बांग्लादेश में 93% नौकरियां हुईं आरक्षण मुक्त, क्या सुप्रीम कोर्ट के नए आरक्षण फॉर्मूले से आएगा बदलाव?

बांग्लादेश में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों के बीच वहां के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कोटा व्यवस्था को लेकर बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने स्वतंत्रता सेनानियों के बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण को घटा दिया है. इसे पीएम शेख हसीना के लिए झटका माना जा रहा है.

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बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में 93 फीसदी पद मेरिट के आधार पर भरने का आदेश दिया है. (Photo: Reuters) बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में 93 फीसदी पद मेरिट के आधार पर भरने का आदेश दिया है. (Photo: Reuters)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 जुलाई 2024,
  • अपडेटेड 2:00 PM IST

बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने कई दिनों तक चले हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकारी नौकरियों के लिए कोटा प्रणाली को वापस ले लिया है. कोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को ख़ारिज कर दिया, जिसमें आरक्षण को बहाल कर दिया गया था. नौकरियों में कमी और कोटा सिस्टम खत्म करने की मांग को लेकर देश के अधिकांश प्रमुख शहरों में छात्रों और पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं थी जिसमें में 130 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी, जबकि हजारों लोग घायल हुए थे.

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दरअसल, बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 14 जुलाई को कह दिया था कि अगर स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को कोटे का फ़ायदा ना मिले, तो क्या 'रजाकारों' के पोते-पोतियों को मिलना चाहिए? इस बयान के बाद युवाओं में आक्रोश फैल गया. कोटा सिस्टम हटाने की युवाओं की मांग ने और जोर पकड़ लिया.

क्या थी प्रदर्शनकारियों की मांग
दरअसल प्रदर्शनकारी उस कोटा प्रणाली को समाप्त करने की मांग कर रहे थे, जिसके तहत बांग्लादेश के 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में लड़ने वाले दिग्गजों के रिश्तेदारों के लिए 30% सरकारी नौकरियां आरक्षित की गई थीं. इनमें से 30 प्रतिशत 1971 के मुक्ति संग्राम के स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए, 10 प्रतिशत पिछड़े प्रशासनिक जिलों के लिए, 10 प्रतिशत महिलाओं के लिए, पांच प्रतिशत जातीय अल्पसंख्यक समूहों के लिए और एक प्रतिशत विकलांग लोगों के लिए आरक्षित हैं. आंदोलन स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों को मिलने वाले 30 फीसदी आरक्षण के खिलाफ चलाया जा रहा है. 

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प्रदर्शनकारी छात्रों ने दावा किया कि यह नीति भेदभावपूर्ण है और तर्क दिया कि यह प्रणाली देश की सत्तारूढ़ पार्टी के सहयोगियों को फायदा पहुंचाती है जिसने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था.हालांकि सरकार ने आरोप को खारिज कर दिया था. बता दें कि बांग्लादेश में हर साल करीब 3 हजार सरकारी नौकरियां ही निकलती हैं, जिनके लिए करीब 4 लाख कैंडिडेट अप्लाई करते हैं.

इसी 80 फ़ीसदी में 30 फ़ीसदी आरक्षण आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वालों के बच्चों को और 10 फ़ीसदी आरक्षण युद्ध से प्रभावित महिलाओं को देने का फैसला किया गया. इसके बाद अलग-अलग सालों में आरक्षण की व्यवस्था में कई बदलाव किये गये. हालांकि ये 30 फ़ीसदी आरक्षण की व्यवस्था हमेशा जारी रही. इसके बाद आया 2018 का साल. सरकार ने तब कोटा प्रणाली को ख़त्म कर दिया. लेकिन 5 जून, 2024 को हाई कोर्ट ने सरकार के फ़ैसले को अवैध बता दिया और कुल कोटा 56% तय कर दिया. इसके बाद से ही प्रदर्शन जारी था.

क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला
रविवार को एक अपील पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में भाग लेने वालों के परिजनों के लिए 5 फीसदी आरक्षण देने का आदेश दिया, शेष 2% कोटा जातीय अल्पसंख्यकों और ट्रांसजेंडर और विकलांग लोगों के लिए अलग रखा जाएगा. यानि,अब 93% सरकारी नौकरियां योग्यता के आधार पर आवंटित की जाएंगी.

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उम्मीद है कि आरक्षण नीति में कटौती होने के बाद अब हिंसक प्रदर्शनों पर रोक लगेगी और हालात सामान्य हो जाएंगे. सरकार को विरोध प्रदर्शनों को रोकने के प्रयास में सेना को बुलाने के लिए मजबूर होना पड़ा. सैनिकों और बख्तरबंद वाहनों ने सड़कों पर गश्त की, जबकि हेलीकॉप्टर आसमान से निगरानी रख रहे थे.

देश में लगा दिया गया था कर्फ्यू

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को देखते हुए 19 जुलाई देर रात से ही देशभर में कर्फ्यू लगाया गया था. बाद में इसे 21 जुलाई की दोपहर 3 बजे तक के लिए बढ़ा दिया गया था. स्थानीय मीडिया ने दिन में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच छिटपुट झड़पों की ख़बरें आती रहीं. राजधानी ढाका की सड़कों पर सैनिक गश्त कर रहे थे, जो प्रदर्शनों का गढ़ बना गया था. विरोध प्रदर्शन को दबाने के लिए देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए थे. सुप्रीम कोर्ट के गेट के बाहर सैन्य टैंक तैनात किया गया था. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद हालात पर काफी हद तक काबू पाया गया है. 

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बांग्लादेश सरकार का बयान
बांग्लादेश सरकार ने कोटा आंदोलन पर बयान जारी करते हुए विपक्षी बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी को दोषी ठहराया है.सरकार ने कहा, "हमेशा इस बात की संभावना बनी हुई थी कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और उसके चरमपंथी सहयोगी जमात-ए-इस्लामी अपने स्वयं के एजेंडे को लागू करने के लिए छात्र विरोध प्रदर्शनों के जरिए लाभ उठाने की कोशिश करेंगे, जैसे- बांग्लादेश में हिंसा और आतंकवाद के माध्यम से एक असंवैधानिक सत्ता हथियाना. पिछले दिनों हुई हिंसा से यह डर सच साबित हो गया जब अहिंसक और गैर-राजनीतिक कोटा विरोधी प्रदर्शनकारियों को ढाल के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की गई."

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सरकार ने कहा है कि अभी तक यह आकलन नहीं कर सकी है कि इन हिंसक प्रदर्शनों में कितना नुकसान हुआ है. हिंसक प्रदर्शनकारियों ने सार्वजनिक और निजी परिवहन, और महत्वपूर्ण सरकारी प्रतिष्ठान और संपत्तियों को निशाना बनाया. सरकार के मुताबिक, 'जान-माल को नुकसान पहुंचाने वाली इस भयावह और सुनियोजित हिंसा को देखते हुए सरकार को  कर्फ्यू लगाने का कठिन निर्णय लेना पड़ा. जान-माल के नुकसान को रोकने, सार्वजनिक और निजी संपत्तियों की सुरक्षा और देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को बनाए रखने के लिए बहुत विचार-विमर्श के बाद यह निर्णय लिया गया.'

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