तेल, सत्ता और तख्तापलट... लोकतंत्र के नाम पर डोनाल्ड ट्रंप की तानाशाही राजनीति का पूरा विश्लेषण

ट्रंप खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं, लेकिन उनके फैसले तानाशाही सोच की ओर इशारा करते हैं. वेनेजुएला में राष्ट्रपति को अगवा करना, ईरान में खुलेआम शासन बदलने की धमकी देना और चुनाव हारने के बाद नतीजों को न मानना, ये सभी कदम लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल खड़े करते हैं.

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ट्रंप के फैसलों ने दुनिया को असहज सवालों के सामने खड़ा किया (Photo: AP) ट्रंप के फैसलों ने दुनिया को असहज सवालों के सामने खड़ा किया (Photo: AP)

अनुराग कश्यप

  • नई दिल्ली,
  • 10 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:07 PM IST

दुनिया का सबसे शक्तिशाली मुल्क का राष्ट्रपति आज सारे अंतरराष्ट्रीय कानूनों से ऊपर जाकर बैठ गया है. वह ख़ुद को लोकतंत्र का रक्षक बताता है और मानवाधिकार की भाषा का भी इस्तेमाल करता है. लोकतंत्र बचाने का हवाला देते हुए बिना किसी मंजूरी के दूसरे देश के राष्ट्रपति को अगवा कर लेता है तो किसी देश पर बमबारी कर देता है. इतना ही नहीं, चुनाव परिणाम उसके पक्ष में नहीं आया तो नतीजों को भी मानने से इंकार कर देता और उनके समर्थक संसद तक पहुंच जाते हैं.  

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यहां बात हो रही डोनाल्ड ट्रंप की. आप ऐसे नेता को क्या कहेंगे? एक मज़बूत नेता या फिर वो नेता जो सबसे ज्यादा लोकतंत्र से डरता हो? ट्रंप ख़ुद को तानाशाहों का विरोधी हमेशा से बताते आए हैं. लेकिन, हाल के दिनों में देखें तो उनके कई फैसलों को एक साथ रखेंगे तो आपके सामने एक असहज तस्वीर बनकर आएगी. तस्वीर ऐसी कि ट्रंप लोकतंत्र की भाषा तो बोलते हैं. लेकिन फैसले किसी तानाशाही की तरह लेते हैं. 

सबसे ताजा मामले देखें तो वेनेजुएला में जो ट्रंप ने किया उसे देख दुनिया तो चौंकी ही, अमेरिकावासी भी चौंक गए. किसी ने सोचा भी नहीं था कि अमेरिकी सेना वेनेजुएला में दाखिल होंगे और ताक़त के दम पर राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उठाकर ले आए. किसी देश के राष्ट्रपति को दूसरे देश की सेना एक रात उठाकर ले जाए ये अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाना नहीं तो क्या है. इतना ही नहीं, ट्रंप के इस फैसले से तो वहां के नेता लोग भी बड़े स्तर पर अनजान थे. इस कार्रवाई से पहले संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी तक नहीं ली गई. 

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एक संप्रभु देश की सत्ता अमेरिका में बैठा एक शख्स यूहीं बदल देता है. अगर मान भी लें कि मादुरो तानाशाह थे तो क्या उन्हें हटाने का अधिकार अमेरिका को था. अधिकार था तो वेनेजुएला की जनता का. लेकिन, फैसला जनता ने नहीं किया. बल्कि पड़ोसी मुल्क में बैठा दुनिया का सबसे शक्तिशाली राष्ट्रपति ने किया. 

लोकतंत्र या तेल: असली सवाल यहीं छुपा है

वेनेजुएला में ट्रंप के खेल के पीछे साफ़ तौर से तेल है. लंबे समय से अमेरिका की नज़र वेनेजुएला की तेल पर रही है. वेनेजुएला के सबसे दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है. मध्य पूर्व में स्थित देशों से भी ज्यादा. वेनेजुएला के पास 303 अरब बैरल तेल का भंडार है. ये तेल का भंडार इतना है कि किसी भी वैश्विक ताक़त की नज़र टिक जाए. 

