Orphan Pearl of the Persian Gulf: ईरान की बुशहर बंदरगाह से 55 किलोमीटर आगे और ईरान की सरहदी जमीन से सिर्फ 28 किलोमीटर के फासले पर मौजूद है ‘ऑर्फन पर्ल ऑफ द पर्शियन गल्फ’ यानी फारस की खाड़ी का अनाथ मोती. जिसका असली नाम खार्ग आईलैंड है, जिसे कभी खारक, खाराज या खारेज के नाम से भी जाना गया. सिर्फ 8 किलोमीटर लंबा और 5 किलोमीटर चौड़ा ये वो द्वीप है जो अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी जंग को ना सिर्फ तीसरे विश्वयुद्ध में बदल सकता है बल्कि पूरी दुनिया को तिल-तिल के लिए तेल से तरसा सकता है.
एक हमला और चार बड़े संकट
अगर ईरान पिछले 13 दिनों से सुपर पावर अमेरिका और इजरायल से एक साथ लोहा ले रहा है तो सिर्फ और सिर्फ इस एक आईलैंड की वजह से. वो सिर्फ एक आईलैंड नहीं है, बल्कि ईरान की लाइफलाइन है. दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल उत्पादन करने वाले ईरान के तेल का 90 फीसदी कारोबार इसी एक छोटे आईलैंड से ही चलता है. बस यूं समझ लीजिए कि अगर इस एक आईलैंड पर अमेरिका या इजरायल ने गलती से भी हमला कर दिया तो एक साथ चार चीजें होंगी. तीसरा विश्वयुद्ध, पूरी मिडिल ईस्ट की बर्बादी, पूरी दुनिया में तेल के लिए हाहाकार और ईरान का कंगाल होना.
अमेरिका की रेड लाइन क्यों है खार्ग?
दरअसल, अमेरिका के लिए ये खार्ग आईलैंड एक रेड लाइन है. एक ऐसी लक्ष्मण रेखा जिसे ना ट्रंप पार कर सकते हैं, ना उनसे पहले के किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पार करने की कोशिश की. क्योंकि अंजाम सबको पता है. इस आईलैंड पर हमले का मतलब है ईरान का ऐसा पलटवार, जो इससे पहले कभी दुनिया ने देखा ही ना हो. बस यही वजह है कि जंग के 13 दिन बीत चुके हैं. ईरान अब भी अमेरिका और इजरायल को घायल कर रहा है. अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान के तमाम ठिकानों पर बमबारी कर रहे हैं. लेकिन इस एक आईलैंड पर इन 13 दिनों में अमेरिका और इजरायल ने एक भी बम नहीं गिराया. बल्कि उल्टे आलम ये है कि एक तरफ पूरा ईरान जंग लड़ रहा है और दूसरी तरफ उसी ईरान के इस छोटे से द्वीप से आम दिनों की तरह अब भी दुनिया को तेल की सप्लाई जारी है.
इतना अहम क्यों है खार्ग द्वीप?
आखिर क्या है ये खार्ग द्वीप? और क्यों इतना अहम है कि इस एक द्वीप पर हमले से तीसरा विश्वयुद्ध छिड़ सकता है? और सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये द्वीप ईरान के लिए इतना खास क्यों है? और अमेरिका व इजरायल को ये खौफ क्यों है कि इस एक द्वीप के चलते पूरी दुनिया जंग की चपेट में आ जाएगी? तो चलिए 8 किलोमीटर लंबे और 5 किलोमीटर चौड़े इस द्वीप की वो कहानी सुनाते हैं, जिसे सुनने के बाद आप खुद मानने को मजबूर हो जाएंगे कि ये एक द्वीप पूरी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध में झोंक सकता है.
पुर्तगाल से लेकर ईरान तक का सफर
पुर्तगालियों और डच ईस्ट इंडिया कंपनी से होते हुए कई हाथों से गुजर कर ये छोटा सा खार्ग आईलैंड 20वीं सदी में ईरान का हिस्सा बना. 1925 से 1941 तक ईरान के शाह रहे रजा शाह पहलवी के दौर में इस द्वीप का इस्तेमाल राजनीतिक कैदियों को रखने के लिए किया जाता था. क्योंकि ये ईरान की सरहदी जमीन से अलग एकांत में एक ऐसा द्वीप था, जैसा ठीक अंग्रेजों के वक्त में अंडमान-निकोबार यानी काला पानी. हालांकि रजा शाह पहलवी की हुकूमत से करीब 17 साल पहले ही 1908 में ईरान में तेल के भंडार का पता चल चुका था. लेकिन ईरान में असल में मॉडर्न पेट्रोलियम दौर की शुरुआत 1958 में हुई, जब उन्हें तेल और गैस की अहमियत का अंदाजा हुआ. 1960 तक विदेशी निवेश और कंपनियों की मदद से ईरान एक बड़े ऑयल एक्सपोर्ट सेंटर के तौर पर उभरना शुरू हुआ.
गहरे समुद्र ने बदल दी खार्ग की किस्मत
दरअसल, दुनिया भर के जिन बंदरगाहों पर बड़े-बड़े जहाज डॉक करते हैं, यानी आकर लंगर डालते हैं, उन जहाजों को डॉक करने के लिए उस जगह पर काफी गहराई की जरूरत होती है. ईरान के जितने भी बंदरगाह हैं, जिनमें होर्मुज तक शामिल है, उन सबके मुकाबले खार्ग द्वीप की खासियत ये है कि बेहद छोटा होने के बावजूद यहां समंदर की गहराई काफी ज्यादा है. इस गहराई का फायदा ये होता है कि तेल ढोने वाले दुनिया के जो सबसे बड़े जहाज होते हैं, वो भी यहां आसानी से डॉक कर सकते हैं. बस इसी खासियत के चलते ईरान ने तय किया कि वो अपने देश का तेल दुनिया के बाजार में इसी रास्ते से भेजेगा.
बना ईरान का सबसे बड़ा तेल टर्मिनल
तैयारी शुरू हुई. ईरान के तेल सप्लाई का सबसे बड़ा टर्मिनल इसी द्वीप में बनाने का काम 1960 में ईरान ने एक अमेरिकी कंपनी को दिया. ईरान के जो तीन सबसे बड़े इलाके हैं, जहां से तेल बाहर निकाला जाता है, वो अहवाज, मरून और गचसरान हैं. इन सभी जगहों से कच्चे तेल को पाइप के जरिए अब टर्मिनल यानी खार्ग द्वीप तक पहुंचाने का काम शुरू हुआ. इसके लिए इस द्वीप के नीचे समंदर में पाइप बिछाई गई. धीरे-धीरे एक वक्त ऐसा आया जब ईरान का 90 फीसदी तेल इसी एक द्वीप यानी खार्ग द्वीप के रास्ते दुनिया के बाजारों तक पहुंचने लगा और ये सिलसिला आज भी जारी है.
हमला हुआ तो कैसे भड़केगा विश्व युद्ध?
अब आप सोच रहे होंगे कि इस एक द्वीप से तीसरा विश्वयुद्ध कैसे हो सकता है. इसकी तीन वजह हैं. पहला, चूंकि ये आईलैंड ईरान की इकॉनमी का सबसे बड़ा स्रोत है, इसलिए ये उसके अस्तित्व का सवाल है. दूसरा, अगर इस पर हमला हुआ तो ईरान सबसे पहले होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर सकता है और हमलावर देशों पर पलटवार करेगा. तीसरा, अगर खार्ग से तेल की सप्लाई बंद हो गई तो पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट पैदा हो जाएगा.
