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वारदातः भारत के खिलाफ चीन की पुरानी साजिश, लद्दाख पर है ड्रैगन की नजर!

जिस लद्दाख के लिए भारत एक इंच भी पीछे हटने को राजी नहीं और जिस लद्दाख को हथियाने के लिए चीन तमाम कोशिशें कर रहा है, आखिर उस लद्दाख में ऐसा क्या है? क्यों लद्दाख इतना अहम है? जबकि लद्दाख का ज्यादातर इलाका बंजर है.

भारत के लद्दाख में घुसपैठ करना चीन की पुरानी आदत रही है भारत के लद्दाख में घुसपैठ करना चीन की पुरानी आदत रही है
स्टोरी हाइलाइट्स
  • भारत-चीन के बीच लंबा है विवाद का इतिहास
  • लद्दाख में घुसपैठ की कई कोशिशें नाकाम
  • भारत के खिलाफ साजिशें रचता है चीन

इस साल मई से ही लद्दाख में भारत और चीन आमने सामने हैं. दोनों देशों की सेना के बीच बराबर तनाव बना हुआ है. 45 साल बाद ऐसा हुआ है कि सीमा पर चीन की ओर से गोलियां चलाई गई हैं. मगर जिस लद्दाख के लिए भारत एक इंच भी पीछे हटने को राजी नहीं और जिस लद्दाख को हथियाने के लिए चीन तमाम कोशिशें कर रहा है, आखिर उस लद्दाख में ऐसा क्या है? क्यों लद्दाख इतना अहम है? जबकि लद्दाख का ज्यादातर इलाका बंजर है. 

लद्दाख पहले भी बिना बॉर्डर के इन्हीं पहाड़ों के भरोसे था और आज भी है. लद्दाख में भारत और चीन के बीच ये कोई 40 या 50 साल लंबा सीमा विवाद नहीं. और ना ही ये आजादी के बाद पैदा हुआ कोई मसला है. बल्कि लद्दाख के लिए ये जंग सदियों पुरानी है. ये मामला इतना ज्यादा उलझा हुआ है कि ऊपरी तौर पर ये समझ में भी नहीं आएगा. इसे जानने के लिए इसकी तह तक जाना जरूरी है.

भारत के सबसे उत्तरी हिस्से में आता है लद्दाख. ये ट्रांस हिमालय का इलाका है. लद्दाख का तकरीबन पूरा इलाका इन्हीं ऊंची-नीची बंजर पहाड़ियों से मिलकर बना है. बंजर इसलिए क्योंकि बारिश यहां ना के बराबर होती है. इसीलिए तराई इलाकों को छोड़कर ज्यादातर इलाकों में ना यहां पेड़ मिलेंगे ना पौधे. मिलेगी तो बस बंजर रेतीली जमीन. जो अक्सर बर्फ से ढंकी रहती हैं. गर्मियों में जब ये बर्फ पिघलती हैं. तो उनसे नदियां निकलती हैं. जिनके ईर्द-गिर्द बसी घाटियों में ही कुछ लोग रहते हैं. कुछ इसलिए क्योंकि करीब 60 हजार वर्ग किमी के इस पूरे इलाके की आबादी महज पौने 3 लाख है.
 
अब आते हैं लद्दाख के नाम पर. जिसका मतलब है The Land of High Passes यानी ऊंचे ऊंचे दर्रों से मिलकर बनी भूमि. लद्दाख में दाखिल होने के लिए आपको पहाड़ों को पार करना ही होगा. और इसीलिए लद्दाख हमेशा से महफूज रहा. क्योंकि इन दर्रों और पहाड़ों को पार करना बहुत जोखिम भरा रहा है. सर्दियों में इन्हें पार करना तो नामुमकिन है. इसलिए ज्यादातर मूवमेंट यहां गर्मियों के मौसम में होती है. तो अब सवाल ये कि भारत तो खैर अपनी अस्मिता के लिए लड़ रहा है. मगर चीन इन पथरीले पहाड़ों को हथिया कर भी क्या हासिल कर लेगा. इसके लिए आपको लद्दाख की लोकेशन को समझना जरूरी है.

