रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने की कोशिशों के तहत शांति वार्ता का अगला दौर अगले हफ्ते होने जा रहा है. यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने रविवार को घोषणा की कि रूस, यूक्रेन और अमेरिका के प्रतिनिधियों के बीच 4 और 5 फरवरी को अबू धाबी में त्रिपक्षीय बैठकें आयोजित की जाएंगी.
जेलेंस्की ने टेलीग्राम पर जारी बयान में कहा, 'हमें हमारी बातचीत टीम से रिपोर्ट मिली है. अगली त्रिपक्षीय बैठकों की तारीखें तय कर दी गई हैं 4 और 5 फरवरी, अबू धाबी. यूक्रेन गंभीर और सार्थक बातचीत के लिए तैयार है. हम ऐसे नतीजे में रुचि रखते हैं, जो हमें युद्ध के वास्तविक और सम्मानजनक अंत के करीब ले जाए.'
न्यूज एजेंसी एपी के मुताबिक यूक्रेनी राष्ट्रपति के इस ऐलान के बाद अमेरिका या रूस की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. हालांकि, शनिवार को रूस के शीर्ष वार्ताकार किरिल दिमित्रिएव ने दावा किया था कि उन्होंने अमेरिका के शांति प्रयासों से जुड़े प्रतिनिधिमंडल के साथ फ्लोरिडा में एक रचनात्मक बैठक की है.
अबू धाबी में पहले भी हो चुकी हैं बातचीत
अबू धाबी में हो रही ये बातचीतें उस लगभग एक साल पुराने प्रयास का हिस्सा हैं, जिसके तहत अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन रूस और यूक्रेन को शांति समझौते की ओर ले जाने की कोशिश कर रहा है. इन वार्ताओं का मकसद फरवरी 2022 से जारी रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करना है, जिसे अब लगभग चार साल होने को हैं.
वार्ता की शर्तों पर गहरा मतभेद
हालांकि अमेरिका की मध्यस्थता में दोनों पक्ष किसी न किसी समझौते की जरूरत पर सहमत दिखते हैं, लेकिन शांति समझौते के स्वरूप को लेकर रूस और यूक्रेन के बीच गहरे मतभेद बने हुए हैं. सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि क्या रूस उन इलाकों से पीछे हटेगा, जिन पर उसने कब्जा कर रखा है. या फिर वह यूक्रेन के पूर्वी औद्योगिक क्षेत्र डोनबास पर नियंत्रण बनाए रखेगा. इसके अलावा यह सवाल भी अहम है कि क्या रूस उन क्षेत्रों पर भी दावा करेगा, जिन पर वह अब तक पूरी तरह कब्जा नहीं कर सका है.
डोनबास बना सबसे बड़ा विवाद
डोनबास क्षेत्र, जिसे यूक्रेन का औद्योगिक केंद्र माना जाता है, इस पूरे संघर्ष का सबसे संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है. यूक्रेन इस क्षेत्र से रूसी सेना की पूरी वापसी की मांग करता रहा है, जबकि रूस इसे अपने रणनीतिक हितों से जुड़ा क्षेत्र मानता है.
अगले सप्ताह होने वाली बैठक को इस लिहाज से अहम माना जा रहा है कि क्या यह बातचीत वास्तविक शांति की दिशा में कोई ठोस रास्ता खोल पाएगी या फिर यह भी पिछले दौरों की तरह मतभेदों में उलझकर रह जाएगी.
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