पश्चिम एशिया की बढ़ती तनातनी के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर नई रणनीतिक बहस शुरू हो गई है. विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की हालिया रणनीतिक भाषा और अमेरिकी सुरक्षा संकेत इस ओर इशारा करते हैं कि वॉशिंगटन होर्मुज को केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा क्षेत्र के रूप में स्थापित करना चाहता है. हालांकि सीधे अंतरराष्ट्रीय कंट्रोल की कोई औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन संकेत बताते हैं कि अमेरिका तीन स्तरों पर दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है.
ट्रंप की नजर न सिर्फ होर्मुज पर है बल्कि खार्ग और चाबहार पर भी है. विश्लेषकों का मानना है कि ये तीनों स्थान ईरान की भू-आर्थिक संरचना की 'कमजोर नसें' हैं, जिन पर दबाव बनाकर अमेरिका तेहरान को रणनीतिक रूप से घेरने की कोशिश कर सकता है.
अमेरिका लंबे समय से यह तर्क देता रहा है कि होर्मुज केवल ईरान का क्षेत्रीय मामला नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है. ऐसे में ट्रंप प्रशासन के दौरान भी 'मल्टीनेशनल नेवल प्रेजेंस' की अवधारणा सामने आई थी, जिसमें कई देशों की संयुक्त नौसैनिक निगरानी की बात हुई थी.
अगर ट्रंप होर्मुज, खार्ग और चाबहार में अंतरराष्ट्रीय दखल की संभावना को खोल देते हैं तो इससे ईरान की तोल-मोल की शक्ति काफी कम हो जाएगी.
सबसे पहले बात होर्मुज स्ट्रेट की बात करें. यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है. यहां तनाव बढ़ने के बाद ईरान पर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए खतरा बनने का आरोप मजबूत हुआ है और अमेरिका को बहुराष्ट्रीय नौसैनिक दबाव बनाने का अवसर मिलता है. विशेषज्ञ मानते हैं कि इस रास्ते को अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दा बनाना वॉशिंगटन की प्राथमिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
गौरतलब है कि ट्रंप ने जिस तरह से गाजा के पीस बोर्ड का गठन किया था, उसी तर्ज पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए ब्रिटेन 'होर्मुज गठबंधन' बनाने की तैयारी कर रहे हैं. न्यूयॉर्क पोस्ट ने इस तरह की रिपोर्ट जारी की है. ये अलायंस स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बारूदी सुरंगों से मुक्त कराएगा और इसे तेल टैंकरों की आवाजाही के लिए फिर से खोलेगा.
एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन उन लगभग 30 देशों से बात कर रहा है जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के लिए उचित प्रयास करने पर सहमत हैं. इसके ब्रिटेन ने कहा है कि वह या तो रॉयल नेवी का माइन स्वीपर जहाज भेजने या एक नागरिक जहाज किराए पर लेने पर विचार कर रहा है जो उस क्षेत्र में माइन स्वीपिंग ड्रोन लॉन्च कर सके.
वाशिंगटन स्थिति थिंक टैंक Center for Strategic and International Studies की खाड़ी क्षेत्र पर रिपोर्टों में बार-बार कहा गया है कि होर्मुज में मल्टीनेशनल नौसेना की मौजूदगी बढ़ाना अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा रहा है.
ब्रूकिंग इंस्टीट्यूशन के पश्चिम एशिया के विश्लेषणों में यह तर्क दिया गया है कि अमेरिका होर्मुज को वैश्विक एनर्जी चोक प्वाइंट सिक्योरिटी जोन के रूप में पेश करते रहे हैं.
खार्ग द्वीप
दूसरी अहम कड़ी है खार्ग द्वीप. जहां से ईरान का अधिकांश तेल निर्यात होता है. खार्ग पर किसी भी तरह का दबाव सीधे ईरानी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है. विश्लेषकों के अनुसार अगर तेल निर्यात बाधित होता है तो ईरान के भीतर महंगाई और आर्थिक असंतोष बढ़ सकता है, जिससे सरकार पर घरेलू दबाव भी बढ़ेगा.
खार्ग आईलैंड से ईरान का 90% क्रूड ऑयल एक्सपोर्ट होता है. अमेरिका और इजरायल पहले ही यहां मिलिट्री टारगेट्स पर हमला कर चुके हैं. ट्रंप चेतावनी दे चुके हैं कि अगर होर्मुज बाधित हुआ तो खार्ग में ऑयल इंफ्रा पर भी अटैक किया जाएगा.
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ट्रंप प्रशासन खार्ग पर कब्जा या ब्लॉकेड का प्लान बना रहा है ताकि ईरान की आय बंद हो जाए और मजबूर होकर होर्मुज खोल दे. यह ईरान की सबसे बड़ी आर्थिक कमजोरी है.
यूक्रेन में अमेरिका के पूर्व दूत कीथ केलोग ने फॉक्स न्यूज पर कहा कि वे खार्ग द्वीप और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर में सेना उतारने के पक्ष में हैं. उन्होंने कहा कि इसे रोमन स्टाइल में करना चाहिए यानी सैन्य कब्जा करके बाद में इसे सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए.
एक्स पर एक एक्सपर्ट ने कहा कि वॉशिंगटन एक ऐसे हालात पर विचार कर रहा है, जो मध्य-पूर्व में सत्ता के संतुलन को पूरी तरह से बदल सकता है. डोनाल्ड ट्रंप की टीम खार्ग द्वीप पर कब्जा करने या उसे पूरी तरह से ब्लॉक करने की संभावना पर गंभीरता से चर्चा कर रही है. इसका मकसद किसी भी कीमत पर होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों की आवाजाही के लिए पूरी तरह से खोलना है ताकि तेहरान को एक अल्टीमेटम मानने पर मजबूर किया जा सके. इस जगह पर हमला करना, तेहरान की 'सांसें' रोकने की एक कोशिश होगी. एक ऐसा आर्थिक झटका होगा जिससे उबर पाना ईरान के लिए बेहद मुश्किल होगा.
चाबहार बंदरगाह
तीसरा और रणनीतिक रूप से संवेदनशील बिंदु है चाबहार बंदरगाह. चाबहार पोर्ट भारत, ईरान और मध्य एशिया को जोड़ने वाला महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग माना जाता है और यह पाकिस्तान के ग्वादर के विकल्प के रूप में देखा जाता है. अगर चाबहार को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता है, तो इससे क्षेत्रीय संतुलन और भारत की रणनीतिक परियोजनाओं पर भी असर पड़ सकता है.
चाबहार पोर्ट में अभी भारत की रणनीतिक साझेदारी है. लेकिन जंग की वजह से भारत फिलहाल इस प्रोजेक्ट से दूर है. भारत का इस प्रोजेक्ट में आना पाकिस्तान को कभी नहीं सुहाया. इस प्रोजेक्ट के जरिए भारत को ईरान में सीधे एंट्री मिल रही थी. अमेरिका इस पोर्ट को अपने रणनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इन तीनों बिंदुओं को एक साथ देखने पर संकेत मिलते हैं कि रणनीति केवल सैन्य दबाव तक सीमित नहीं है, बल्कि ईरान के घरेलू आर्थिक और क्षेत्रीय मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाकर उसे कूटनीतिक रूप से अलग-थलग करने की कोशिश भी हो सकती है. यही वजह है कि होर्मुज, खार्ग और चाबहार फिलहाल पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक राजनीति के केंद्र में नजर आ रहे हैं.
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