लद्दाख रीजन में अक्साई चिन का वो हिस्सा भी शामिल है, जिसे चीन ने पहले ही कब्जा कर रखा है. पहले लद्दाख का ये इलाका जम्मू-कश्मीर राज्य में आता था. मगर अब खुद लद्दाख को ही केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है. इस यूनियन टेरेटेरी में सिर्फ दो जिले आते हैं. लेह और करगिल. भौगोलिक तौर पर देखें तो लद्दाख के पश्चिम में जम्मू कश्मीर. उत्तर में गिलगिट. बाल्टिस्तान. दूसरी तरफ पूर्वी तुर्किस्तान जिसे चीन के कब्जे के बाद से जिनजियांग रीजन के नाम से जाना जाता है. जबकि पूरब में तिब्बत है. वहां भी चीन ने कब्जा जमा रखा है और दक्षिण में है हिमाचल प्रदेश.

लद्दाख और तिब्बत की अहमियत हमेशा से इसलिए रही है क्योंकि लद्दाख और तिब्बत सिल्क रूट के बिलकुल बीचोबीच है. चीन से जो सिल्क रूट निकलता था. वो तिब्बत और लद्दाख होते हुए ही जाता है. जो चीन को सीधे मध्य एशिया. यूरोप और मिडिल ईस्ट के देशों से जोड़ता है और नीचे भारत को कनेक्ट करता है. तो एक तरह से लद्दाख को आप सिल्क रूट का चौराहा कह सकते हैं. जहां से चौतरफा व्यापार के रास्ते खुलते हैं. तिब्बत पर तो चीन पहले से ही कब्जा कर के बैठा है. लिहाजा, अब इसलिए लद्दाख पर उसकी गिद्ध की नजर है. क्योंकि ये रूट आज भी चीन को सुपर पॉवर बनने के रास्ते खोल सकता है.

मौजूदा दौर में लद्दाख को देखें तो वो सिर्फ इतना सा इलाका है. जबकि ऐतिहासिक तौर पर लद्दाख में अक्साई चिन और जिनजियांग का भी कुछ इलाका शामिल था. लद्दाख का इलाका पूरब में हिमालय के पहाड़ियों के बाद शुरू होता है. इसलिए इसे ट्रांस हिमालय कहते हैं. लद्दाख जितना अहम चीन के लिए है. उतना ही जरूरी भारत के लिए भी है. सदियों से कश्मीर पश्मीना शॉल या पश्मीना उत्पादों के लिए मशहूर रहा है. जिसका कच्चा माल लद्दाख के रास्ते तिब्बत से आया करता था. उस दौर में पश्मीना का व्यापार बहुत ही फायदे का सौदा हुआ करता था. जिसकी वजह से कई लड़ाईयां भी हुईं.

लद्दाख का इतिहास
ये कहानी शुरू होती है 7वीं सदी से. उस दौर में इस पूरे दक्षिण एशियाई इलाके में तिब्बत साम्राज्य बहुत मज़बूत माना जाता था. तब तिब्बत की सीमा में मौजूदा पीओके से लेकर लद्दाख तक आता था. मगर 9वीं सदी में तिब्बत के राजा लंगदरमा की हत्या कर दी गई. इसके अगले 100 सालों में तिब्बत साम्राज्य अलग अलग टुकड़ों में बिखर गया. जिस साम्राज्य के हिस्से में लद्दाख का इलाका आया. उसका नाम था मरयुल साम्राज्य यानी लद्दाख का एतिहासिक नाम मरयुल था. तिब्बत से अलग होने की वजह से लद्दाख में तिब्बत का प्रभाव करीब 1 हज़ार साल तक बहुत ज़्यादा रहा. क्योंकि दोनों इलाके के लोगों की ज़ुबान, धर्म, इतिहास और सियासत एक जैसी थी. 

15वीं सदी में नामग्याल साम्राज्य ने इस इलाके पर अपना कब्ज़ा जमा लिया. 16वीं सदी के आते-आते मुगल शासक अकबर के पास लद्दाख को अपने कब्ज़े में लेने का मौका था. मगर नामग्याल साम्राज्य ने खुद ही टकराव की कोई स्थिति पैदा नहीं होने दी. इसलिए अकबर ने वहां हमला भी नहीं किया. बल्कि जब तिब्बत ने लद्दाख पर हमला किया, तब मुगल शासक औरंगज़ेब की सेना ने ही लद्दाख को बचाया था. इसके बाद 19वीं सदी तक लद्दाख पर नामग्याल किंगडम का ही राज रहा. जिनकी निशानियां आज भी लेह में मौजूद हैं.

