अपराध (Non-cognizable offense) है और किसी भी मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय (Triable by magistrate) है. यह अपराध समझौता करने योग्य नहीं (Not negotiable) है.

इसे भी पढ़ें--- IPC Section 155: जिस शख्स के फायदे के लिए हो बल्वा, उस पर लागू होती है ये धारा 

क्या होती है आईपीसी (IPC)
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.

अंग्रेजों ने लागू की थी IPC
ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.

 

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