संघ के 100 साल: विस्तारवादी चीन, तिब्बत की चिंता और गोलवलकर की टीस!

गुरु गोलवलकर मानते थे कि चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है. उन्होंने भारत सरकार को हमेशा याद दिलाया कि चीन से सतर्क रहने की जरूरत है. लेकिन गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे उन्हों 'उन्मादी' कह दिया जाता था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है यही कहानी.

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संघ से हमेशा से ही तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन किया है. (Photo: AI generated) संघ से हमेशा से ही तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन किया है. (Photo: AI generated)

विष्णु शर्मा

  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:44 AM IST

तिब्बत और भारत के बहुत प्राचीन रिश्ते रहे हैं. तिब्बत में भी पुरानी मान्यता है कि कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत युद्ध के बाद यहां से गए एक राजा रुपति ने ही तिब्बत की शासन व्यवस्था को व्यवस्थित किया था. किसी भारतीय नागरिक को कैलाश मानसरोवर की यात्रा करने और किसी तिब्बती नागरिक को बोधगया की यात्रा करने के लिए इतिहास में पहले कभी भी वीजा की जरूरत नही पड़ती थी. सातवीं शताब्दी में तिब्बत में गुरू पद्म संभव द्वारा बौधर्म के प्रसार के बाद से तो तिब्बत भारत को अपना गुरू आर्यभूमि मानने लगा था. ऐसे में सैकड़ों साल से सांस्कृतिक रिश्ते भी मजबूत थे. RSS में हमेशा से ही चीन और नेपाल जैसे देशों से अच्छे रिश्तों को लेकर चिंता रही है. ये चिंता इतनी थी कि चीनी आक्रमण से 11 साल पहले ही गुरु गोलवलकर ने पंडित नेहरू को चीन के रुख को लेकर चेतावनी दी थी और उसके बाद वो लगातार इस मुद्दे को अलग अलग मंचों पर उठाते रहे.

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चीनी आक्रमण हुआ, उसके दशकों बाद लोग सस्ते सामान के चक्कर में चीन के प्रति उदार रुख रखने लगे. यहां तक कि पिता की हार के चलते कभी इंदिरा गांधी ने चीन को लेकर नरम रुख नहीं दिखाया, पर उन्हीं की पार्टी की सरकार में बाद में कांग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से समझौता कर लिया, राजीव गांधी फाउंडेशन को तो चीन की तरफ से भारी चंदा भी मिला. ऐसे में तिब्बत को तो सब भूल ही गए. लेकिन RSS नहीं चाहता था कि लोग तिब्बत को भूल जाएं. एक बड़ी पहल सरसंघचालक केएस सुदर्शन ने की, जिसके चलते भारतीय तिब्बत को भूल नहीं सकते.
 
11 साल पहले ही गुरु गोलवलकर ने चेताया था

सीपी भिषिकर गुरु गोलवलकर की जीवनी में लिखते हैं कि, “सन् 1951 में ही गुरुजी ने कर्नाटक के शिमोगा में प्रेस को एक बयान जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘चीन स्वभाव से विस्तारवादी है और निकट भविष्य में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण करने की पूरी संभावना है.’ यह चेतावनी तिब्बत में चीन की सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में थी. उन दिनों श्री गुरुजी  ने बार-बार चेतावनी दी थी कि भारत ने तिब्बत को चीन को थाली में परोसकर एक बहुत बड़ी भूल की है. उन्होंने कहा था कि भारत सरकार ऐसी अदूरदर्शिता दिखा रही है जिससे बचने के लिए अंग्रेजों ने भी अत्यधिक सावधानी बरती थी., विशेष रूप से, वे अक्सर कहते थे कि चीन में कम्युनिस्ट क्रांति के मद्देनजर हमें यहां के उन छल-स्तंभकारों से सावधान रहना चाहिए जो कम्युनिस्ट आक्रमणकारियों के साथ मिले हुए हैं.”
 
