पाकिस्तान के अशांत खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सोमवार को अर्धसैनिक बलों के एक पोस्ट पर क्वाडकॉप्टर ड्रोन का इस्तेमाल करके हमला किया गया. पुलिस और स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, विस्फोटकों से लैस एक क्वाडकॉप्टर ड्रोन ने कराक जिले में स्थित फेडरल कांस्टेबुलरी (पाकिस्तान का अर्धसैनिक बल) की चौकी को निशाना बनाया, जिसमें कई अधिकारी घायल हो गए. इसके बाद हमलावरों ने घायलों को ले जा रही दो एंबुलेंस पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें तीन अधिकारियों की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गए.
खैबर पख्तूनख्वा के पुलिस प्रवक्ता शौकत खान ने बताया कि यह घटना कराक जिले के बहादर खेल इलाके के दर्गाह शहीदान क्षेत्र में हुई. अब तक किसी भी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन संदेह तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) पर जताया जा रहा है. अधिकारियों का कहना है कि हाल के महीनों में टीटीपी ने सुरक्षा बलों के ठिकानों को निशाना बनाने के लिए ड्रोन के इस्तेमाल में तेजी लाई है, जिससे हमलों की तकनीकी जटिलता और घातकता बढ़ी है. ये ट्रेंड बहुत गंभीर है क्योंकि टेक्नोलॉजी आतंकियों तक आसानी से पहुंच रही. आतंकी संगठन इस तरह के ड्रोन का इस्तेमाल एयर पावर के रूप में कर सकते हैं. अगर 2-3 साल में FPV (फर्स्ट पर्सन व्यू ड्रोन एक कैमरे से लैस है जो पायलट के चश्मे, हेडसेट या स्क्रीन पर लाइव वीडियो स्ट्रीम करता है) स्वार्म अटैक शुरू हो गए तो खतरा बहुत बढ़ जाएगा.
कम लागत, आसानी से उपलब्ध
क्वॉडकॉप्टर ड्रोन कम लागत में आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं और इन्हें दूर से संचालित कर सटीक निशाना लगाया जा सकता है. विस्फोटकों से लैस इन ड्रोन के जरिए किए जा रहे हमले न केवल जानलेवा हैं, बल्कि पारंपरिक सुरक्षा इंतजामों को भी बेअसर साबित कर रहे हैं. यह ट्रेंड इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि ड्रोन ऊंचाई से हमला करते हैं और वे जमीनी सुरक्षा इंतजामों को भेद सकते हैं. इसके अलावा, ड्रोन हमलों के बाद घात लगाकर किए जाने वाले जमीनी हमले सुरक्षा बलों की प्रतिक्रिया क्षमता को और चुनौती दे रहे हैं.
यह बदलाव संकेत देता है कि आतंकी संगठन पारंपरिक गुरिल्ला युद्ध से आगे बढ़कर हाई-टेक हाइब्रिड युद्ध की ओर जा रहे हैं. अगर समय रहते प्रभावी एंटी-ड्रोन सिस्टम और खुफिया नेटवर्क को मजबूत नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह ट्रेंड सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है. क्वाडकॉप्टर जैसे ड्रोन के जरिए दूर से सटीक हमले कर आतंकी संगठन अपने लड़ाकों को सीधे मुठभेड़ से बचा रहे हैं, जिससे उनका प्रशिक्षित कैडर सुरक्षित रहे और वे अपने मंसूबों में भी कामयाब हो जाएं. ये ड्रोन अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं और सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखते हैं.
ये ट्रेंड इतना खतरनाक क्यों है?
सस्ते और आसानी से उपलब्ध: क्वाडकॉप्टर ड्रोन 15 से 30 हजार रुपये में बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं और 1-5 किलोग्राम पेलोड लेकर उड़ने में सक्षम होते हैं. इन्हें आसानी से मॉडिफाई किया जा सकता है और फर्स्ट-पर्सन व्यू कैमरा लगाकर रात में सटीक हमले किए जा सकते हैं. आतंकी संगठनों द्वारा इस तरह के ड्रोन को 'इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस' (IED) के रूप में इस्तेमाल करने का गंभीर खतरा है.
पता लगाना मुश्किल: ये ड्रोन कम ऊंचाई (50-200 मीटर) पर उड़ते हैं, साइज में छोटे होते हैं, इसलिए रडार को चकमा दे सकते हैं.
असिमेट्रिक वॉरफेयर: अटैकर को कोई रिस्क नहीं (कोई पायलट नहीं मरता), सिक्योरिटी फोर्सेस को लगातार अलर्ट रहना पड़ता है.
तेजी से प्रचलित हो रहा: यूक्रेन वॉर, मिडिल ईस्ट, म्यांमार से आतंकी इस तरह के ड्रोन के इस्तेमाल की टैक्टिक्स कॉपी कर रहे हैं. पाकिस्तान की तरफ से भारत में नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए पहले ही ऐसे ड्रोन इस्तेमाल किए जा रहे हैं.
ऐसे खतरे के लिए भारत कितना तैयार?
भारत की सेना ने पहले ही इस तरह के खतरे को भांप लिया था. तभी तो वह तेजी से काउंटर-ड्रोन टेक्नोलॉजी में इन्वेस्ट कर रही है. इंडियन आर्मी और बीएसएफ संयुक्त रूप से काउंटर-अनमैन्ड एरियल सिस्टम (CUAS Grid) डेवलप कर रहे हैं, जिसमें- जैमर, लेजर, नेट, एंटी-ड्रोन गन, रडार शामिल होंगे. बीएसएफ पंजाब-जम्मू बॉर्डर पर एंटी-ड्रोन सिस्टम लगा रही है. आर्मी 670 एडवांस्ड सर्विलांस + अटैक ड्रोन खरीद रही है. साल 2025 में 791 ड्रोन घुसपैठों में ज्यादातर को बीएसएफ और आर्मी ने नाकाम कर दिया.
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