अमेरिका-ईरान जंग अब पांचवें हफ्ते में पहुंच चुकी है, लेकिन इसका अंत कब होगा यह सवाल आज भी उतना ही उलझा हुआ है. वजह सिर्फ जंग के हालात नहीं, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार बदलते बयान भी हैं. पिछले करीब एक महीने में ट्रंप ने जंग को लेकर जितनी बार तारीखें और दावे बदले हैं, उसने एक तरह का "पलटी मार कैलेंडर" बना दिया है.
28 फरवरी को जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले शुरू किए, तब ट्रंप ने दुनिया के सामने साफ दावा किया कि यह हमला इसलिए जरूरी था क्योंकि ईरान परमाणु हथियार बनाने की ओर बढ़ रहा था. शुरुआती दिनों में उनका रुख आक्रामक और आत्मविश्वास से भरा था. उन्होंने दावा किया कि जंग जल्दी खत्म हो जाएगी और ईरान ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा.
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लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, ट्रंप के बयान बदलने लगे. 28 फरवरी को उन्होंने कहा कि जंग "2-3 दिन" में खत्म हो जाएगी. इसके अगले ही दिन, 1 मार्च को यह समय बढ़ाकर "4 हफ्ते" कर दिया गया. 6 मार्च को उन्होंने कहा कि ईरान "सरेंडर करने वाला है", जबकि 9 मार्च तक आते-आते उन्होंने दावा कर दिया कि जंग "लगभग खत्म" हो चुकी है.
13 मार्च को ट्रंप ने कहा कि ईरान "पूरी तरह तबाह" हो चुका है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग रही. 24 मार्च को उन्होंने 15-सूत्रीय शांति योजना पर बातचीत का जिक्र किया, जिससे संकेत मिला कि जंग खत्म करने के लिए कूटनीति की जरूरत पड़ रही है. 26 मार्च को उन्होंने नई डेडलाइन देते हुए कहा कि 6 अप्रैल तक इंतजार किया जाएगा.
इसके बाद भी उनके बयान नहीं रुके. 30 मार्च को ट्रंप ने कहा कि "लगता है कि बात बन जाएगी", लेकिन 31 मार्च को उन्होंने फिर पलटी मारते हुए कहा कि डील जरूरी नहीं है और जंग समेटने में "2-3 हफ्ते" और लग सकते हैं.
यानी एक ही महीने में ट्रंप कभी जीत का दावा करते दिखे, कभी शांति की बात करते नजर आए और कभी हमले जारी रखने की चेतावनी देते रहे. यही वजह है कि अब उनके बयानों पर भरोसा करना मुश्किल होता जा रहा है.
इस बीच, अमेरिका के अंदर भी ट्रंप के फैसलों को लेकर सवाल उठने लगे हैं. बढ़ती महंगाई, जंग का खर्च और तेल संकट ने जनता की चिंता बढ़ा दी है. वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ट्रंप की नीति को लेकर विरोध सामने आया है. नाटो के कई देशों जैसे स्पेन, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे सहयोगी देशों ने इस जंग से दूरी बना ली है.
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सबसे दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप खुद भी कई मौकों पर यह संकेत दे चुके हैं कि ईरान से अमेरिका को सीधा खतरा नहीं था. इसके बावजूद उन्होंने हमला शुरू किया और अब उसी जंग से बाहर निकलने का रास्ता तलाशते नजर आ रहे हैं.
हालांकि ट्रंप लगातार यह दावा कर रहे हैं कि अमेरिका अपने मुख्य लक्ष्य हासिल कर चुका है, लेकिन जमीनी हालात कुछ और कहानी बताते हैं. ईरान ने न तो सरेंडर किया है, न ही अपनी मिसाइल या परमाणु क्षमताओं को खत्म किया है. होर्मुज स्ट्रेट भी पूरी तरह नहीं खुला है, और क्षेत्र में हमले अब भी जारी हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर जंग लगभग खत्म हो चुकी है, जैसा ट्रंप कहते रहे हैं, तो फिर नई-नई डेडलाइन क्यों दी जा रही हैं?
मसलन, ट्रंप का यह "कैलेंडर" बताता है कि जंग सिर्फ मैदान में नहीं, बल्कि बयानबाजी में भी लड़ी जा रही है. लेकिन लगातार बदलती तारीखों और दावों के बीच यह साफ है कि ईरान जंग का अंत अभी भी अनिश्चित है, और ट्रंप खुद भी शायद इसका स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रहे हैं.
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