मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच पाकिस्तान की रणनीति और उसके फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता करने के बाद पाकिस्तान जिस स्थिति में फंसा, उसका असर अब अफगानिस्तान के आम नागरिकों पर दिखाई दे रहा है. काबुल के एक अस्पताल पर हुए हमले में 400 से अधिक अफगानों की मौत ने इस पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया है.
करीब छह महीने पहले 17 सितंबर 2025 को पाकिस्तान ने सऊदी अरब के साथ एक नाटो जैसे स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते के तहत अगर किसी एक देश पर हमला होता है, तो दूसरे देश को उसकी रक्षा करनी होगी. इस समझौते में ईरान को लेकर संभावित खतरे को भी ध्यान में रखा गया था, हालांकि इसका नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया.
अफगानिस्तान में एयरस्ट्राइक, 400 नागरिकों की मौत
सऊदी अरब लंबे समय से पाकिस्तान को आर्थिक मदद देता रहा है और अरबों डॉलर के कर्ज के जरिए उस पर प्रभाव भी रखता है. इस समझौते के बाद पाकिस्तान से यह उम्मीद की जा रही थी कि वह सऊदी अरब को सैन्य मदद देगा. खासकर उस समय, जब ईरान ने मिसाइल और ड्रोन हमलों के जरिए सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों को निशाना बनाया.
28 फरवरी को जब ईरान पर हमले हुए और उसने जवाबी कार्रवाई की, उसी दिन सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से बात की. इसके बाद 7 मार्च को सऊदी रक्षा मंत्री ने रियाद में पाकिस्तान के सेना प्रमुख असीम मुनीर से मुलाकात की. 12 मार्च को जेद्दा में शहबाज शरीफ और असीम मुनीर ने फिर से मोहम्मद बिन सलमान से मुलाकात की और सऊदी अरब के प्रति पूरा समर्थन जताया.
ईरान के हमलों के बीच बढ़ा सऊदी का दबाव
इन बैठकों के दौरान सऊदी अरब ने पाकिस्तान से अपने रक्षा समझौते के तहत सहयोग की उम्मीद जताई. हालांकि पाकिस्तान ने सीधे तौर पर अपने सैनिक भेजने या सैन्य संसाधन देने पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया. पाकिस्तान के सऊदी अरब में राजदूत अहमद फारूक ने कहा कि इस तरह के फैसले सैन्य अधिकारियों के बीच तकनीकी चर्चा का हिस्सा होते हैं.
इस बीच, पाकिस्तान के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी थी कि अगर वह सीधे तौर पर ईरान के खिलाफ खड़ा होता है, तो देश के अंदर हालात बिगड़ सकते हैं. पाकिस्तान में शिया समुदाय की आबादी करीब 20 प्रतिशत है और ईरान के साथ उसकी 900 किलोमीटर लंबी सीमा भी है. ऐसे में किसी भी तरह की सैन्य भागीदारी पाकिस्तान के लिए खतरनाक साबित हो सकती है.
ईरान के खिलाफ खुलकर आने से बचता पाकिस्तान
इसी स्थिति से निकलने के लिए पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के साथ अपने सीमा विवाद को तेज कर दिया. 27 फरवरी को पाकिस्तान ने अचानक अफगानिस्तान में बड़े पैमाने पर हवाई हमले किए. इन हमलों के पीछे कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया, लेकिन इसे मध्य पूर्व के हालात से जोड़कर देखा जा रहा है. बताया जा रहा है कि रमजान के पवित्र महीने में शब-ए-कद्र की रात पाकिस्तान ने काबुल के एक अस्पताल पर हमला किया, जिसमें 400 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. इस घटना ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान इस तरह के हमलों के जरिए यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वह पहले से ही एक युद्ध में उलझा हुआ है, ताकि सऊदी अरब को सैन्य मदद देने से बचा जा सके. कुछ विश्लेषकों ने इसे एक रणनीतिक कदम बताया है, जिससे पाकिस्तान अपने ऊपर आए दबाव को कम करना चाहता है. हालांकि, पाकिस्तान की यह रणनीति अब सवालों के घेरे में है. अफगानिस्तान में निर्दोष नागरिकों की मौत और क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता ने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है.
बैकचैनल डिप्लोमेसी से तनाव कम करने की कोशिश
वहीं, रिपोर्ट्स के मुताबिक पाकिस्तान ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव कम करने के लिए बैकचैनल डिप्लोमेसी में भी लगा हुआ है. लेकिन जमीनी हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं और आम नागरिक इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं. कुल मिलाकर, सऊदी अरब के साथ किया गया रक्षा समझौता पाकिस्तान के लिए एक जटिल स्थिति बन गया है. इस जाल से निकलने के लिए उठाए गए कदम अब क्षेत्रीय शांति के लिए खतरा बनते नजर आ रहे हैं.
युद्धजीत शंकर दास