जब कनाडा में भारतीयों को रोकने के लिए लाया गया था ‘Continuous Journey’ कानून

कनाडा आज भले ही बहुसांस्कृतिक समाज और आप्रवासियों के लिए खुले देश के रूप में जाना जाता है, लेकिन इसका इतिहास हमेशा ऐसा नहीं रहा. 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में हालात बिल्कुल अलग थे. उस दौर में एशियाई, खासकर भारतीय प्रवासियों को रोकने के लिए कई सख्त और भेदभावपूर्ण कानून बनाए गए. इन्हीं में से एक था “Continuous Journey” नियम, जिसने हजारों भारतीयों के कनाडा आने का रास्ता लगभग बंद कर दिया.

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Komagata Maru incident (Photo-Vancouver Public Library) Komagata Maru incident (Photo-Vancouver Public Library)

हुमरा असद

  • टोरंटो,
  • 24 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 9:18 AM IST

कनाडा में भारतीयों खासकर सिख समुदाय की कहानी बेहद सर्घष भरी रही है. आज के कनाडा में सिख समुदाय संसद तक पहुंच गया है लेकिन इसके पीछे एक लंबा इतिहास रहा है. कनाडा में सिखों का रिश्ता 19वीं सदी के अंत से शुरू हुआ, जब ब्रिटिश साम्राज्य के दौर में भारत और कनाडा दोनों एक ही शासन के अधीन थे. यानी कनाडा और भारत दोनों देशों में ब्रिटिशों का राज चल रहा था.

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इसी दौर में कुछ सिख सैनिक और मजदूर यहां पहुंचे, जिनमें ज्यादातर ब्रिटिश कोलंबिया में बस गए. उस समय कनाडा तेजी से विकास कर रहा था. रेलवे बन रहे थे, खनन और लकड़ी उद्योग फैल रहा था और सस्ते श्रमिकों की जरूरत थी. इसी वजह से न सिर्फ भारत बल्कि चीन और जापान से भी लोग यहां आने लगे.

भारतीयों में ज्यादातर पंजाब से आने वाले सिख थे, जो मेहनती और अनुशासित माने जाते थे. उन्होंने खासकर ब्रिटिश कोलंबिया में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई. लेकिन जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ने लगी, स्थानीय श्वेत मजदूरों और राजनेताओं में असंतोष बढ़ने लगा. यह असंतोष सिर्फ आर्थिक प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें नस्लभेद और श्वेत वर्चस्ववाद की सोच भी शामिल थी. 

इसी दबाव में कनाडा सरकार ने 1908 में “Continuous Journey” कानून लागू किया. इस कानून के अनुसार, कोई भी प्रवासी तभी कनाडा में प्रवेश कर सकता था जब वह अपने देश से बिना किसी बीच के पड़ाव के सीधे कनाडा पहुंचे. सुनने में यह नियम सामान्य लग सकता है, लेकिन असल में यह भारतीयों को रोकने की एक सोची-समझी चाल थी. उस समय भारत से कनाडा के लिए कोई सीधी जहाज सेवा मौजूद ही नहीं थी. हर यात्री को हांगकांग, जापान या किसी अन्य बंदरगाह पर रुकना पड़ता था. 

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इसका मतलब यह हुआ कि तकनीकी रूप से कोई भी भारतीय इस नियम को पूरा ही नहीं कर सकता था यानी कानून भले ही कागज पर तटस्थ दिखता था, लेकिन उसका निशाना स्पष्ट रूप से भारतीय, खासकर सिख समुदाय थे. इस कानून के साथ एक और शर्त भी जोड़ी गई. भारतीयों को कनाडा आने के लिए भारी रकम (लगभग 200 डॉलर) साथ रखनी जरूरी थी, जो उस समय के हिसाब से बहुत बड़ी राशि थी. इसके मुकाबले यूरोपीय प्रवासियों के लिए यह शर्त काफी हल्की थी. 

साफ था कि सरकार एक तरफ एशियाई लोगों को रोकना चाहती थी, लेकिन खुलकर भेदभाव करने के बजाय कानूनी रास्ता अपनाया गया. इस कानून का सबसे बड़ा और प्रतीकात्मक असर 1914 की कोमागाटा मारू घटना (Komagata Maru incident) में देखने को मिला. जिसका जिक्र कनाडा सरकार की वेबसाइट पर भी किया गया है.

‘कामागाटा मारू’ एक जापानी जहाज था. जिसे हांगकांग में रहने वाले एक कारोबारी और स्‍वतंत्रता आंदोलन में शामिल गदर पार्टी के क्रांतिकारी नेता गुरदीत सिंह ने किराए पर लिया था. फिर ये जहाज हांगकांग से कनाडा के लिए रवाना हुआ. जिसमें 376 यात्री सवार थे जिनमें 340 सिख, 24 मुस्लिम, 12 हिंदू और बाकी ब्रिटिश थे. बता दें उस दौरान हांगकांग भी ब्रिटिश शासन के अधीन था. 23 मई 1914 को ये जहाज कनाडा के बैंकुवर (ब्रिटिश कोलंबिया) बंदरगाह पर पहुंचा था. लेकिन “Continuous Journey” नियम का हवाला देकर उन्हें उतरने नहीं दिया गया. 

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वे हफ्तों तक समुद्र में ही फंसे रहे और अंततः उन्हें वापस भारत भेज दिया गया. यह घटना न केवल एक मानवीय त्रासदी थी, बल्कि इसने कनाडा की आप्रवासन नीतियों की कठोरता और भेदभाव को दुनिया के सामने उजागर किया था. हालांकि कई बार कनाडा की अलग-अलग सरकार ने इसके लिए माफी भी मांगी. साल 2016 में कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने भी इस घटना के लिए माफी मांगी थी. 

“Continuous Journey” कानून का असर बेहद गहरा था. 1908 से पहले जहां हजारों भारतीय कनाडा आ चुके थे, वहीं इस कानून के बाद उनकी संख्या तेजी से गिर गई. 1911 तक भारतीयों की आबादी में भारी कमी आ गई और आने वाले दशकों में प्रवास लगभग ठप हो गया. कई परिवार बिछड़ गए. पुरुष कनाडा में रह गए, जबकि उनके परिवार भारत में ही थे क्योंकि उन्हें बुलाने की अनुमति नहीं थी. ये कानून लंबे समय तक लागू रहा, लेकिन सिख और अन्य भारतीय समुदायों ने इसके खिलाफ आवाज उठाना बंद नहीं किया. उन्होंने कानूनी लड़ाइयां लड़ीं, संगठित होकर विरोध किया और धीरे-धीरे अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखा. आखिरकार 1947 के बाद जब वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों और समानता की बात जोर पकड़ने लगी, तब ऐसे भेदभावपूर्ण कानूनों को खत्म किया गया.

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आज के कनाडा में भारतीय मूल के 1.35 मिलियन (2021 की जनगणना के अनुसार) लोग रहते हैं. संघर्ष, एकता और दृढ़ता के बल पर भारतीयों ने बाधाओं को पार किया और कनाडा के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे का अहम हिस्सा भी बन गए.

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