भारत और बांग्लादेश के रिश्तों के बीच इन दिनों एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा उभरकर सामने आया है. बांग्लादेश की नई सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की है. इसपर भारत ने साफ किया है कि इस अनुरोध पर विचार किया जा रहा है, लेकिन यह पूरी तरह कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही आगे बढ़ेगा.
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि "यह अनुरोध हमारे न्यायिक और आंतरिक कानूनी प्रक्रियाओं के तहत जांच में है. हम इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों के साथ रचनात्मक तरीके से जुड़ते रहेंगे." इस बयान से यह साफ है कि भारत इस संवेदनशील मामले में जल्दबाजी नहीं करना चाहता.
यह भी पढ़ें: बांग्लादेश से विस्थापित 331 हिंदू परिवारों को यूपी में मिली जमीन, सीएम योगी का जताया आभार
माना जा रहा है कि शेख हसीना को लेकर भारत के रुख में हल्का बदलाव भी देखने को मिल रहा है. पहले जहां इस मुद्दे पर चुप्पी थी वहीं अब भारत सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मामला जांच के तहत ही आगे बढ़ेगा. यह बदलाव तब और अहम हो जाता है जब बांग्लादेश में नई सरकार के साथ भारत अपने रिश्ते संतुलित करने की कोशिश कर रहा है.
हाल ही में बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के बीच नई दिल्ली में हुई बैठक में भी यह मुद्दा उठा था. इस दौरान ढाका ने एक बार फिर शेख हसीना के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई.
भारत में निर्वासन में रह रही हैं शेख हसीना
शेख हसीना अगस्त 2024 से भारत में रह रही हैं. बांग्लादेश में छात्र आंदोलनों के बाद उनकी सरकार गिर गई थी, जिसके बाद उन्हें देश छोड़ना पड़ा. तब से वह भारत में में हैं. दिसंबर 2024 में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने पहली बार उनके प्रत्यर्पण की औपचारिक मांग की थी. इसके बाद से यह मुद्दा लगातार दोनों देशों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है.
बांग्लादेश की नई सरकार का रुख
बांग्लादेश की तरफ से यह भी कहा गया है कि हसीना और उनके गृह मंत्री असदुज्जमा खान को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने मौत की सजा सुनाई है. यही वजह है कि ढाका सरकार उन्हें वापस लाने के लिए लगातार दबाव बना रही है.
यह भी पढ़ें: 'बांग्लादेश में दलित युवक की हत्या पर ममता बनर्जी मौन रहीं', सीएम योगी का वार
साथ ही, हाल ही में बांग्लादेश की संसद ने एक नया कानून पास किया है, जिसके जरिए आतंकवाद से जुड़े संगठनों और लोगों पर प्रतिबंध लगाने का रास्ता साफ हुआ है. हालांकि इस कानून में किसी पार्टी का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन माना जा रहा है कि इसका असर हसीना की पार्टी अवामी लीग पर पड़ सकता है.
भारत के लिए क्यों मुश्किल है फैसला?
भारत के सामने इस मामले में बड़ी कूटनीतिक चुनौती है. एक तरफ उसे बांग्लादेश की नई सरकार के साथ रिश्ते मजबूत रखने हैं, वहीं दूसरी तरफ शेख हसीना के साथ पुराने राजनीतिक संबंध भी अहम हैं. इसके अलावा, प्रत्यर्पण जैसे मामलों में अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और द्विपक्षीय संधियों का भी ध्यान रखना पड़ता है. ऐसे में भारत का "कानूनी प्रक्रिया" पर जोर देना इसी संतुलन को दिखाता है.
आजतक इंटरनेशनल डेस्क