‘पांचजन्य’ के 18 मई 1959 के अंक  के एक लेख में उन्होंने चेतावनी दी थी कि केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे एशिया को हमेशा सतर्क रहना चाहिए. लेकिन गुरु गोलवलकर जब जब तिब्बत की याद दिलाते थे, उस वक्त की मीडिया उनके लिए ‘युद्ध उन्मादी’ जैसे शब्द प्रयोग किया करती थी. स्वाभाविक रूप से, भारत-चीन संघर्ष गुरु गोलवलकर की 2 अप्रैल, 1962 को महाराष्ट्र में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुख्य विषय बना. युद्ध खत्म होने के बाद भी गुरु गोलवलकर ने 23 दिसम्बर 1962 को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रेस कॉन्फ्रेंस की.

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RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी 

दिल्ली में उन्होंने कहा, “मुझे यह कहते हुए खेद है कि बार-बार चेतावनी देने के बावजूद, सरकार ने इस गंभीर संभावना को अनदेखा करना ही बेहतर समझा. लगभग दो महीनों से चीनी हमारी धरती पर आक्रमण कर रहे थे और अब सरकार स्वीकार करती है कि आक्रमण हुआ है. वास्तव में, यह आक्रमण 10 से 12 साल पुराना है. यहां तक ​​कि मुझ जैसे एक साधारण व्यक्ति ने भी लगभग दस साल पहले उन व्यवस्थित प्रयासों का जिक्र किया था जो चीनी हमारे क्षेत्र में प्रवेश करने और उसमें अपनी जड़ें जमाने के लिए कर रहे थे. कुछ अन्य जानकार लोगों ने भी इस बारे में चेतावनी दी थी. लेकिन हमारे नेता विश्व भाईचारे, हिंदी-चीनी भाई-भाई, पंच शीला और ऐसे ही अच्छे-अच्छे नारों में इतने खो गए थे कि उन्होंने इस जैसी गंभीर समस्या पर ध्यान देने के बारे में सोचा तक नहीं.”

लाखों स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए वहां उन्होंने तिब्बत की मुक्ति का आह्वान भी किया था और भारत सरकार से गुजारिश की थी कि तिब्बत की निर्वासित सरकार को मान्यता दी जाए. पूरे देश को चीन की हार से धक्का लगा था, गोलवलकर कैसे अछूता रहते. उसके बाद उनके भाषणों में यही टीस उभर के आती रही.

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इन भाषणों के दौरान, गुरु गोलवलकर चीन में कम्युनिस्ट शासन, रूस और चीन के बीच अस्पष्ट संबंध, भारतीय कम्युनिस्टों की विश्वासघाती भूमिका, पाकिस्तान के साथ चीन की खोखली दोस्ती, नेपाल के साथ घनिष्ठ संबंध की आवश्यकता और अपनी ताकत के आधार पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में गुटनिरपेक्ष रहने की आवश्यकता जैसे विषयों पर भी चर्चा करते थे. उन्होंने यहां तक कहा कि यदि नेताओं में स्थिति का सामना करने का साहस नहीं है, तो उन्हें पद छोड़ देना चाहिए और सत्ता उन लोगों को सौंप देनी चाहिए जो आवश्यक वीर भावना और दृढ़ता से सुसज्जित हों. ऐसा नहीं था कि गुरु गोलवलकर केवल आक्रोश ही निकाल रहे थे, कैसे रातोंरात उन्होंने हजारों स्वयंसेवकों को शरणार्थियों, घायल सैनिकों और सीमा पर असुरक्षित हो गए डरे सहमे गांव वालों की सेवा में भेजा था, कैसे 500 ट्रक राहत सामग्री देश भर से भिजवाई और रक्तदान शिविर, शरणार्थी राहत शिविर व आत्मरक्षा प्रशिक्षण शिविर लगाए थे, इसकी जानकारी हमने देव दीपावली वाली कहानी में भी की थी.

