क्या एक नई ईस्ट इंडिया कंपनी का उदय हो रहा है? रुबियो का भाषण ट्रंप के साम्राज्यवादी दबदबे का संकेत है

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का भाषण बिना किसी लाग-लपेट के विस्तारवादी था. उन्होंने इंडस्ट्री को फिर से बनाने, बॉर्डर को कंट्रोल करने और संप्रभुता को वापस पाने के बारे में बात की. इस दौरान उनका टोन शक्ति के मद में डूबे एक कोलोनाइजर जैसा था. विशेषज्ञों ने कहा है कि भारत को इस टोन की निंदा करनी चाहिए.

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मार्को रुबियो ने दुनिया में पश्चिमी प्रभुत्व कायम करने की बात की है. (Photo: Reuters) मार्को रुबियो ने दुनिया में पश्चिमी प्रभुत्व कायम करने की बात की है. (Photo: Reuters)

सुशीम मुकुल

  • नई दिल्ली,
  • 16 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:36 PM IST

18वीं और 19वीं सदी के ज़्यादातर समय में यूरोपियन ताकतों ने मार्केट और कच्चे माल की होड़ में एशिया और अफ्रीका को बांट लिया. रेलवे बिछाई गईं और पोर्ट बनाए गए. यहां से निकले संसाधनों का इस्तेमाल स्थानीय उद्योगों के विकास में नहीं किया गया, बल्कि उन्हें यूरोप भेज दिया गया. इनकी बहुत बड़ी इंसानी और आर्थिक कीमत चुकानी पड़ी. 

अब सदियों बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पश्चिमी देशों से कब्जे की इस जंग में फिर से उतरने को कहा है. ताकि 'ग्लोबल साउथ की इकॉनमी में मार्केट शेयर' पर कब्जा किया जा सके. कई विशेषज्ञ इसे ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन की कॉलोनाइज़ेशन की कोशिश के तौर पर देखते हैं, इन देशों ने कहा है कि भारत को इस बयान की भर्त्सना करनी चाहिए.

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म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए मार्को रुबियो ने इसे "नई पश्चिमी सदी" बनाने का हिस्सा बताया.

म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस विदेश और सिक्योरिटी पॉलिसी पर दुनिया के सबसे असरदार सालाना फोरम में से एक है. इसमें 70 से ज़्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष, मंत्री, मिलिट्री चीफ, डिप्लोमैट और पॉलिसी एक्सपर्ट ग्लोबल सिक्योरिटी चुनौतियों पर बहस करने के लिए इकट्ठा होते हैं. 

रुबियो का साम्राज्यवादी नजरिया आधुनिक विश्व के लिए एक चौंका देने वाला ऐलान है. ऐसा इसलिए क्योंकि ग्लोबल साउथ के ज़्यादातर हिस्सों में गुलामी के जख्म अभी भी ताज़ा हैं. इसलिए एक बड़ा सवाल सवाल पैदा हो रहा है- क्या ग्लोबल साउथ को आर्थिक दबदबे के एक नए दौर का सामना करना पड़ेगा? 

और इस बार हो सकता है कि इसे सीधे यूरोप लीड न करे, बल्कि ये जिम्मेदारी यूनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका निभाए. 

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यहां ग्लोबल साउथ का मतलब है विकासशील देशों का एक ऐसा समूह जो एक जैसा नहीं है. इसमें मुख्य रूप से अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और ओशिनिया के देश शामिल हैं. 

मार्को रुबियो ने ग्लोबल साउथ पर कहा क्या था?

शुक्रवार 14 फरवरी को दिए गए रुबियो के भाषण का लहजा बिना किसी शर्म के विस्तारवादी था. उन्होंने कहा कि "हम एक सभ्यता, पश्चिमी सभ्यता का हिस्सा हैं" उन्होंने इंडस्ट्री को फिर से बनाने, बॉर्डर को कंट्रोल करने और संप्रभुता को वापस पाने के बारे में बात की.

रुबियो ने दूसरे विश्व युद्ध के आखिर तक पश्चिमी ताकत की स्थिति का आकलन किया.  उन्होंने कहा कि "पांच सदियों तक दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने से पहले पश्चिम फैल रहा था," जिसमें "मिशनरी, उसके तीर्थयात्री, उसके सैनिक, उसके खोजकर्ता उसके किनारों से निकल रहे थे."

उन्होंने तर्क दिया कि 1945 में "कोलंबस के जमाने के बाद पहली बार यह सिकुड़ रहा था", क्योंकि यूरोप बर्बाद हो रहा था और साम्राज्य "खत्म होने की कगार पर" थे. उन्होंने आगे कहा कि यह गिरावट "ईश्वर रहित कम्युनिस्ट क्रांतियों और उपनिवेशवाद विरोधी विद्रोहों से और तेज हुई.

उन्होंने कॉलोनियों के खत्म होने को पश्चिम की ताकत का ह्रास बताया.

अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा कि नए गठबंधन को जरूरी मिनरल्स के लिए एक पश्चिमी सप्लाई चेन बनाने पर ध्यान देना चाहिए, जिस पर दूसरी ताकतें हावी न हो सके. उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ की अर्थव्यवस्थाओं में मार्केट शेयर के लिए मुकाबला करने के लिए एक साथ कोशिश करनी चाहिए.

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अमेरिका के दबदबे की चाहत में रुबियो ने म्यूनिख में यूरोपियन साथियों की मदद मांगी.  उन्होंने ग्लोबल साउथ को साफ तौर पर एक कॉम्पिटिटिव फ्रेमवर्क में रखा, पार्टनर के तौर पर नहीं. बल्कि एक इकोनॉमिक स्पेस के तौर पर जहां पश्चिम को अपनी जमीन वापस हासिल करनी होगी.

रुबियो ने 14 फरवरी को कहा, "हम सब मिलकर न सिर्फ अपनी इंडस्ट्रीज और सप्लाई चेन पर कंट्रोल वापस पा सकते हैं, बल्कि उन एरिया में भी तरक्की कर सकते हैं जो 21वीं सदी को तय करेंगे."

क्या ट्रंप एक नई ईस्ट इंडिया कंपनी बना रहे हैं?

सत्ता में लौटने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप US की विदेश नीति को लगभग एक फ़ैमिली एंटरप्राइज़ की तरह चला रहे हैं. यही नहीं कई मायनों में एडमिनिस्ट्रेशन भी उसी तरह काम करता दिख रहा है. उनके परिवार के सदस्यों वाली एक क्रिप्टो काउंसिल ने पाकिस्तानियों के साथ एक डील साइन की. मादुरो की किडनैपिंग. गाज़ा में उनकी कोशिशें उनके अपने इनफ़ॉर्मल बोर्ड ऑफ़ पीस के साथ आती हैं. उनके फैसले केंद्रीकृत होते हैं और निजी तौर पर लिए जाते हैं. 

रुबियो का यह विस्तारवादी भाषण अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के प्रेसिडेंट निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को किडनैप करने वहां के तेल पर कब्जा करने के कुछ ही हफ़्ते बाद आया है.

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18वीं सदी में लंदन की ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह, वाशिंगटन की ट्रंप सरकार ग्लोबल ट्रेड पर हुक्म चलाने की कोशिश कर रही है. अमेरिका ने रूस से कच्चा तेल खरीदने पर भारत पर बैन लगाया है और चाहता है कि नई दिल्ली वेनेजुएला का तेल खरीदे जिसे वह कंट्रोल कर रहा है. हालांकि  भारत ने कहा है कि उसकी एनर्जी सिक्योरिटी उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और यही पॉलिसी उसके तेल ट्रेड और पार्टनर तय करेगी.

भारत के सुरक्षा एक्सपर्ट ब्रह्मा चेलानी ने कहा कि "पहचान और सभ्यता की बहाली के नज़रिए से पश्चिम के भविष्य को देखकर रुबियो ने ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के नेटिविस्ट और आइडेंटिटेरियन विचारों को इंटेलेक्चुअल रूप देने की कोशिश की, जो व्हाइट सुप्रीमेसिस्ट बहस में पाए जाने वाले विषयों की याद दिलाते हैं."

चेलानी ने X पर लिखा, "सीधे शब्दों में कहें तो रुबियो ने जो विज़न बताया है, वह सिर्फ़ पावर का बैलेंस नहीं चाहता; बल्कि यह एक वैश्विक पदानुक्रम को फिर से बनाना चाहता है जो स्वाभाविक रूप से अपने हित की बात करता है और दुनिया को यूरोपियन साम्राज्यवाद और पश्चिमी दादागीरी के पुराने दौर की याद दिलाता है."

रुबियो के भाषण पर रिएक्ट करते हुए फ्रेंच एंटरप्रेन्योर और जियोपॉलिटिकल कमेंटेटर अर्नॉड बर्ट्रेंड ने कहा, "यह सबसे ज़्यादा साम्राज्यवादी भाषणों में से एक है जो मैंने कभी किसी सीनियर अमेरिकी अधिकारी को देते देखा है."

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रुबियो की घोषणाएं क्यों चिंताजनक है?

रुबियो का दायरा चिंताजनक है. यह दबदबे के बारे में है. उन्होंने कहा कि पश्चिम को अब "तथाकथित ग्लोबल ऑर्डर को अपने लोगों और हमारे देशों के जरूरी हितों से ऊपर नहीं रखना चाहिए." इससे पता चलता है कि आर्थिक मकसद पाने के लिए एक कड़ा रुख अपनाया जाएगा, जहां पश्चिमी हित सबसे अहम होंगे और स्ट्रेटेजिक फायदे का खुले तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा. 

कई ग्लोबल साउथ देशों के लिए यह जाना-पहचाना लगता है. पहले पश्चिमी मुकाबले का मतलब था संसाधनों और असंतुलित व्यापार की होड़. आज रुबियो ने ग्लोबल साउथ को जरूरी मिनरल, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, AI और एनर्जी के लिए जंग का मैदान बना दिया है. 

तरीका बदल गया है. भाषा बदल गई है और इरादे पर सवाल उठ खड़ा हुआ है. 


 

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