इधर, 19वीं सदी में सिख साम्राज्य मज़बूत हो रहा था और महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर के साथ साथ लद्दाख पर भी कब्ज़ा जमा लिया. अब लद्दाख पर सिख डोगरा शासन था. मगर उसके पड़ोस में पड़ने वाले तिब्बत में सत्ता बदल चुकी थी. अब तिब्बत में क़िंग साम्राज्य का शासन था. डोगरा शासन अब व्यापार को मद्देनज़र रखते हुए पूरे सिल्क रूट पर कब्ज़ा चाहता था. यानी लद्दाख के साथ-साथ अब उसकी नज़र पश्चिमी तिब्बत पर भी थी. मगर जंग में डोगरा शासक हार गए. जिसे आज भी सीनो-सिख वार के नाम से जाना जाता है. इस जंग में क़िंग साम्राज्य की सेना लेह तक पहुंच गई. हालांकि फिर एक संधि के तहत दोनों की पहले वाली सीमा ही कायम रही. यानी लद्दाख डोगरा शासन के पास और पश्चिमी तिब्बत क़िंग साम्राज्य के पास. हालांकि इसके 4 साल बाद ही 1845 में डोगरा शासन अंग्रेज़ों से हार गया.

सदियां बीतती गईं. राजा-महाराजा बदलते रहे. मगर लद्दाख की तस्वीर नहीं बदली. वो पहले भी बिना बॉर्डर के इन्हीं पहाड़ों के भरोसे था और आज भी है. डोगरा शासन से जंग जीतने के बाद अंग्रेज़ों ने लद्दाख में सीमा बनाने की कई कोशिशें की. मगर वो भी नाकाम ही रहे. दरअसल, तिब्बत और लद्दाख के इलाके में पहाड़ों की वजह से बॉर्डर तय करना मुश्किल था. इनकी संस्कृति इस कदर मिलती-जुलती थी कि अंग्रेज़ ये अंदाज़ा ही नहीं लगा पाते थे कि कहां लद्दाख खत्म होता है और कहां से तिब्बत शुरु होता है.

लद्दाख के नक्शे को बहुत गौर से देखें तो वहां आपको कई रंग बिरंगी लाइनें नज़र आती हैं. ये वो रेखाएं हैं जिनका प्रस्ताव सरहद के तौर पर ब्रिटिश हुकूमत के वक्त रखा गया था. यानी अंग्रेज़ शासन ने कोशिश तो बहुत की कि लद्दाख की सीमा का निर्माण किया जाए. भले वो कागज़ पर ही क्यों ना हो. मगर वो तमाम कोशिशें नाकाम हुईं.

लद्दाख को बॉर्डर बनाने की पहली कोशिश
पहली कोशिश हुई 1865 में की गई. नक्शे पर धारीदार लाइनें आप देखते हैं. उसे जॉनसन लाइन कहा जाता है. जिसे भारत आज भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सीमा मानता है. अगर आप भारत के नक्शे को देखेंगे तो अक्साई चीन को मिलाते हुए जो लाइन आपको नक्शे के अंदर दिखती है. वो जॉनसन लाइन का ही हिस्सा है. जिसे उस वक्त के ब्रिटिश सर्वेक्षक विलियम जॉनसन के सर्वे के आधार पर खींचा गया था.

लद्दाख को बॉर्डर बनाने की दूसरी कोशिश 
साल 1873 में ब्रिटिश हुकूमत ने लद्दाख के नक्शे पर एक और लाइन खींची. वो पीली रेखा वही है. जिसे फॉरेन ऑफिस लाइन के नाम से जाना जाता है. हालांकि मौजूदा दौर में इस लाइन को ना तो भारत मानता है और ना ही चीन.