सरकार दलाई लामा को धर्मशाला में शरण देकर उन्हें भूल गई, और बाद की पीढ़ियों ने चीन से रिश्ते सुधार लिए लेकिन संघ उन्हें नहीं भूला, गुरु गोलवलकर ने भी उन्हें नहीं भूलने दिया. संघ के अलग अलग संगठनों के अधिकारी उनसे लगातार मिलते रहे. दलाई लामा को सम्मान देने के लिए विश्व हिंदू परिषद की स्थापना के मौके पर प्रयाग में आयोजित पहले विश्व हिंदू सम्मेलन में दलाई लामा को भी आमंत्रित किया गया. ये एक संदेश था पूरे विश्व को कि भारत तिब्बत को भूला नहीं है. यूं भी स्वामी विवेकानंद की दिखाई राह पर चलने वाला संगठन ये कैसे भूल सकता था कि स्वामी विवेकानंद तिब्बत को ‘उत्तराकुरुवर्षा’ कहकर तिब्बत से भारत के आध्यात्मिक रिश्तों की चर्चा कर उस पर ब्रिटिश सरकार की बाधाओं पर आपत्ति किया करते थे.
 
जब संघ की प्रतिनिधि सभा ने तिब्बत को लेकर जारी किए प्रस्ताव

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1959 में तो संघ में निर्णय लेने वाली सर्वोच्च समिति अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के कार्यकारी मंडल ने तिब्बत को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें लिखा था कि, “चीन से मित्रता करने की लालसा में सरकार ने चीन की विस्तारवादी योजनाओं को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया और यहाँ तक कि तिब्बत पर चीन के दावों को बिना किसी विरोध के स्वीकार कर लिया. परिणामस्वरूप, तिब्बत, जो सदियों से भारत के साथ घनिष्ठ सांस्कृतिक संबंधों से जुड़ा हुआ था, ने न केवल अपनी स्वतंत्रता खो दी है, बल्कि भारत और चीन के बीच मध्यस्थ की भूमिका भी खो दी है, जिससे चीनी सेनाओं को हमारी सीमाओं पर तैनात होने का अवसर मिल गया है.”

1962 में फिर एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें मांग की गई कि चीन से रिश्ते अब तोड़ने लेने चाहिए, “चीन के विस्तारवाद को रोकने, सभी राष्ट्रों के स्वतंत्र अस्तित्व के अधिकार को बनाए रखने और भारत की सीमाओं की स्थायी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारतीय भूभाग की मुक्ति के साथ-साथ तिब्बत की स्वतंत्रता भी आवश्यक है. साम्यवादी चीन ने तिब्बत के संबंध में अपने सभी वादों का उल्लंघन किया है। भारत अपने अधिकार के तहत तिब्बत के मुक्ति आंदोलन को हर संभव सहायता प्रदान कर सकता है, और वास्तव में ऐसा करना उसका कर्तव्य भी है. इसलिए साम्यवादी चीन के साथ राजनयिक संबंध वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हैं. इन संबंधों को तत्काल समाप्त कर देना चाहिए.” कांग्रेस भूल चुकी थी, देश के ज्यादातर लोग भूल चुके थे, लेकिन संघ को याद था, इसलिए 2012 में जब चीन के आक्रमण के 50 साल हुए तो फिर से प्रतिनिधि सभा ने उस साल उस आक्रमण की निंदा की, तिब्बत की चर्चा की और लोगों को चीनी मंसूबों के प्रति आगाह करते हुए और चीन के संबंध में एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बनाने की मांग की.
 
1979 में दूसरे विश्व हिंदू सम्मेलन का शुभारम्भ दलाई लामा ने किया

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संघ नहीं चाहता था कि लोग तिब्बत के मुद्दे को भूल जाएं, चीन के भारत पर आक्रमण को भूल जाएं. गुरु गोलवलकर के बाद सरसंघचालक बने बालासाहब देवरस ने भी ये प्रयास जारी रखे और विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रयाग में आयोजित दूसरे विश्व हिंदू सम्मेलन में दलाई लामा को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया. उन्होंने ही सम्मेलन का उदघाटन किया. इस अवसर पर दलाई लामा ने कहा कि, “कुछ लोगों को इस सम्मेलन में मेरी उपस्थिति अटपटी लग सकती है, लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो यह अभद्रता नहीं है. क्योंकि इस सम्मेलन में हिंदू और भारत में उत्पन्न सभी धर्मों के अनुयायी भाग ले रहे हैं. 

