कहीं समर्थन, कहीं विरोध... ईरान की जंग पर क्या कह रही वेस्टर्न और मिडिल ईस्ट की मीडिया?

इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने वैश्विक मीडिया को दो धड़ों में बांट दिया है. पश्चिमी मीडिया ने हमलों को सुरक्षा और रणनीतिक जरूरत बताया, जबकि मिडिल ईस्ट की मीडिया ने इसे आक्रामक कदम और क्षेत्रीय अस्थिरता की वजह माना. पढ़ें ईरान युद्ध पर क्या पश्चिमी और खाड़ी मीडिया का रुख...

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ईरान में इजरायल-US की जंग दूसरे दिन में प्रवेश कर गया है. (Photo- ITG) ईरान में इजरायल-US की जंग दूसरे दिन में प्रवेश कर गया है. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 01 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:11 PM IST

इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच शुरू हुई जंग ने दुनिया भर की मीडिया को मानो दो धड़ों में बांट दिया है. इज़रायल ने अमेरिका के समर्थन से ईरान के परमाणु ठिकानों, मिसाइल गोदामों और तेहरान में मौजूद बड़े नेताओं को निशाना बनाया. खबरों के मुताबिक 200 से ज्यादा लड़ाकू विमान इस ऑपरेशन में शामिल थे. 

इसके जवाब में ईरान ने इज़रायल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं. इजरायल की आयरन डोम और अरब सहयोगी देशों की एयर डिफेंस सिस्टम ने ज्यादातर मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को दुनिया की मीडिया ने अलगअलग तरीके से दिखाया.

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ईरान पर इजरायल-US के हमले को लेकर पश्चिमी मीडिया का रुख

पश्चिमी मीडिया के बड़े चैनलों ने इन हमलों को ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ जरूरी कदम बताया. CNN ने इसे एक बड़ा और योजनाबद्ध हमला बताया और कहा कि 30 से ज्यादा ठिकानों को निशाना बनाया गया. चैनल ने अमेरिकी बी-2 बॉम्बर्स और इजरायली सेना की जानकारी को प्रमुखता से दिखाया. रिपोर्टिंग का अंदाज ज्यादातर फैक्ट आधारित रहा, लेकिन इजरायल के इस तर्क को भी जगह दी गई कि यह उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी था. संयुक्त राष्ट्र की अपील का जिक्र भी हुआ, मगर ध्यान सैन्य कार्रवाई और उसकी सफलता पर ज्यादा रहा.

रिपब्लिकन पार्टी के मुखपत्र कहे जाने वाले Fox News ने इस ऑपरेशन को और ज्यादा मजबूत और आक्रामक शब्दों में दिखाया. चैनल ने इसे राष्ट्रपति ट्रंप की बड़ी रणनीतिक जीत बताया. ईरान के पुराने विवादों और 1979 के दूतावास संकट का जिक्र करते हुए कार्रवाई को सही ठहराया गया. यहां कवरेज में अमेरिकी ताकत और संभावित शासन बदलाव पर ज्यादा चर्चा हुई, जबकि आम लोगों के नुकसान पर कम फोकस दिखा.

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वहीं MSNBC ने इस हमले पर सवाल उठाए. चैनल ने पूछा कि क्या अमेरिका को बिना कांग्रेस की मंजूरी के ऐसे हमले में शामिल होना चाहिए था. रिपोर्टिंग में क्षेत्रीय युद्ध का खतरा, नागरिकों की मौत और कूटनीतिक बातचीत के खत्म होने पर ज्यादा चर्चा देखी गई. कई विशेषज्ञों ने आशंका जताई कि यह टकराव पूरे मध्य पूर्व को जंग में धकेल सकता है.

अखबारों में The New York Times ने विस्तार से बताया कि जून 2025 से तनाव कैसे बढ़ता गया और आखिरकार फरवरी 2026 में हमले तक बात पहुंची. रिपोर्ट में अमेरिकी और इजरायली अधिकारियों के बयान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की चिंताओं को भी शामिल किया गया. खबर संतुलित रखने की कोशिश दिखी, लेकिन यह भी बताया गया कि इससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है.

The Washington Post ने भी घटनाक्रम, हताहतों के आंकड़े और खाड़ी देशों के सैन्य ठिकानों पर हमलों के खतरे को विस्तार से बताया.

PBS NewsHour और Reuters की रिपोर्टिंग शांत और सीधे तथ्यों पर आधारित रही. इन संस्थानों ने हमलों की पुष्टि, जवाबी कार्रवाई और आधिकारिक बयानों को बिना ज्यादा टिप्पणी के पेश किया.

अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान की जंग पर मिडिल ईस्ट की मीडिया का रुख

मध्य पूर्व की मीडिया का नजरिया इससे काफी अलग था. Al Jazeera ने इसे अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमला बताया और नागरिकों की मौत और क्षेत्रीय अस्थिरता पर जोर दिया. चैनल के विश्लेषकों ने कहा कि यह कदम तनाव को और बढ़ा सकता है और कूटनीति की विफलता इसका कारण बनी.

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Al Arabiya ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमलों की जानकारी दी, लेकिन साथ ही यह भी दिखाया कि खाड़ी देश सीधे जंग में नहीं कूदना चाहते. रिपोर्टिंग में संतुलन रखने की कोशिश दिखी, जहां ईरान को खतरे के रूप में भी दिखाया गया और बड़े युद्ध से बचने की जरूरत पर भी जोर दिया गया.

Middle East Eye ने इस हमले को क्षेत्र की ताकत का संतुलन बदलने की कोशिश बताया. रिपोर्ट में ईरान की प्रतिक्रिया, संभावित जवाब और फिलिस्तीन के मुद्दे से जुड़े असर पर चर्चा की गई.

इस पूरे मामले में साफ दिखा कि हर मीडिया संस्थान ने अपने दर्शकों और राजनीतिक माहौल के हिसाब से खबर को पेश किया. पश्चिमी मीडिया ने ईरान के पुराने इतिहास और परमाणु कार्यक्रम को केंद्र में रखा, जबकि अरब मीडिया ने आम लोगों के नुकसान और अंतरराष्ट्रीय कानून के सवाल उठाए. मसलन, खाड़ी देशों की मीडिया ने सावधानी भरा रुख अपनाया.

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