ईरान दुनिया के मानचित्र पर एक ऐसे देश के रूप में जाना जाता है, जिसकी राजनीतिक व्यवस्था दशकों से जितनी स्थिर और मजबूत दिखती है, उतनी ही रहस्यमयी भी है. हालांकि, हाल के वर्षों में इसी व्यवस्था के कमजोर पड़ने और बदलाव की चर्चाएं तेज हुई हैं. सवाल यह है कि क्या ये संकेत वास्तविक हैं, या फिर वही पुराना फॉर्मूला एक बार फिर दोहराया जा रहा है, जिसके तहत अमेरिका ने अतीत में अफगानिस्तान, इराक और सीरिया जैसे मुल्कों पर हमला कर दिया? इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने मैं हाल ही में ईरान गया.
अपने अनुभव को साझा करू उसेसे पहले ईरान की ताजा पृष्ठभूमि समझ लेते हैं. 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ईरान एक इस्लामिक रिपब्लिक है, जहां सर्वोच्च सत्ता सुप्रीम लीडर के पास होती है. वर्तमान सुप्रीम लीडर अली खामेनेई हैं. इस व्यवस्था में समय-समय पर सुधार, विरोध और दबाव जरूर दिखे हैं, लेकिन शासन का ढांचा अब तक कायम है.
लेकिन हाल के महीनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरानी जनता और उनके अधिकारों को लेकर चिंता जताते हुए अरब सागर में ईरान के पास बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती बढ़ा दी है. यह वही अमेरिका है, जिसके आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान में आम लोगों की जिंदगी को कठिन बनाया है. ऐसे में ईरान की जनता के भीतर अमेरिका को लेकर गुस्सा है. इसके बावजूद ट्रंप ईरान में 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) की बात कर रहे हैं- जैसा दावा वह वेनेजुएला के संदर्भ में कर चुके हैं.
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सच में 'सत्ता परिवर्तन' चाहते हैं ईरान के लोग?
सवाल उठता है कि क्या वाकई ईरान के अंदर सत्ता परिवर्तन की जमीन तैयार हो रही है, या यह बाहरी नैरेटिव भर है? ईरानी जनता के भीतर मौजूदा शासन के खिलाफ असंतोष मौजूद है. महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक और सांस्कृतिक पाबंदियां इसकी प्रमुख वजहें हैं. लेकिन इसकी जड़ में ईरान पर लंबे समय से लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध भी हैं. ईरान में इस्लामी शासन के खिलाफ 2022–23 के बाद असंतोष गहरा हुआ और जनवरी 2026 के विरोध प्रदर्शनों में एक बड़ा युवा वर्ग बदलाव की मांग करता दिखा.
हालांकि, यह सत्ता परिवर्तन से ज्यादा आर्थिक सुधारों और सामाजिक-सांस्कृतिक पाबंदियों से आजादी की मांग है. ईरान के ग्रामीण और पारंपरिक तबकों में इस्लामिक रिपब्लिक का समर्थन अब भी मजबूत है. हाल ही में ईरान ने 47वां राष्ट्रीय दिवस (ईरान में इस्लामी क्रांति का दिन) मनाया. सड़कों पर उतरी भीड़ ने एक राजनीतिक संदेश दिया कि ईरान की जनता इस्लामी शासन के साथ अब भी संगठित है.
क्या अमेरिका कर सकता है ईरान पर हमला?
अमेरिका द्वारा ईरान में वेनेजुएला जैसा कदम उठाना फिलहाल दूर की कौड़ी लगता है. पिछले वर्ष हुए हमलों के बाद ईरान ने अपने परमाणु संवर्धन ढांचे को और मजबूत किया है. दशकों के दबाव, आर्थिक प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम पर रोक और क्षेत्रीय प्रभाव सीमित करने की अमेरिका की कोशिशों के बावजूद ईरान ने खुद को एक सशक्त सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित किया है.
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ईरान के बैलिस्टिक मिसाइलों का जखीरा उसका सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है, जिससे वह अमेरिका और इजरायल को संतुलन में रखता है. जून 2025 में हुए हमलों के बाद ईरान की जवाबी कार्रवाई ने दोनों देशों के एयर डिफेंस की सीमाएं उजागर कीं और उन्हें एहसास करा दिया की ईरान की मिसाइल पॉवर उनके लिए इस रीजन में बड़ा खतरा है. यही वजह है कि अमेरिका परमाणु वार्ता में ईरान से अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक की मांग करने लगा.
अमेरिका और इजरायल के साथ उस 12 दिन के संघर्ष ने ईरान को अपनी सैन्य क्षमताओं खासकर एयर डिफेंस और बैलिस्टिक मिसाइल कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम को मॉडर्न करने पर मजबूर किया. चीन की मदद से ईरान अपने इन सिस्टम्स को और अधिक इंटीग्रेटेड और सटीक बना रहा है. ट्रंप प्रशासन के ‘रेजिम चेंज’ का दावा ईरान में जमीन पर उतना मजबूत नहीं दिखता, जितना प्रचारित किए जा रहा है. हां, आर्थिक मोर्चे पर ईरान की चुनौतियां बढ़ रही हैं और जनता के भीतर असंतोष भी है. फिलहाल व्यवस्था संभली हुई दिखती है, लेकिन अगर आर्थिक दबाव और उम्मीदों का अंतर बढ़ा, तो असंतोष गुस्से में बदल सकता है. यही ईरान की सबसे बड़ी परीक्षा है और अमेरिका की रणनीति इस असंतोष को भुनाने की.
सुमित चौधरी