वेनेजुएला के राष्ट्रपति को जबरन अमेरिका में लाने के बाद ट्रंप ने ऐलान किया कि अब वेनेजुएला के तेल अमेरिकी कंपनियां मैनेज करेंगी. तो फिर सवाल तो उठेगा हि कि अगर ट्रंप का मकसद लोकतंत्र था, तो इतनी जल्दी तेल चर्चा में क्यों आई?

इतिहास हमें ज़रूर सिखाता है कि जब भी लोकतंत्र के बहाने एक देश दूसरे पर हमला करता है तो उसके पीछे वजह संसाधन होते हैं. 

ईरान: वही भाषा, वही पैटर्न

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वेनेजुएला की बात अब ईरान की करते हैं. ईरान में बड़े स्तर पर खामेनेई शासन के ख़िलाफ़ सड़कों पर प्रदर्शन हो रहा है. सुप्रीम लीडर खामेनेई ने तो साफ़ कर दिया है कि इसके पीछे अमेरिका और इज़रायल है. 

वेनेजुएला के बाद ट्रंप की नजरें ईरान पर टिकी हुई हैं. ट्रंप बार-बार ईरान में रिजीम चेंज की बात कर रहे हैं. खुलेआम खामेनेई शासन को धमकी दे रहे हैं कि अगर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलती है तो तगड़ा हमला करेंगे. 

ईरान के पास भी ऐसा कुछ है, जिसकी वजह से ट्रंप नेतृत्व हटाने की धमकियां लगातार दे रहे हैं. ईरान के पास तेल का बड़ा भंडार और होर्मुज स्ट्रेट. 

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अमेरिका पहले ही ईरान के साथ परमाणु समझौते से बाहर निकल चुका है और आर्थिक प्रतिबंध लगा चुका है. पिछले साल तो ट्रंप के शासनकाल के दौरान ईरान पर अमेरिकी सेना ने कई बम गिराए थे. इस बमबारी में ईरान के न्यूक्लियर प्लांट को भारी नुक़सान पहुंचा था. 

अब ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ईरान को उसी रास्ते पर लेकर जाया जा रहा है जिस रास्ते पर वेनेजुएला गया?

इतिहास: जब हर बार कहानी एक जैसी रही

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दुनियाभर में ऐसे कई मुल्क हैं, जहां अमेरिका ने तो यह बोलकर हमला किया कि वहां वो लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं. लेकिन हुआ उसके पलट. इराक़, लीबिया हो अफगानिस्तान. हर बार अमेरिका ने कहा कि लोकतंत्र लाएंगे और आतंकवाद को जड़ से उखाड़ फेकेंगे. लेकिन हर बार देश टूटे. लोग मरे. इकोनॉमी बरबाद हुई और बस अराजकता फैली. 

अमेरिका के भीतर: जब हार स्वीकार नहीं की गई

डोनाल्ड ट्रंप की तानाशाही सोच महज़ सिर्फ विदेश नीति तक ही सीमित नहीं है. 2020 में जब अमेरिका में चुनाव हुआ और जो बाइडेन से जब ट्रंप चुनाव हारे तो नतीजों को मानने से इनकार कर दिया. बिना सबूत के ट्रंप ने चोरी के आरोप लगाए और उनके समर्थकों ने कैपिटल हिल पर हमला कर दिया. इस दौरान आगजनी भी हुई और जमकर तोड़फोड़ हुई. ऐसा पहले जो अमेरिका ने कभी देखा नहीं था. 

साफ़ तौर से लोकतंत्र की प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की गई. ख़ास बात ये रही कि हमलावरों को देशभक्त कहा गया. 

ये मामला साफ़ दिखाता है कि ये कोई लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया नहीं होती. बल्कि ये साफ़ तौर से सत्ता छिन जाने का डर होता है. 

मीडिया, अदालतें और विरोध: सब दुश्मन

हर तानाशाह शुरुआत में कुछ ऐसे संकेत देते हैं जैसे ट्रंप दे रहे हैं. जैसे कि ट्रंप मीडिया को लोगों को दुश्मन बताते हैं. ट्रंप जजों और अदालतों पर साफ़ तौर पर सवाल खड़ा देते हैं अगर फैसले उनके ख़िलाफ़ आते हैं. 

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इतना ही नहीं, अगर कोई विरोध करता है तो उसे देशद्रोह की तरह पेश किया जाता है. ये पैटर्न कोई नया नहीं है. दुनिया में जितने भी तानाशाह हुए हैं, उनकी शुरुआत कुछ ऐसी ही होती है. 