तिब्बत में विकसित बौद्ध धर्म वास्तव में एक भारतीय धर्म है, जिसकी मूल प्रतिपादन स्वयं भगवान बुद्ध ने किया था. यह अपनी जन्मभूमि में सुरक्षित नहीं रह सका. हमने न केवल इसे आज तक सुरक्षित रखा है, बल्कि इसका और विकास भी किया है. भारत के बुद्धिजीवियों से विचार-विमर्श करने के बाद मुझे यह अनुभव हुआ कि दर्शन या व्यवहार के आधार पर उनमें और हममें कोई अंतर नहीं है. सदियों से हमारे पास संचित संपूर्ण ज्ञान का खजाना मूल रूप से भारत का ही है. सभी धर्मों का मुख्य उद्देश्य प्राणियों को उनके दुःख, कष्ट और शोक से मुक्ति दिलाना है. उनके मार्ग भले ही भिन्न हों, लेकिन उनका लक्ष्य सभी को शांति और सुख प्रदान करना है”.

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वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत के समय तो दलाई लामा ने अपने कार्यक्रम में बदलाव करने पर लगी सभी पाबंदियों को दरकिनार करते हुए 10 जनवरी, 2014 को नागपुर में आरएसएस मुख्यालय का दौरा किया. उस समय आरएसएस के शीर्ष नेता हैदराबाद में एक बैठक के लिए नागपुर से बाहर थे. स्थानीय आरएसएस नेताओं ने तिब्बती आध्यात्मिक नेता का स्वागत किया और उन्हें रेशमबाग परिसर में आरएसएस के संस्थापक डॉ. के.बी. हेडगेवार और उनके उत्तराधिकारी गोलवलकर गुरुजी के स्मारक पर ले गए. 

इस मौके पर नेताओं को श्रद्धांजलि अर्पित करने और मीडियाकर्मियों से बातचीत करने के बाद, उन्होंने तिब्बती मुद्दे के लिए आरएसएस के समर्थन की तारीफ की. दलाई लामा ने विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल और आरएसएस के पूर्व सरसंघचालक केएस सुदर्शन के साथ अपने संबंधों को याद करते हुए कहा कि आरएसएस भारत में उसी समर्पण के साथ काम कर रहा है जैसा हम तिब्बत में कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि, "आरएसएस ने हमेशा तिब्बत के मुद्दे का समर्थन किया है और इसलिए मुझे इससे हमेशा लगाव रहा है", उन्होंने आगे ये भी कहा कि, "आरएसएस सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सोचता है."
 
संघ से जुड़ा छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) भी तिब्बत के मुद्दे पर काफी मुखर रहा है. दलाई लामा ने 90 के दशक में कानपुर और धर्मशाला में विद्यार्थी परिषद के वार्षिक सम्मेलन का भी उद्घाटन किया था. एबीवीपी स्वतंत्र तिब्बत के लिए सक्रिय रूप से अभियान चलाती आई है और तिब्बती युवा कांग्रेस के साथ भी संपर्क में है.
 
