दुनिया इस वक्त एक ऐसे ऊर्जा संकट की ओर बढ़ रही है, जिसे अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां इतिहास की सबसे बड़ी तेल आपूर्ति रुकावट बता रही हैं. हालात सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रूस और अमेरिका तक फैले हुए हैं. यहां तेल और गैस से जुड़े अहम ठिकाने या तो हमलों की चपेट में हैं या हादसों का शिकार हो रहे हैं.
मंगलवार को राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ चेतावनी दी कि मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध के असर लंबे समय तक महसूस किए जाएंगे. उन्होंने भारत के लिए कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस और पेट्रोकेमिकल्स की सप्लाई में आई बाधाओं का जिक्र किया. अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के चलते तेल बाजार में उथल-पुथल मची हुई है.
ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है. इसकी सबसे बड़ी वजह ईरान का होर्मुज स्ट्रेट बंद करना और खाड़ी क्षेत्र में एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर लगातार हमले हैं. लेकिन यह संकट सिर्फ इसी क्षेत्र तक सीमित नहीं है. मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़े हैं. 28 फरवरी को ईरान-इजरायल संघर्ष की वजह से ऊर्जा ठिकाने निशाना बने.
18 से 20 मार्च के बीच फारसी खाड़ी के आसपास कई एनर्जी हब पर हमले हुए. इजरायल ने दुनिया के सबसे बड़े गैस क्षेत्र साउथ पार्स पर हमला किया, जिसके बाद पूरे इलाके में जवाबी कार्रवाई तेज हो गई. 19 मार्च को कतर के रास लफान इंडस्ट्रियल सिटी, जो दुनिया का सबसे बड़ा LNG कॉम्प्लेक्स है, वहां ईरानी हमलों के बाद भारी नुकसान हुआ.
इससे कतर की LNG निर्यात क्षमता में करीब 17 फीसदी तक की गिरावट की आशंका जताई गई है. उसी दिन सऊदी अरब के यनबू स्थित SAMREF रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ, जबकि कुवैत की मीना अल-अहमदी और मीना अब्दुल्ला रिफाइनरियों में भी आग लग गई. UAE को भी अपनी गैस सुविधाएं बंद करनी पड़ीं.
इन हमलों ने पूरे खाड़ी क्षेत्र की ऊर्जा सप्लाई को झकझोर दिया है. उधर, रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी ऊर्जा संकट को और गहरा कर दिया है. यूक्रेन ने रूस के ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाते हुए हमले तेज कर दिए हैं. 21 मार्च को रोसनेफ्ट की सारातोव रिफाइनरी पर हमले में प्रोसेसिंग यूनिट और स्टोरेज टैंक क्षतिग्रस्त हो गए.
इसके बाद 23 मार्च को प्रिमोर्स्क के बाल्टिक सागर तेल टर्मिनल और ऊफा की रिफाइनरी पर भी हमले हुए. इससे स्टोरेज टैंकों में आग लग गई और निर्यात प्रभावित हुआ. इन हमलों में सैकड़ों ड्रोन इस्तेमाल किए गए, जिन्होंने 1400 किलोमीटर दूर तक के लक्ष्य साधे. हालांकि, रूस भारत की मांग के सहारे निर्यात बनाए रखने की कोशिश कर रहा है.
इसके बावजूद लगातार हो रहे हमले रूस की सप्लाई क्षमता पर दबाव बना रहे हैं. भारत पहले ही रियायती दरों पर रूसी तेल का बड़ा खरीदार बन चुका है. होर्मुज स्ट्रेट में रुकावट के चलते यह निर्भरता और बढ़ सकती है. अमेरिका भी इस संकट से अछूता नहीं है. 23 मार्च को टेक्सास के पोर्ट आर्थर में वैलेरो रिफाइनरी में धमाके के बाद काम रोकना पड़ा.
यह रिफाइनरी रोजाना करीब 4.35 लाख बैरल तेल प्रोसेस करती है और अमेरिका की बड़ी सुविधाओं में गिनी जाती है. हालांकि, यह एक औद्योगिक दुर्घटना थी, लेकिन इसके चलते ईंधन उत्पादन में बाधा आई. ऐसे समय में जब अमेरिका का भारत को तेल निर्यात तेजी से बढ़ रहा है, यह रुकावट वैश्विक सप्लाई पर और दबाव डाल सकती है.
इन सभी घटनाओं का असर सीधे तेल बाजार पर पड़ा है. 18 से 20 मार्च के हमलों के बाद ब्रेंट क्रूड 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था. इसके बाद कुछ गिरावट आई, लेकिन कीमतें फिर से 100 डॉलर के पार पहुंच गईं. युद्ध से पहले यह कीमत 70 से 73 डॉलर के बीच थी. LNG सप्लाई पर भी गंभीर असर पड़ा है. कतर की उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा प्रभावित हुआ है.
इससे वैश्विक आपूर्ति में लंबी अवधि तक कमी की आशंका है. अनुमान है कि इससे सालाना अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है. होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के करीब 20 फीसदी तेल की सप्लाई गुजरती है, वहां बढ़ता तनाव हालात को ज्यादा जटिल बना रहा है. बार-बार हमलों से यह डर गहरा गया है कि इस रास्ते से सप्लाई लंबे समय तक बाधित रह सकती है.
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इस पूरे संकट को वैश्विक तेल बाजार के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी आपूर्ति रुकावट करार दिया है. मार्च महीने में ही रोजाना करीब 80 लाख बैरल तेल की कमी दर्ज की गई है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि मिडिल ईस्ट और यूक्रेन में जारी संघर्ष जल्द नहीं थमा, तो दुनिया को ऊर्जा संकट और महंगाई का सामना करना पड़ सकता है.
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