दोस्ती का पैमाना: लोकतंत्र नहीं, फायदा

अमेरिका में तो दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र है. अमेरिका ऊपर-ऊपर से तो दिखाता है कि वह लोकतंत्र का हितैषी है. लेकिन, हकीकत कुछ और कहती है.

यूएई, नॉर्थ कोरिया से लेकर सऊदी अरब में चुनाव तो होते नहीं. वहां लोकतंत्र है नहीं. फिर डोनाल्ड ट्रंप को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं होती है. क्योंकि अमेरिका के लिए बात लोकतंत्र की है नहीं, बल्कि सीधे-सीधे कहें तो रणनीतिक फायदे का है. ट्रंप की यही चयनात्मक नैतिकता तानाशाही सोच को उजागर करती है.

कानून और संयुक्त राष्ट्र: जब ताकत सब कुछ तय करती है

ये दुनिया 21वीं सदी में जी रहा है और इस सदी में कोई देश दूसरे के राष्ट्रपति को उठाकर लेकर चला जाए. ये अकल्पनीय है. और इस अकल्पनीय को काम को ट्रंप ने पूरा करके दिखाया है. 

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के नियम हैं. उसके तहत बिना अनुमति किसी देश पर हमला कोई करता है तो उसे अवैध माना जाएगा. अगर अमेरिका के अलावा कोई देश ऐसा करता तो उसपर भारी सैंक्शन लगा दिया जाता. लेकिन, यहां तो ख़ुद ट्रंप ने ऐसा किया है. 

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वेनेजुएला ने तो अमेरिका पर हमला नहीं किया. लेकिन, तब भी अमेरिका ने हमला किया और उसे कोई सजा नहीं हुई. क्योंकि जो ताक़तवर है उसके सामने ही दुनिया झुकती है. जब क़ानून कमजोर हो जाए तो ताक़त की सच बन जाती है. 

आखिरी सवाल: अगर मादुरो तानाशाह हैं, तो ट्रंप क्या हैं?

ऐसा नेता जो दूसरी देशों की सरकार गिराना चाहे, चुनाव हारकर भी नतीजों को अस्वीकार करे, विरोध को कुचलना चाहे, अंतरराष्ट्रीय कानूनों को नज़रअंदाज़ करते हुए किसी देश पर हमला कर दे तो उसे क्या कहा जाएगा?

ये सवाल महज डोनाल्ड ट्रंप का नहीं है. ये सवाल उस दुनिया का है जो ताक़त के सामने चुप है. क्योंकि इतिहास हमें सिखाती है कि कोई भी तानाशाह पहले वॉर बाहर करता है और फिर अंदर. 

ट्रंप की सोच: मज़बूत व्यवस्था नहीं, कमजोर दुनिया

डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति को समझना है तो उनका व्यवहार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ देखें. अमेरिका और रूस का वैचारिक रिश्ता नहीं है. अमेरिका के लिए रूस बस एक औज़ार है. ऐसा क्यों? क्योंकि अमेरिका रूस को दुनिया को अस्थिर रखने के लिए इस्तेमाल करता है. 

ट्रंप का किसी विचारधारा से लड़ाई नहीं है और न ही किसी एक देश अब रहा है. उनकी असली टकराव अब वैश्विक नियमों और संस्थाओं से. जैसे कि नाटो, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय कानूनों से. 

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ये संस्थाएं दुनिया को स्थिर बनाने का काम करती है. लेकिन, ट्रंप की राजनीति स्थिरता पर नहीं. बल्कि दबाव पर चलती है. और रूस इस दबाव की राजनीति का सबसे कारगार हथियार है. रूस बीते चार सालों से यूक्रेन से जंग लड़ रहा है. रूस अंतरराष्ट्रीय नियमों की सीधे तौर पर चुनौती देता है. 

रूस की वजह से यूरोप ट्रंप के कदमों में है. यही वह माहौल है जो ट्रंप जैसे नेता सबसे ज्यादा सहज होते हैं. वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय क़ानून कमजोर हो गए हैं. संस्थाएं बेबस हैं और फैसले सीधे ताक़त पर ली जा रही है.

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