लेकिन केएस सुदर्शन थोड़ा और आगे बढ़ गए

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वर्ष 2006 में गुरु गोलवलकर का जन्म-शताब्दी वर्ष सारे देश में मनाया जा रहा था. शताब्दी वर्ष को यादगार बनाया तत्कालीन सरसंघचालक केएस सुदर्शन ने, वे 25 अक्तूबर, 2006 को दलाई लामा से मिलने के लिए धर्मशाला जा पहुंचे. उसके पहले 2002 में भी केएस सुदर्शन ने निर्वासित तिब्बती सरकार के प्रधानमंत्री प्रो. सामदौंग रिम्पोछे को नागपुर में संघ के विजयादशमी कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए आमंत्रित किया था. प्रो. कुलदीप चंद्र अग्निहोत्री ने ‘हमारे सुदर्शनजी’ पुस्तक के लेख में लिखा है कि, प्रो. सामदौंग रिम्पोछे को दिया गया निमंत्रण ही प्रकारांतर से भारतीय जनता द्वारा निर्वासित तिब्बत सरकार को मान्यता का प्रतीक था. प्रो. रिम्पोछे इस अवसर पर अभिभूत थे. धर्मशाला में 'भारत-तिब्बत सहयोग मंच' के राष्ट्रीय प्रतिनिधि सभा के सम्मेलन के अवसर पर जब सुदर्शनजी पधारे तो उनका स्वागत करनेवालों में सबसे पहले प्रो. रिम्पोछे ही उपस्थित थे. यह किसी एहसान का बदला नहीं था. एक समान सांस्कृतिक प्रवाह से ओत-प्रोत दो देशों के प्रतिनिधियों का मर्मस्पर्शी मिलन था. 

उसके बाद सुदर्शनजी दलाई लामा से मुलाकात करने के लिए उनके निवास-स्थान पर गए. दलाई लामाजी सुदर्शनजी का स्वागत करने के लिए बाहर ही उपस्थित थे. सुदर्शनजी ने उन्हें हिमाचल की टोपी पहनाई. दलाई लामाजी ने सुदर्शनजी को तिब्बत की पावनता तथा आतिथ्य का प्रतीक खड्ग भेंट किया. इस रेशमी उत्तरीय से मानो श्रीगुरुजी के समय से तिब्बत के साथ संघ का जो हिमालयी संबंध जुड़ गया था, उसकी पुनः पुष्टि हुई. सुदर्शनजी पहले सरसंघचालक थे, जिन्होंने तिब्बत की समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से दलाई लामा से लंबी वार्त्ता की. दूसरे दिन अखबारों में लिखा कि दलाई लामा और सुदर्शनजी की इस ऐतिहासिक भेंट ने तिब्बत के प्रश्न को एक नया आयाम दिया है”.
 
इंद्रेश कुमार की अगुवाई में बना तिब्बत के लिए नया संगठन

वैसे चौथे सरसंघचालक प्रो. राजेंद्र सिंह रज्जू भैया भी दलाई लामा से मिलने के लिए के लिए धर्मशाला आए थे, तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस भी उनसे प्रयाग के विश्व हिंदू सम्मेलन में मिले ही थे. लेकिन केएस सुदर्शन तक आते आते देश में तिब्बत को लेकर उदासीनता की भावना जगने लगी थी. आम जनता की छोड़िए, नीति-निर्धारक भी तिब्बत के प्रश्न को इतना महत्त्वपूर्ण नहीं मान रहे थे और धीरे धीरे भारत में ऐसे लोग भी खड़े हो गए थे, जो चीन की प्रगति की तारीफों के पुल बांधकर भारत सरकार को कटघरे में खड़ा करने लगे थे. चीन पोषित एप्प, चीन पोषित पत्रकारों के खुलासे हो ही चुके हैं. संघ में चीन की चालों पर सालों से गंभीर नजर रखने वालों को ये लगने लगा था कि यही माहौल जारी रहा तो एक दिन लोग तिब्बत को बिलकुल भूल जाएंगे. जरूरी था कि इस दिशा में कुछ किया जाए, इन गंभीर स्वयंसेवकों का दवाब ऊपर की तरफ भी पहुंचने लगा था.

