पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (POK) सुलग रहा है. यहां के लोगों ने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है और बड़ी संख्या में हिंसक विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं. पाक आर्मी इन विरोध प्रदर्शनों का दमन करने के लिए गोली-बंदूक का सहारा ले रही है और JAAC के सदस्यों पर सीधे गोलियां बरसा रही है. JAAC यानी जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी जिसने पाकिस्तान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है.
खैर, Pok में फैले इस तनाव के बीच एक सवाल और चर्चा में आ गया है कि अगर POK पर पाकिस्तान का नियंत्रण है, तो वहां प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विधानसभा और अलग झंडा क्यों है? क्या यह क्षेत्र असल में ऑटोनमी है या फिर यह सिर्फ एक दिखावा है?
पाकिस्तान POK को 'आजाद जम्मू-कश्मीर' (Azad Jammu and Kashmir) कहता है. यहां एक प्रधानमंत्री है, एक राष्ट्रपति है, विधानसभा है, अदालतें हैं और अपना झंडा भी है. पहली नजर में यह व्यवस्था किसी स्वतंत्र या अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र जैसी लगती है, लेकिन आलोचकों और कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह 'आजादी' केवल कागजों तक ही सिमटी हुई है और असली कंट्रोल इस्लामाबाद और पाकिस्तान की सेना के हाथों में है.
1947 के बाद कैसे बनी यह व्यवस्था?
इस सवाल का जवाब 1947 के भारत-पाक विभाजन से जुड़ा है. जब ब्रिटिश भारत का विभाजन हुआ, तब जम्मू-कश्मीर एक रियासत थी. महाराजा हरि सिंह ने शुरुआत में भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ जाने का फैसला नहीं किया था. अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली लड़ाकों ने जम्मू-कश्मीर पर हमला कर दिया. हालात बिगड़ने पर महाराजा हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी और भारत के साथ विलय-पत्र (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची और भारत-पाकिस्तान के बीच पहला युद्ध शुरू हुआ.
युद्ध के बाद हुए सीजफायर में जम्मू-कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के कब्जे में रह गया. भारत का स्पष्ट रुख है कि पूरा जम्मू-कश्मीर, जिसमें POK, गिलगित-बाल्टिस्तान और शक्सगाम घाटी शामिल हैं, भारत का अभिन्न अंग है और पाकिस्तान इन क्षेत्रों पर अवैध कब्जा किए हुए है.
पाकिस्तान ने POK को अपना प्रांत क्यों नहीं बनाया?
पाकिस्तान ने पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा की तरह POK को कभी अपना औपचारिक प्रांत नहीं बनाया. इसके पीछे राजनीतिक और कूटनीतिक कारण थे. अगर पाकिस्तान POK को आधिकारिक तौर पर अपना प्रांत घोषित कर देता, तो जम्मू-कश्मीर पर उसके पूरे दावे को नुकसान पहुंच सकता था. पाकिस्तान लंबे समय से कश्मीर को एक 'विवादित क्षेत्र' बताता रहा है. इसलिए उसने POK को अपने देश में पूरी तरह शामिल करने के बजाय एक अलग प्रशासनिक ढांचा दिया.
इस रणनीति का मकसद यह दिखाना था कि POK एक अलग पॉलिटिकल यूनिट है और उसकी अपनी सरकार है. इससे पाकिस्तान इंटरनेशनल लेवल पर यह संदेश देना चाहता था कि वह केवल एक विवादित क्षेत्र का प्रशासन चला रहा है, न कि उसे अपने देश में मिला चुका है.
POK में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की व्यवस्था कैसे बनी?
1949 में हुए कराची समझौते के बाद रक्षा, विदेश नीति और कम्यूनिकेशन जैसे जरूरी मामले पाकिस्तान के नियंत्रण में चले गए. समय के साथ POK में कुछ स्थानीय संस्थाएं बनाई गईं. 1974 में लागू किए गए अंतरिम संविधान (Interim Constitution Act) के तहत वहां राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, विधानसभा और न्यायिक व्यवस्था की स्थापना की गई. इसी के बाद POK में एक औपचारिक राजनीतिक ढांचा तैयार हुआ.
कागजों पर यह सिस्टम लोकतांत्रिक और ऑटोनॉमस दिखाई देता है. वहां चुनाव होते हैं, विधायक चुने जाते हैं और प्रधानमंत्री सरकार को लीड करता है. लेकिन कई विशेषज्ञों का कहना है कि महत्वपूर्ण मामलों में अंतिम फैसला पाकिस्तान की संघीय सरकार और सेना ही लेते हैं.
क्या POK की व्यवस्था भारत के पुराने अनुच्छेद 370 जैसी थी?
अक्सर POK की तुलना भारत में जम्मू-कश्मीर को मिले पुराने आर्टिकल 370 से की जाती है. आर्टिकल 370 के तहत जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान और अलग झंडा था. राज्य को कई मामलों में विशेष अधिकार भी प्राप्त थे. हालांकि दोनों व्यवस्थाओं में कुछ समानताएं दिखाई देती हैं, लेकिन दोनों की बुनियाद अलग थी.
आर्टिकल 370 भारत के संविधान का हिस्सा था और जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय की संवैधानिक प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था. दूसरी ओर POK की व्यवस्था पाकिस्तान द्वारा बनाई गई एक प्रशासनिक संरचना है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र को पूरी तरह पाकिस्तान में मिलाए बिना उसका प्रशासन चलाना था. भारत हमेशा यह कहता रहा है कि जम्मू-कश्मीर उसका अभिन्न हिस्सा है. जबकि पाकिस्तान POK को एक विवादित क्षेत्र के रूप में सामने रखता रहा है. यही दोनों व्यवस्थाओं के बीच सबसे बड़ा अंतर है.
