उस बर्फीली गुफा की कहानी... जहां कैद है ताजमहल का 'डिजिटल क्लोन'!

चारों ओर बर्फ का रेगिस्तान, शून्य से नीचे का तापमान और एक ऐसी तिजोरी जिसे दुनिया का अंत भी नहीं तोड़ सकता. ये उत्तरी ध्रुव की वो रहस्यमयी गुफा है जिसमें प्रलय आने के बाद भी दुनिया को जिंदा रखने के बीज मौजूद हैं. यहां सिर्फ अनाज के बीज ही नहीं, बल्कि भारत का ताजमहल और संविधान भी डिजिटल रूप में कैद कर दिए गए हैं. आखिर क्यों इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी पहल बताया जाता है?

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यह गुफा डिजिटल और जैविक दोनों प्रकार के महत्वपूर्ण संसाधनों को माइनस 18 डिग्री तापमान में सुरक्षित रखती है. (Photo: ITG) यह गुफा डिजिटल और जैविक दोनों प्रकार के महत्वपूर्ण संसाधनों को माइनस 18 डिग्री तापमान में सुरक्षित रखती है. (Photo: ITG)

संदीप कुमार सिंह

  • नई दिल्ली,
  • 01 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 8:12 AM IST

नॉर्थ पोल... जहां दुनिया की इंसानी बस्तियां खत्म हो जाती है, अंतहीन बर्फ का साम्राज्य शुरू होता है, वहां स्थित है नॉर्वे का 'लॉन्गइयरबायेन' आईलैंड. यहां पहुंचना किसी मिशन से कम नहीं. हाड़ कंपा देने वाली सर्द हवाएं, पोलर बियर का डर और साल के कई महीने रहने वाला अंधेरा. इसी सुदूर टापू पर एक उजाड़ पहाड़ के भीतर बना है दुनिया का सबसे 'सेफ हाउस'. लेकिन ये किसी इंसान को रखने के लिए नहीं है बल्कि ये इंसानी सभ्यता को सुरक्षित रखने के एक खास मिशन से जुड़ा है.

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ये वही जगह है जिसे 'प्रलय की तिजोरी' यानी डूम्स डे वॉल्ट कहा जाता है. जहां मानवता ने अपना भविष्य एक बर्फीली गुफा में कैद कर रखा है. शुरुआत में इसे केवल 'ग्लोबल सीड वॉल्ट' के रूप में जाना जाता था, जहां दुनिया भर की फसलों के करोड़ों बीजों को सहेजा गया ताकि किसी वैश्विक आपदा यानी प्रलय जैसे हालात के बाद खेती दोबारा शुरू हो सके. लेकिन अब, इसी पहाड़ के सीने में एक और गहरी सुरंग खोदी गई है. जहां सिर्फ अनाज नहीं, बल्कि पूरी डिजिटल सभ्यता का 'बैकअप' जमा किया जा रहा है.

इस मिशन को 'आर्कटिक वर्ल्ड आर्काइव' यानी AWA नाम दिया गया है. यहां डेटा को बचाने का तरीका किसी साइंस-फिक्शन फिल्म जैसा है. मस्क और माइक्रोसॉफ्ट जैसी दिग्गज कंपनियों के कोड्स भी यहां अमर होने के लिए भेज दिया गए हैं. GitHub ने दुनिया भर के ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर का डेटा वहां जमा कराया है. दुनिया की हर बड़ी तकनीक जिन कोड्स एंड्रॉयड और लिनक्स पर चलती हैं, उनकी एक कॉपी भी यहां सुरक्षित है. इसके पीछे सोच ये है कि अगर कल को पृथ्वी पर कोई डिजिटल ब्लैकआउट या इंटरनेट क्रैश होता है, तो तकनीक को दोबारा खड़ा करने का 'सोर्स कोड' मौजूद रहे.

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इस बर्फीली तिजोरी में भारत की मौजूदगी भी बेहद गौरवशाली और रणनीतिक है. भारत ने यहां अपनी 'सांस्कृतिक आत्मा' को डिजिटल रूप में सुरक्षित किया है. ताजमहल का पूरा डिजिटल ब्लूप्रिंट मतलब 3D लेजर स्कैन यहां कैद है, ताकि सैकड़ों साल बाद भी इसके एक-एक पत्थर की नक्काशी को मिलीमीटर की सटीकता से समझा जा सके. इसके साथ ही, भारत के संविधान की डिजिटल कॉपी, प्राचीन पांडुलिपियों का भंडार और इसरो के सफल अभियानों का डेटा भी यहां माइनस 18 डिग्री तापमान में सुरक्षित है.

भारत के बीजों की अगर बात करें तो डूम्स डे वॉल्ट में हैदराबाद स्थित अंतरराष्ट्रीय संस्थान ICRISAT और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के माध्यम से इस वॉल्ट में करीब 1,10,000 से अधिक बीजों के नमूने जमा किए हैं. इसमें विशेष रूप से भारत के 'मिलेट्स' यानी श्रीअन्न जैसे ज्वार, बाजरा, रागी और कंगनी की हजारों किस्में शामिल हैं, जो सूखे और भीषण गर्मी में भी उगने की क्षमता रखती हैं. इनके अलावा अरहर, मूंग, उड़द और चना जैसी दालों के साथ-साथ धान की भी कई दुर्लभ किस्मों को वहां सदियों के लिए सुरक्षित कर दिया गया है. भारत की ओर से भेजे गए इन डिब्बों पर 'ब्लैक बॉक्स' की मोहर होती है, जिसका मतलब है कि भारत की अनुमति के बिना दुनिया की कोई भी ताकत इन बीजों को हाथ नहीं लगा सकती.

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आर्कटिक वर्ल्ड आर्काइव को डिजिटल डेटा सेफ्टी के लिहाज से सबसे खास इसलिए भी माना जाता है क्योंकि यह पूरी तरह 'ऑफलाइन' है. यहां रखा डेटा इंटरनेट से नहीं जुड़ा है. जिसका मतलब है कि दुनिया का कोई भी हैकर या वायरस यहां तक नहीं पहुंच सकता. इसका मैनेजमेंट नॉर्वे की कंपनी Piql और सरकारी स्वामित्व वाली माइनिंग कंपनी Store Norske मिलकर करती हैं. इस प्रोजेक्ट को चलाने के लिए पैसा उन संस्थाओं और देशों से आता है जो अपना डेटा यहां सुरक्षित रखते हैं. यह एक तरह का 'को-ऑपरेटिव मॉडल' है जहां दुनिया भर की सरकारें और निजी कंपनियां मिलकर इस सुरक्षित भविष्य के लिए निवेश कर रही हैं. यह जगह अंतरराष्ट्रीय संधियों से सुरक्षित है, जिससे यहां किसी एक देश का दबदबा नहीं चलता.

लेकिन ये सवाल उठता है कि क्या यह डेटा हमारे लैपटॉप या पेनड्राइव की तरह सुरक्षित है? जवाब है- नहीं, यह उससे कहीं ज्यादा एडवांस है. डेटा स्टोर करने के लिए यहां जिस Piql तकनीक का इस्तेमाल होता है, वह इसे साधारण क्लाउड स्टोरेज या हार्ड डिस्क से मीलों आगे ले जाती है. जहां डिजिटल हार्डवेयर 10-15 साल में खराब हो सकते हैं, वहीं Piql टेप एक ऐसी विशेष रील है जो बिना बिजली के 1,000 साल तक सुरक्षित रह सकती है.

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यह डेटा को हाई-डेंसिटी फिल्म पर बाइनरी कोड में अंकित कर देती है, जिसे भविष्य की सभ्यताएं बिना किसी सॉफ्टवेयर के, सिर्फ एक तेज रोशनी और लेंस की मदद से अपनी आंखों से देख और पढ़ सकेंगी. इस गुफा को दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह बनाने में यहां की 'परमाफ्रॉस्ट' यानी स्थायी रूप से जमी बर्फ का बड़ा हाथ है. अगर कभी दुनिया की सारी बिजली भी गुल हो जाए, तब भी पहाड़ की कुदरती ठंडक इन रीलों को सदियों तक खराब नहीं होने देगी. यह सुरक्षा कवच भविष्य में तब 'रिसेट बटन' का काम करेगा जब किसी परमाणु युद्ध या बड़े सौर तूफान की वजह से दुनिया का डिजिटल डेटा मिट जाएगा.

यहां वेटिकन लाइब्रेरी के गुप्त दस्तावेज, मशहूर पेंटिंग 'मोना लिसा' डिजिटल स्वरूप में और नॉर्वे के नेशनल म्यूजियम की कलाकृतियां भी इसी भरोसे पर रखी गई हैं. हकीकत यह है कि हम एक अनिश्चित भविष्य की ओर बढ़ रहे हैं, जहां इनफॉर्मेशन ही सबसे बड़ी दौलत है. आर्कटिक की यह बर्फीली गुफा उसी दौलत का 'ब्लैक बॉक्स' है. आज हम जो कुछ भी डिजिटल रूप में बना रहे हैं या बना चुके हैं- चाहे वो भारत का गौरवशाली ताजमहल हो या मस्क का कोडिंग डेटा- वह सब इस बर्फ के नीचे शांति से सोया हुआ है.

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यह गुफा इस बात की गवाही देती है कि इंसान ने अपनी पहचान को समय की मार से बचाने का पक्का इंतजाम कर लिया है. इस गुफा को शांति का आखिरी टापू भी कहा जा सकता है. दुनिया में चाहे जितनी भी जंगें चल रही हों, इस वॉल्ट के अंदर सन्नाटा और शांति है. यहां रूस के बीज, अमेरिका के बीजों के ठीक बगल में रखे हैं. उत्तर कोरिया के डिब्बे, दक्षिण कोरिया के डिब्बों के साथ हैं. यह जगह बताती है कि जब सर्वाइवल की बात आती है, तो पूरी इंसानियत एक है.

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