लद्दाख को बॉर्डर बनाने की तीसरी कोशिश
तीसरी कोशिश हुई 1897 में. जिसे मैकार्टनी-मैकडॉनल्ड लाइन के नाम से जाना जाता है. नक्शे पर हरी लाइन आप देखते हैं. वो वही मैकार्टनी-मैकडॉनल्ड लाइन है. जिसे जॉर्ज मैकार्टनी और सर क्लाउड मैकडॉनल्ड ने एक दूसरे सर्वे के हिसाब से खींची थी. इसके हिसाब से ये अक्साई चीन वाला हिस्सा उस वक्त के तिब्बत में जा रहा था. शुरुआत में तो चीन ने इसे मान लिया था. मगर बाद में वो इससे पलट गया. चीन ने कहा कि वो लद्दाख में इस धारीदार लाइन तक के हिस्से का दावा करता है. जिसमें गलवान घाटी भी आती है. जबकि वहां तक तब उसकी मौजूदगी थी भी नहीं.

लद्दाख को बॉर्डर बनाने की चौथी कोशिश
3 जुलाई 1914 को शिमला में तब के ब्रिटिश इंडिया, चीन और तिब्बत के बीच सीमा को लेकर एक समझौता हुआ. जिसे सर हेनरी मैकमोहन लीड कर रहे थे. इसी वजह से इस रेखा को मैकमोहन रेखा कहा जाता है. शिमला समझौते के दौरान ब्रिटेन, चीन और तिब्बत अलग-अलग पार्टी के तौर पर शामिल हुए. तब चीन से भारत की ये सीमा लगती ही नहीं थी. क्योंकि तब भारत और चीन के बीच में तिब्बत की सीमा थी. इस सम्मेलन में चीन सिर्फ इस हैसियत से शामिल हुआ था. क्योंकि तब उसकी सीमा भारत के K-2 पर्वत श्रृंखला के हिस्सा से मिलती थी. प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी मिल गई. मगर चीन ने बाद में कहा कि अब तिब्बत के पास कोई अधिकार नहीं है. इसलिए वो उस समझौते को मानने से ही इनकार करता है.

बहरहाल, 1947 में भारत आज़ाद हुआ. उधर, 1949 में चीन में पीपुल रिपब्लिक ऑफ चाइना की स्थापना हो गई. धीरे-धीरे तिब्बत पर चीन ने कब्ज़ा जमा लिया. इधर, कश्मीर के राजा से संधि के बाद लद्दाख भारत का हिस्सा बन गया. एक देश के तौर पर भारत ने जॉनसन लाइन को ही मान्यता दी. जबकि चीन ने जॉनसन लाइन और यहां तक की मैकार्टनी लाइन को भी मानने से इंकार कर दिया. दरअसल चीन हो या भारत दोनों ही देश राजशाही के हिसाब से अपनी सीमा का दावा कर रहे हैं. भारत अपना दावा करता है ब्रिटिश-इंडिया के नक्शे के हिसाब से. जबकि चीन तिब्बत के पुराने बॉर्डर के आधार पर लद्दाख पर दावा कर रहा है.

लद्दाख को बॉर्डर बनाने की पांचवीं कोशिश 
1950 के दशक में चीन का दखल लद्दाख में बढ़ना शुरु हुआ. बॉर्डर विवाद को देखते हुए 1961 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और पीपुल रिपब्लिक ऑफ चाइना के पहले प्रीमियर चाऊ एनलाई ने बातचीत करके इसको सुलझाने की कोशिश भी की. मगर बात बनी नहीं. वहीं दूसरी तरफ चीन ने अक्साई चीन के हिस्से में एक रोड बनानी शुरु कर दी. जो ज़िनजियांग से तिब्बत तक अक्साई चीन के रास्ते होते हुए जा रही थी. इसे लेकर काफी बवाल हुआ और फिर 1962 की जंग भी हुई. इस जंग में चीन उस धारीदार लाइन तक पहुंच भी गया, जिसका वो दावा करता था कि इसमें गलवान घाटी भी शामिल थी.

हालांकि चीन फिर इस लाइन से एक समझौते के तहत पीछे हट गया. मगर इस नीली लाइन तक उसने अपना कब्ज़ा जमाए रखा. जिसे आज एलएसी यानी लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के नाम से जाना जाता है. इसी लाइन के नज़दीक गलवान घाटी पर मौजूदा वक्त में दोनों देशों के बीच तनाव चल रहा है.

 

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