क्या POK की सरकार के पास वास्तव में शक्ति है?
कागजों पर देखें तो POK के पास काफी अधिकार दिखाई देते हैं. वहां विधानसभा है, सरकार है, अदालतें हैं और प्रशासनिक ढांचा भी मौजूद है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि वास्तविक शक्ति सीमित है. लंबे समय तक पाकिस्तान का प्रभाव एक शक्तिशाली संस्था 'कश्मीर काउंसिल' के जरिये चलता रहा, जिसकी अगुवाई पाकिस्तान का प्रधानमंत्री करता था. हालांकि समय-समय पर कुछ संवैधानिक बदलाव किए गए, लेकिन स्थानीय लोगों और कई राजनीतिक समूहों का आरोप है कि महत्वपूर्ण फैसलों पर आज भी इस्लामाबाद का असर बना हुआ है.
प्रशासन के कई महत्वपूर्ण पदों पर पाकिस्तान से भेजे गए अधिकारी काम करते हैं. आर्थिक नीतियों, विकास योजनाओं और प्रशासनिक फैसलों में भी पाकिस्तान की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है.
JAAC क्यों कर रहा है विरोध-प्रदर्शन?
हाल के विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) है. यह संगठन कई वर्षों से महंगाई, बिजली दरों, खाद्य पदार्थों की कीमतों और प्रशासनिक मुद्दों को लेकर आंदोलन करता रहा है. हाल के आंदोलन में संगठन ने केवल आर्थिक मांगें ही नहीं उठाईं, बल्कि राजनीतिक सुधारों की भी मांग की है. JAAC का कहना है कि POK के लोगों को अपने भविष्य और शासन से जुड़े फैसलों में ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए.
संगठन ने 38 सूत्रीय मांगपत्र भी रखा है, जिसमें शासन व्यवस्था में सुधार, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही से जुड़े मुद्दे शामिल बताए जाते हैं.
शरणार्थियों के लिए आरक्षित सीटों पर विवाद
POK की राजनीति में एक बड़ा विवाद विधानसभा की आरक्षित सीटों को लेकर है. विधानसभा की कुछ सीटें उन लोगों के लिए आरक्षित हैं, जो वर्तमान में पाकिस्तान के विभिन्न हिस्सों में रहते हैं लेकिन जिनकी जड़ें कभी जम्मू-कश्मीर रियासत से जुड़ी रही हैं. इन सीटों के प्रतिनिधियों का चुनाव POK में रहने वाले लोग नहीं, बल्कि पाकिस्तान में बसे ये समुदाय करते हैं.
आलोचकों और JAAC का आरोप है कि इस व्यवस्था के जरिए इस्लामाबाद को POK की राजनीति पर अतिरिक्त प्रभाव मिलता है. उनका कहना है कि इससे स्थानीय लोगों की राजनीतिक आवाज कमजोर होती है और बाहरी प्रभाव बढ़ता है.
वफादारी की शपथ को लेकर विवाद
POK में एक और विवादित व्यवस्था है, जिसे लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं. यहां चुनाव लड़ने वाले नेताओं, न्यायाधीशों और कई संवैधानिक पदों पर बैठने वाले लोगों को एक विशेष शपथ लेनी होती है. इस शपथ में उन्हें कश्मीर के पाकिस्तान के साथ जुड़ने के विचार का समर्थन करना पड़ता है. आलोचकों का कहना है कि इससे वैकल्पिक राजनीतिक विचारों के लिए जगह नहीं बचती. जो लोग अलग राय रखते हैं, वे मुख्यधारा की राजनीति में भाग नहीं ले सकते. यही कारण है कि कई लोग इस व्यवस्था को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ मानते हैं.
हाल के विरोध प्रदर्शन क्या बताते हैं?
POK में हुए हालिया विरोध प्रदर्शनों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि वहां की ऑटोनमी कितनी वास्तविक है. अगर ये इलाका वास्तव में पूरी तरह ऑटोनॉमस है, तो फिर स्थानीय लोगों को बार-बार इस्लामाबाद के हस्तक्षेप के खिलाफ सड़कों पर क्यों उतरना पड़ता है? JAAC और अन्य स्थानीय समूहों का आरोप है कि महत्वपूर्ण फैसले स्थानीय जनता की इच्छा के बजाय पाकिस्तान की सत्ता और सैन्य प्रतिष्ठान की प्राथमिकताओं के आधार पर लिए जाते हैं. हालिया घटनाओं ने यह भी दिखाया है कि आर्थिक मुद्दों से शुरू हुआ असंतोष अब राजनीतिक अधिकारों और प्रतिनिधित्व की मांग में बदलता जा रहा है.
कुल मिलाकर बात ये है कि POK में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, विधानसभा और झंडा जरूर मौजूद हैं, लेकिन इन संस्थाओं की वास्तविक शक्तियों को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है. पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को अपने प्रांत के रूप में शामिल करने के बजाय एक अलग राजनीतिक ढांचा दिया, ताकि वह कश्मीर पर अपने दावे को बनाए रख सके. समर्थकों के लिए यह व्यवस्था स्वशासन का प्रतीक हो सकती है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह केवल एक सीमित स्वायत्तता है, जहां अंतिम नियंत्रण इस्लामाबाद और पाकिस्तान की सैन्य व्यवस्था के पास रहता है.
हालिया विरोध प्रदर्शनों और JAAC के आंदोलन ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या POK की राजनीतिक संस्थाएं वास्तव में जनता की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं या वे केवल एक ऐसी व्यवस्था का हिस्सा हैं, जो स्वायत्तता (ऑटोनॉमस बॉडी) का आभास तो देती है, लेकिन असली पावर कहीं और होती है.
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