बच्चे को जन्म देने के बाद मां बेहद नाजुक स्थिति में होती है. उसे बहुत ख्याल की भी जरूरत होती है. सही ख्याल और खान-पान न मिलने पर महिला पोस्टपार्टम डिप्रेशन की शिकार हो सकती है. स्थिति बिगड़ने पर ये स्थिति 'पोस्टपार्टम साइकोसिस' तक पहुंच सकती है. जब मां अपने ही बच्चे की जान ले लेती है.
ऐसा ही कनाडा का एक मामला सुर्खियों में आया लेकिन कोर्ट ने महिला को 'क़ातिल' नहीं माना...
टोरंटो में 2024 में हुए इस मामले में 30 वर्षीय महिला पर पहले हत्या का संगीन आरोप लगाया गया, लेकिन मानसिक स्थितियों को देखते हुए अदालत ने महिला को क़ातिल नहीं माना. ओंटारियो सुपीरियर कोर्ट ऑफ जस्टिस की जज Jane Kelly ने सुनवाई के दौरान कहा कि महिला सिज़ोफ्रेनिया जैसे गंभीर मानसिक लक्षणों से पीड़ित थी और उसे यह समझ नहीं थी कि वो जो कर रही है वो नैतिक रूप से गलत है. इसी आधार पर उसे “नॉट क्रिमिनली रिस्पॉन्सिबल” माना गया.
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, जुलाई 2024 में पैदा हुआ चार महीने का बच्चा अपने माता-पिता के साथ मिडटाउन टोरंटो की एक ऊंची इमारत में आठवीं मंजिल पर रहता था. 20 नवंबर की सुबह पिता के घर से बाहर जाने के बाद महिला बच्चे को गारबेज रूम में ले गई और उसे गार्बेज च्यूट में फेंक दिया. इसके बाद महिला ने खुद भी कूदने की कोशिश की. हालांकि ये रास्ता बेहद छोटा होता है, जिसकी वजह से वो कूद न सकी. लेकिन महिला के शरीर पर कई खरोंच के निशान मिले.
(बिल्डिंग में हर मंजिल पर एक कड़े का कमरा था, इसमें गार्बेज च्यूट यानी कूड़ा फेंकने का एक संकीर्ण रास्ता होता है जो सीधा ग्राउंड फ्लोर तक जाता है. यानी हर मंजिल से फेंका गया कूड़ा ग्राउंड फ्लोर पर इसी जगह जमा होता है.)
कुछ समय बाद जब पिता घर लौटा, तो उसने बच्चे के बारे में पूछा. महिला ने कुछ अजीब जवाब दिए और आखिर में कहा, "मुझे नहीं पता बच्चा कहां है, लेकिन शायद वह कूड़ेदान में है."
शक होने पर पिता तुरंत नीचे गया, जहां उन्हें बच्चे का सामान मिला. इसके बाद उन्होंने पुलिस को सूचना दी. अधिकारियों ने तहखाने में कचरे के बीच बच्चे को मृत अवस्था में पाया. अस्पताल ले जाने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया.
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आया कि बच्चे की मौत गंभीर चोटों के कारण हुई थी.
इस मामले की शुरुआत में महिला पर बच्चे की देखभाल में लापरवाही का आरोप लगाया गया था, जिसे बाद में बढ़ाकर हत्या में बदल दिया गया लेकिन सुनवाई के दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों ने मानसिक स्वास्थ्य आधार पर संयुक्त याचिका दाखिल की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया.
आधुनिक न्यूरोसाइंस भी इस बात का समर्थन करता है कि पोस्टपार्टम साइकोसिस से पीड़ित महिला द्वारा शिशु-हत्या जैसे मामलों में सज़ा से ज्यादा इलाज जरूरी होता है. पोस्टपार्टम साइकोसिस एक दुर्लभ लेकिन बेहद गंभीर मानसिक स्थिति है, जो अक्सर बाइपोलर डिसऑर्डर या सिज़ोफ्रेनिया से जुड़ी होती है. इस दौरान महिला की “रियलिटी समझने की क्षमता” प्रभावित हो जाती है. उसे भ्रम, आवाजें सुनाई देना और तीव्र मूड बदलाव हो सकते हैं.
न्यूरोसाइंस के अनुसार, यह स्थिति दिमाग में डोपामिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर के असंतुलन और प्रसव के बाद अचानक हार्मोनल बदलाव के कारण होती है, जो सोच, निर्णय और व्यवहार को नियंत्रित करने वाले ब्रेन सर्किट्स को प्रभावित करते हैं. ऐसे में कई बार महिला को सही-गलत का एहसास नहीं होता. इसी वजह से कई देशों की कानूनी और मेडिकल प्रणाली ऐसे मामलों में सज़ा की बजाय मानसिक इलाज को प्राथमिकता देती है.
हुमरा असद