ज्वाला मंदिर, गणेश मंत्र और त्रिशूल... अजरबैजान का भारतीय परंपरा से क्या रिश्ता है?

ईरान ने अजरबैजान पर ड्रोन हमला किया है जिससे मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है. अजरबैजान ने ईरान के राजदूत को तलब किया है. अजरबैजान और पाकिस्तान के बीच मजबूत संबंध हैं, जबकि अजरबैजान का भारत के साथ भी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जुड़ाव है.

Advertisement
अजरबैजान की राजधानी बाकू में है आतेशगाह मंदिर अजरबैजान की राजधानी बाकू में है आतेशगाह मंदिर

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 05 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:45 PM IST

ईरान पर इजरायल-अमेरिका के हमले के बाद मिडिल ईस्ट जंग लगातार भड़कती जा रही है. इस आग में अब कई मुल्क जल रहे हैं. इसी में नया नाम अजरबैजान का भी शामिल हुआ है. सामने आया है कि, ईरान ने अजरबैजान पर ड्रोन हमला किया है. अजरबैजान ने स्पष्टीकरण के लिए ईरान के राजदूत को तलब किया है. बता दें कि ऑपरेशन सिंदूर के समय अजरबैजान ने पाकिस्तान को सपोर्ट किया था और समर्थन देते हुए इस्लामाबाद से सहानुभूति जताई थी. ईरान ने पाकिस्तान के ही 'दोस्त' को इस जंग में निशाना बना दिया है.

Advertisement

दरअसल अजरबैजान का नाम भारत में इसलिए अचानक चर्चा में आ गया, क्योंकि यह देश लंबे समय से पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आता रहा है. तुर्की की तरह अजरबैजान भी कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर पाकिस्तान के पक्ष में बयान देता रहा है. भारत द्वारा चलाए गए “ऑपरेशन सिंदूर” के दौरान भी अजरबैजान ने पाकिस्तान के प्रति सहानुभूति जताई थी. इसलिए जब इस देश ने खुद पर ईरान के ड्रोन हमले का आरोप लगाया तो भारत में भी इसकी चर्चा होने लगी.

पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान और अजरबैजान के रिश्ते काफी मजबूत हुए हैं. रक्षा सहयोग, कूटनीतिक समर्थन और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक-दूसरे के पक्ष में बयान देने जैसी गतिविधियां इन संबंधों को और मजबूत बनाती रही हैं. पाकिस्तान कई बार अजरबैजान के मंचों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए भी करता रहा है.

Advertisement

भारत से जुड़ी है सांस्कृतिक विरासत

दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक स्तर पर पाकिस्तान के करीब दिखने वाला यही अजरबैजान सांस्कृतिक रूप से भारत से भी गहरे संबंध रखता है. इसकी झलक वहां मौजूद एक प्राचीन धार्मिक स्थल में मिलती है. अजरबैजान की राजधानी Baku के पास स्थित एक मंदिरनुमा स्थल इस सांस्कृतिक संबंध का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है.

यह स्थान आतेशगाह फायर टेंपल के नाम से जाना जाता है. ‘आतेश’ शब्द फारसी के ‘आतिश’ से लिया गया है, जिसका अर्थ आग होता है, जबकि ‘गाह’ का अर्थ निवास होता है. इस तरह आतेशगाह का अर्थ हुआ ‘अग्नि का स्थान’ या ‘अग्नि का निवास’. इस कारण इसे कई बार ज्वाला मंदिर भी कहा जाता है.

मंदिर में मिले संस्कृत शिलालेख
आतेशगाह परिसर में मिले कई शिलालेख इस स्थल की भारतीय कड़ी की ओर इशारा करते हैं. यहां एक शिलालेख पर संस्कृत में ‘श्री गणेशाय नमः’ और ‘ऊं आग्नेय नमः’ जैसे वाक्य अंकित मिले हैं. इन शिलालेखों के कारण यह स्थान लंबे समय से इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

इसी वजह से यह बात भी सामने आती है कि भारतीय धार्मिक परंपराओं का प्रभाव कभी मध्य एशिया तक फैला हुआ था. भगवान गणेश को सनातन परंपरा में बुद्धि और ज्ञान के देवता माना जाता है और उनकी पूजा भारत के बाहर भी कई स्थानों पर होने के प्रमाण मिलते हैं.

Advertisement

सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में बना परिसर
इतिहासकारों के अनुसार आतेशगाह का वर्तमान ढांचा 17वीं और 18वीं शताब्दी के बीच विकसित हुआ. उस समय यह क्षेत्र व्यापारिक गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था. भारत, मध्य एशिया और पश्चिमी एशिया को जोड़ने वाले कई व्यापार मार्ग इसी इलाके से होकर गुजरते थे. इसी कारण भारतीय व्यापारी भी बड़ी संख्या में यहां पहुंचते थे.

कुछ शोध में यह भी बताया गया है कि उस दौर में हिंदू, सिख और पारसी समुदाय के लोग इस इलाके में आते-जाते थे. पारसी समुदाय भी अग्नि को पवित्र मानता है और आग की पूजा करता है. इस वजह से आतेशगाह परिसर को कई बार हिंदू और पारसी परंपराओं से जुड़े स्थल के रूप में भी देखा जाता है.

आतेशगाह का परिसर पंचभुज आकार के अहाते में बना हुआ है. बीच में एक छोटा मंदिरनुमा ढांचा है और उसके चारों ओर कमरे बने हुए हैं. माना जाता है कि इन कमरों में कभी साधक या उपासक रहा करते थे. इस संरचना की छत पर त्रिशूल जैसा चिन्ह भी दिखाई देता है, जिसे कई लोग भारतीय धार्मिक प्रतीकों से जोड़कर देखते हैं.

1883 के बाद जब इस क्षेत्र में पेट्रोल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार मिलने लगे तो धीरे-धीरे यहां धार्मिक गतिविधियां कम हो गईं. बाद में यह स्थान ऐतिहासिक स्मारक के रूप में संरक्षित किया गया और अब यहां संग्रहालय भी बनाया गया है. आज दुनिया भर से पर्यटक इस स्थल को देखने आते हैं.

Advertisement

भारत-अजरबैजान संबंधों का इतिहास

राजनीतिक रूप से अजरबैजान और भारत के संबंध भी लंबे समय से बने हुए हैं. जब 1991 में अजरबैजान सोवियत संघ से अलग होकर स्वतंत्र देश बना तो भारत उन शुरुआती देशों में शामिल था जिसने उसे मान्यता दी. बाद में दोनों देशों ने कूटनीतिक मिशन भी स्थापित किए.

भारत और अजरबैजान के बीच व्यापारिक संबंध भी काफी सक्रिय रहे हैं. भारत चावल, दवाइयां, मोबाइल फोन, मशीनरी और कई अन्य वस्तुएं अजरबैजान को निर्यात करता है, जबकि अजरबैजान से कच्चे तेल की खरीद भी की जाती है. इसके अलावा भारतीय फिल्मों की शूटिंग और पर्यटन के लिहाज से भी अजरबैजान भारतीयों के बीच लोकप्रिय रहा है.

लेकिन हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ अजरबैजान की बढ़ती नजदीकियों ने भारत में कई लोगों को हैरान किया है. खासकर तब, जब इस देश के साथ भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कड़ियां भी सामने आती रही हैं. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement