ट्रंप दोहराना चाहते हैं 80 साल पुराना जीत का इतिहास, कहीं तबाही की वजह न बन जाए ये जुनून

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया है, जिस रास्ते से दुनिया के लगभग बीस फीसदी तेल और गैस की सप्लाई होती है. इस तरह वह 21वीं सदी का पहला देश बन गया है जिसने सीधे अमेरिकी सैन्य ढांचे को निशाना बनाया और अमेरिका से अपने क्षेत्र से हटने की मांग की है.

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क्या अमेरिका के सामने 80 साल पहले वाली स्थिति है. (Photo: ITG) क्या अमेरिका के सामने 80 साल पहले वाली स्थिति है. (Photo: ITG)

संदीप उन्नीथन

  • नई दिल्ली,
  • 30 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 5:38 PM IST

अमेरिकी सेना की 20वीं सदी की सबसे लोकप्रिय तस्वीर प्रशांत महासागर में स्थित इवो जिमा (Iwo Jima) द्वीप पर कब्जे की है. 23 फरवरी 1945 को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान छह अमेरिकी नौसैनिकों ने माउंट सुरिबाची की चोटी पर अमेरिकी झंडा फहराया. यह द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा लड़ी गई सबसे भीषण लड़ाइयों में से एक थी.

जापान से इवो जिमा को कब्जे में लेने का मिशन अमेरिका की आइलैंड हॉपिंग स्ट्रैटेजी का हिस्सा था. अमेरिका की इस स्ट्रैटेजी का मकसद प्रशांत महासागर के दूर-दराज के द्वीपों पर कब्जा करना था, जो जापान के मुख्य द्वीपों को सिक्योर करते थे. इन द्वीपों पर कब्जा करने के बाद अमेरिका ने जापान पर धावा बोल दिया. हिरोशिमा और नागासाकी पर न्यूक्लियर हमले के बाद 15 अगस्त 1945 को जापान ने सरेंडर कर दिया. हिरोशिमा और नागासाकी पर बम गिराने वाले इन Boeing B-29 Superfortress बॉम्बर्स ने मरियाना द्वीप के Tinian से उड़ान भरी थी.

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लेकिन 80 साल बाद अब ठीक वैसी स्थिति बनती नजर आ रही है. लेकिन इस बार बेशक यह बड़े पैमाने पर नहीं है और भौगोलिक स्थिति भी बिल्कुल जुदा है. अमेरिका और इजरायल बीते एक महीन से ईरान पर हमला कर रहे हैं. इसके जवाब में ईरान भी इजराइल, यूएई, सऊदी अरब, ओमान, कतर और बहरीन पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से हमला कर रहा है. 

ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को ब्लॉक कर दिया है, जिस रास्ते से दुनिया के लगभग बीस फीसदी तेल और गैस की सप्लाई होती है. इस तरह ईरान 21वीं सदी का पहला देश बन गया है जिसने अमेरिका के सैन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला किया है और अमेरिका से उसके क्षेत्र से पीछे हटने की मांग की है.

यह सब ऐसे समय में हो रहा है, जब इस साल ट्रंप के सामने तीन बड़े इवेंट हैं. ट्रंप 14-15 मई को बीजिंग में राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता करने वाले हैं. चार जुलाई को अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ है और तीन नवंबर को अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने जा रहे हैं. ऐसे में ट्रंप किसी भी कीमत पर कमजोर दिखने का जोखिम नहीं उठा सकते.

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10 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान एयरफोर्स के ठिकानों पर भारतीय सेना की बमबारी के बाद इस्लामाबाद को सीजफायर के लिए ट्रंप को फोन करना पड़ा था. लेकिन ईरान को झुकाना मुश्किल है. एक महीने के भीतर ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई और ईरान के कई शीर्ष नेताओं की हत्या कर दी गई. अमेरिका और इजरायल ने ईरान की वायुसेना और नेवी को बर्बाद कर दिया.

लेकिन इसके बावजूद ईरान का मनोबल डिगा नहीं है. उसके मिसाइल और ड्रोन साइट्स का बाल भी बांका नहीं हुआ. वह होर्मुज को ब्लॉक करने में कामयाब रहा है, जिससे उसने दुनिया की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया है. 2003 में इराक पर हमले की तरह ईरान को पछाड़ देने का ट्रंप का वादा 1973 के तेल संकट जैसा ज्यादा नजर आ रहा है. 1973 के तेल संकट को अब तक का सबसे भयावह संकट माना जाता है.

तेल की कीमतें एक महीने में लगभग 60 फीसदी बढ़ चुकी हैं और इसका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है. अमेरिका और इजरायल के हवाई हमले ईरान को झुकाने में असफल रहे हैं. ऐसे में ट्रंप ने 6000 से अधिक मरीन और पैराट्रूपर्स पश्चिम एशिया भेजे हैं.

पाकिस्तान के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता जारी है. 2000 से अधिक मरीन के साथ USS Boxer अप्रैल की शुरुआत में ईरान के पास पहुंचने वाला है. ईरान में अमेरिका की जमीनी कार्रवाई की यह कवायद एंटन चेखव के गन सिद्धांत जैसी है. इस सिद्धांत में चेखव ने कहा है कि अगर किसी प्ले में हाथ में लोडेड गन दिखाई गई है, उसका फायर होना जरूरी है अन्यथा वह अनावश्यक है.

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अगर वार्ता सफल होती है, तो सैन्य टकराव टल सकता है लेकिन अगर वार्ता विफल होती है तो ट्रंप सीमित सैन्य कार्रवाई का विकल्प चुन सकते हैं. ऐसे में यहीं इवो जिमा जैसी प्रतीकात्मक जीत का विचार सामने आता है.

ईरान में अमेरिका की जमीनी सैन्य कार्रवाई के बारे में अभी पुख्ता तौर पर नहीं कहा जा सकता. लेकिन यह कदम ईरान को बातचीत करने के लिए मजबूर करने का तरीका हो सकता है. अगर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत को कोई ठोस नतीजा निकलता है तो जमीनी कार्रवाई का खतरा कम हो सकता है. ऐसे में संभव है कि बंदूक चलाने की नौबत ही ना आए. 

अगर वार्ता सफल नहीं होती तो ट्रंप दबाव बना सकते हैं. वह सीमित मिलिट्री एक्शन पर विचार कर सकते हैं. चेखव के सिद्धांत पर गौर करें तो वह लोडेड गन चला भी सकते हैं. इवो जिमा की तस्वीर यहां मायने रखती है. अमेरिकी सेना ईरान मे अपना झंडा लगाकर जीत घोषित कर सकती है और जीत का दावा कर लौट सकती है. ईरान की सरकार यूं ही बनी रहेगी. इससे दोनों पक्षों की जीत होगी. 

ट्रंप और पीट हेगसेथ विजुअल नैरेटिव की ताकत को बखूबी समझते हैं. ट्रंप का MAGA कैंपेन इसकी मिसाल है. लेकिन सवाल है कि अमेरिकी मरीन आखिर अमेरिकी झंडा कहां फहराएंगे? अमेरिका 10,000 सैनिकों के साथ ईरान पर हमला नहीं कर सकता. अमेरिका और इजरायल की एक महीने की बमबारी के बाद भी ईरान की फोर्सेज का बाल भी बांका नहीं हुआ. 

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अमेरिकी मरीन और पैराट्रूपर्स के लिए सबसे बेहतर रहेगा कि वह फारस की खाड़ी में ईरान के द्वीपों पर हमला करे. इनमें ईरान के काशेम, लरनाक और होर्मुज जैसे द्वीप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के संकरे प्रवेश मार्ग पर हैं जबकि ग्रेटर टुनब, लेसर टुनब और अबू मूसा जैसे द्वीप खाड़ी के केंद्र में हैं.  

लेकिन यह आसान नहीं

लेकिन इन द्वीपों पर कब्जा आसान नहीं है. ईरान के ये द्वीप विशेष रूप से खार्ग बारूदी सुरंगों से भरे हैं. इसके साथ ही ये सभी ईरानी मिसाइलों और ड्रोन की रेंज में हैं. ईरान ने चेतावनी दी है कि अगर जमीनी हमला हुआ, तो वह समुद्र में खदानें बिछाकर पूरी तरह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद कर सकता है.

ऐसे में इवो जिमा की उस तस्वीर पर अमेरिका के जलते हुए C-130J Super Hercules और CH-53 Sea Stallion हेलिकॉप्टर की तस्वीरें भारी पड़ती नजर आ रही हैं. यह तस्वीर 1980 में ऑपरेशन ईगल क्लॉ के बाद की है. तेहरान में अमेरिकी दूतावास में बंधक बनाए गए 53 अमेरिकी नागरिकों को छुड़ाने में अमेरिका असफल रहा था. इस मिशन में हेलकॉप्टर दुर्घटना में आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए और ऑपरेशन असफल रहा था. इससे अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर की छवि को नुकसान पहुंचा था और वह चुनाव हार गए थे.

आज लगभग चार दशक बाद ट्रंप ऐसे ही दुविधा में फंसे नजर आ रहे हैं. एक तरफ इवो जिमा जैसी जीत की संभावना और दूसरी तरफ ‘ईगल क्लॉ’ जैसी विफलता का खतरा है. वे खुद इस जोखिम को समझते हैं. 

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