चीन और रूस की एंट्री से बढ़ेगा संकट
तीसरा कारण ये भी है कि खार्ग द्वीप के तेल का चीन सबसे बड़ा खरीदार है. ऐसे में इस हमले के बाद चीन समेत ईरान के बाकी दोस्त, जिनमें रूस भी शामिल है, इस जंग में कूद सकते हैं. क्योंकि बात तब सिर्फ ईरान पर हमले की नहीं होगी बल्कि अमेरिका को कटघरे में खड़ा किया जाएगा कि उसने खार्ग पर हमला कर पूरी दुनिया में तेल का संकट पैदा कर दिया है.
अभेद किले में बदला खार्ग
हालांकि खार्ग द्वीप को बर्बाद करना या उस पर हमला करना इतना आसान भी नहीं है. दरअसल, ईरान की लाइफलाइन होने की वजह से इस द्वीप पर सुरक्षा के जो इंतजाम हैं, उन्हें अभूतपूर्व कहा जा सकता है. ये पूरा द्वीप ही प्रतिबंधित क्षेत्र है. आम लोग तो छोड़िए, बड़े-बड़े सरकारी या सेना के अफसर भी बिना पूर्व इजाजत के यहां कदम नहीं रख सकते. ईरान ने इस आईलैंड को किसी भी हमले से बचाने के लिए इसे एक किले में तब्दील कर रखा है.
मिसाइलों और सुरंगों से लैस सुरक्षा
ये पूरा द्वीप ईरान की सबसे ताकतवर फोर्स ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स यानी IRGC के कंट्रोल में है. इस द्वीप पर ईरान की सबसे खतरनाक मिसाइलें S-300 और बावर-373 तैनात हैं, जो दुश्मन के किसी भी हमले का पलक झपकते जवाब दे सकती हैं. यहां समंदर के नीचे सीक्रेट टनल और कमांड सेंटर बनाए गए हैं ताकि किसी हवाई हमले के दौरान भी ऑपरेशन जारी रहे. IRGC की फास्ट अटैक क्राफ्ट्स और पनडुब्बियां 24 घंटे इस द्वीप के चारों तरफ गश्त करती रहती हैं.
ईरान-इराक युद्ध में भी नहीं रुकी सप्लाई
शायद यही वजह है कि खुद इजरायल, जो ईरान के अलग-अलग तेल ठिकानों और न्यूक्लियर ठिकानों पर बम गिरा चुका है, उसने भी कभी खार्ग को निशाना बनाने की कोशिश नहीं की. हालांकि ऐसा भी नहीं है कि कभी खार्ग पर हमला नहीं हुआ. 1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध के दौरान ईराक ने सैकड़ों बार खार्ग द्वीप पर हवाई हमले किए थे. लेकिन इन हमलों के बावजूद ईरान ने कभी इसे पूरी तरह बंद नहीं होने दिया.
दुनिया की तेल सप्लाई का अहम केंद्र
खार्ग आईलैंड पर करीब 3 करोड़ बैरल तेल स्टोर करके रखने की क्षमता है. एक रिपोर्ट के मुताबिक जंग के बावजूद अब भी इस द्वीप पर 1.8 करोड़ बैरल तेल स्टोरेज में मौजूद है, जो आम हालात में 10 से 12 दिनों तक दुनिया के बाजारों में भेजने के लिए काफी है. ईरान इस वक्त करीब 33 लाख बैरल कच्चे तेल का उत्पादन करता है. इसके अलावा 13 लाख बैरल कंडेन्सेट और दूसरे लिक्विड ईंधन का भी उत्पादन करता है. इस एक छोटे से द्वीप से हर रोज 50 लाख बैरल से ज्यादा तेल बड़े-बड़े जहाजों में लोड किया जाता है. यही वजह है कि जंग में हालात जो भी हों, ईरान को फारस की खाड़ी के इस अनाथ मोती को संभालना जरूरी भी है और मजबूरी भी.
(मनीषा झा के साथ सुप्रतिम बनर्जी की रिपोर्ट)
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