प्रो. कुलदीप अग्निहोत्री लिखते हैं, “सुदर्शनजी इस स्थिति के प्रति चिंतित तो थे ही, इसका समाधान भी ढूंढ़ रहे थे. श्री इंद्रेश कुमार ने उन दिनों जम्मू-कश्मीर और हिमाचल को एक करने का सुझाव दिया, जो इस प्रश्न पर देश भर में जनमत तैयार कर सके. एक दिन मुझे इंद्रेश कुमारजी का जम्मू से फोन आया कि श्री सुदर्शनजी जम्मू आने वाले हैं और तिब्बत के प्रश्न पर चर्चा करने के लिए आप कल जम्मू पहुंच जाएं. यह शायद वर्ष 1999 के आरंभ की बात है. सुदर्शनजी उस समय सरसंघचालक नहीं थे. मैं जम्मू पहुँचा. सुदर्शनजी और इंद्रेश कुमारजी दोनों संघ कार्यालय में ही थे. तिब्बत के प्रश्न पर उनसे लंबी बातचीत हुई. सुदर्शनजी का मानना था कि भारत और तिब्बत सांस्कृतिक दृष्टि से एक ही अंतर्धारा से जुड़े हुए हैं. तिब्बत पर चीनी आक्रमण के समय भारत सरकार ने जो उदासीनता दिखाई, उससे दक्षिण-पूर्व एशिया के उन सभी देशों में, जो भारतीय संस्कृति से अनुप्राणित हैं, एक प्रकार से निराशा का वातावरण छा गया.” वे आगे लिखते हैं कि, “भारत की स्वतंत्रता के उपरांत ये सभी देश भारत की ओर अत्यंत आशा भरी नजरों से देख रहे थे और इनकी इच्छा थी कि भारत इस पूरे क्षेत्र में नेतृत्व देने की स्थिति में आए. 

दक्षिण-पूर्व एशिया के अधिकांश देश चीन से भयभीत रहते हैं, क्योंकि चीन इनमें से अधिकांश को हड़प करने की हवस दिखाता रहता है”. सुदर्शनजी का यह भी कहना था कि इसलाम और ईसाइयत जैसे संप्रदायों ने किसी- न-किसी प्रकार से दुनिया के अधिकांश देशों को मतांतरित कर दिया है और वहाँ की स्थानीय संस्कृति व पूजा-पद्धति को समाप्त कर दिया है. उनका मत था कि बौद्ध मत को माननेवाले कुछ छोटे-मोटे देशों और भारत को छोड़कर अधिकांश देश मतांतरित हो चुके हैं. इसलिए हिंदुओं और बौद्धों को मिलकर समय रहते संस्कृति संरक्षण का कार्य करना चाहिए. दलाई लामाजी की इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है”.

इसी परिचर्चा में केएस सुदर्शन की इस पर भी जोर था कि भारतीय जनता के बीच तिब्बत को लेकर फैली उदासीनता की मोटी चादर को हटाया जाना चाहिए और इसके लिए तिब्बत के प्रश्न पर बौद्धिक चर्चा करने के साथ-साथ जनमत जाग्रत् करना भी अत्यंत आवश्यक है. इस लंबे विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय किया ‍कि 'भारत-तिब्बत सहयोग मंच' के नाम से कार्य शुरू किया जाए. 5 मई, 1999 को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में 'भारत-तिब्बत सहयोग मंच' की स्थापना की गई. तीन-चार वर्षों में 'भारत-तिब्बत सहयोग मंच' का कार्य देश के अनेक हिस्सों में फैल गया. सुदर्शनजी बीच-बीच में इसकी गतिविधियों की खबर लेते रहते थे.

इस संगठन को 25 साल हुए तो दलाई लामा ने धर्मशाला में एक भव्य कार्यक्रम में भारत तिब्बत सहयोग मंच की सराहना की, इस अवसर पर संगठन के मुख्य संरक्षक इंद्रेश कुमार भी उपस्थित थे जो राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच व भारत तिब्बत सहयोग संघ जैसे कई संगठनों की प्रेरणा हैं. उनके नेतृत्व में ये संगठन कई तरह की यात्राएं और कार्यक्रमों के जरिए तिब्बत के प्रश्न को लेकर लगातार अलख जगाए रखता है. इस संगठन की एक महिला इकाई भी है, जिसकी मुख्य संरक्षक रेखा गुप्ता हैं, जो IFFI जैसे कई फिल्म फेस्टीवल्स की जूरी में रही हैं, उनकी बेटी मशहूर फिल्म अभिनेत्री ईशा गुप्ता हैं.

पिछली कहानी: संघ दफ्तर में जमीन पर बैठे 7 मुस्लिम देशों के राजदूत और हिन्दू धर्म पर गंभीर चर्चा! 

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