21 घंटे चली अमेरिका-ईरान वार्ता, आज भी जारी रहेंगी बातचीत… क्या निकलेगा समाधान या फिर होगा टकराव?

इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे लंबी बातचीत के बाद भी कोई ठोस समझौता नहीं हो पाया है. दोनों पक्षों ने नए प्रस्ताव रखे हैं और तकनीकी स्तर पर चर्चा जारी है. होर्मुज स्ट्रेट, परमाणु कार्यक्रम और भविष्य में जंग न होने की गारंटी जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं. बातचीत आज भी जारी रहेगी.

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ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (L), पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (M) और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस. (Photo: AP) ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची (L), पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ (M) और अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस. (Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 12 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 7:05 AM IST

करीब छह हफ्तों तक चली विनाशकारी जंग के बाद अब दुनिया की उम्मीदें एक बार फिर बातचीत की टेबल पर टिकी हैं. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही हाई-लेवल बातचीत अब अपने सबसे अहम मोड़ पर पहुंच गई है. हालात ऐसे हैं कि हर घंटे बदलती स्थिति के बीच यह तय होना बाकी है कि आने वाले दिनों में मध्य पूर्व शांति की ओर बढ़ेगा या फिर एक बार फिर जंग की आग भड़क सकती है.

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शनिवार को दोनों देशों के बीच तीसरे दौर की बातचीत हुई, जो करीब 21 घंटे तक चली. यह बातचीत इतनी लंबी और गहन रही कि देर रात से शुरू होकर रविवार सुबह तक जारी रही. रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत रात करीब 3:40 बजे खत्म हुई, लेकिन इसके बाद भी यह साफ हो गया कि मामला अभी सुलझा नहीं है. यही वजह है कि दोनों पक्षों ने बातचीत को आगे बढ़ाने का फैसला किया और अब यह प्रक्रिया अगले दिन यानी आज भी जारी रहेगी.

इस बातचीत में अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस नेतृत्व कर रहे हैं, जबकि ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकिर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची शामिल हैं. दोनों देशों के साथ-साथ बड़ी संख्या में विशेषज्ञ भी मौजूद हैं, जो इस बातचीत को तकनीकी स्तर तक लेकर जा चुके हैं.

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दरअसल, शुरुआती दौर में बातचीत सिर्फ नेताओं के बीच हो रही थी, लेकिन अब इसमें आर्थिक, सैन्य, कानूनी और परमाणु विशेषज्ञों की टीमें भी शामिल हो चुकी हैं. असली मुद्दों पर ठोस समाधान तलाशने की कोशिश हो रही है. आमने-सामने बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे को लिखित ड्राफ्ट भी सौंपे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि कुछ पॉइंट्स पर शुरुआती सहमति बन रही है, लेकिन अभी भी काफी चीजें उलझी हुई हैं.

इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम बनी हुई है. प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ खुद इस बातचीत की निगरानी कर रहे हैं और दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल से अलग-अलग मुलाकात भी कर चुके हैं. पाकिस्तान के प्रस्ताव पर ही बातचीत को एक और दौर के लिए बढ़ाया गया है. साफ है कि पाकिस्तान इस मौके को एक बड़े कूटनीतिक अवसर के तौर पर देख रहा है.

लेकिन सवाल यह है कि आखिर बातचीत में अड़चन कहां आ रही है. सबसे बड़ा विवाद अब भी स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर है. यह दुनिया का सबसे अहम तेल मार्ग है और इसी पर दोनों देशों के बीच टकराव सबसे ज्यादा है. ईरान चाहता है कि इस पर उसका नियंत्रण बना रहे, जबकि अमेरिका चाहता है कि यह रास्ता पूरी तरह खुला रहे और किसी भी देश के नियंत्रण में न हो. यही मुद्दा बातचीत को बार-बार रोक रहा है.

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दूसरा बड़ा मुद्दा परमाणु कार्यक्रम का है. अमेरिका लगातार दबाव बना रहा है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे और यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाए. वहीं ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम उसका अधिकार है और वह इसे किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेगा. यह मुद्दा भी दोनों देशों के बीच गहरी खाई पैदा कर रहा है.

इसके अलावा एक और अहम मुद्दा भविष्य में जंग न होने की गारंटी का है. ईरान चाहता है कि अमेरिका लिखित रूप में यह वादा करे कि आगे कभी उस पर हमला नहीं किया जाएगा. वहीं अमेरिका इस तरह की किसी भी स्थायी गारंटी देने से बच रहा है. यही वजह है कि भरोसे की कमी बातचीत में सबसे बड़ी चुनौती बन गई है.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले दौर में दोनों पक्ष किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सके, जिसके बाद अब एक संशोधित ड्राफ्ट पर काम किया जा रहा है. तकनीकी टीमें इस ड्राफ्ट को तैयार कर रही हैं, जिसमें हर मुद्दे को विस्तार से शामिल किया जाएगा. यही ड्राफ्ट आगे की बातचीत का आधार बनेगा.

ईरानी अधिकारियों ने इस दौर को "आखिरी मौका" तक बताया है. उनका कहना है कि अगर इस बार कोई ढांचा तैयार नहीं हुआ, तो बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर सकती है. इसका मतलब साफ है कि आने वाले कुछ घंटे बेहद निर्णायक होने वाले हैं.

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इस पूरी बातचीत का समय भी काफी अहम है. जंग को रोके हुए अभी सिर्फ कुछ ही दिन हुए हैं और जो दो हफ्ते का सीजफायर हुआ है, वह भी काफी नाजुक स्थिति में है. अगर बातचीत सफल होती है, तो यही सीजफायर एक स्थायी शांति समझौते में बदल सकता है. लेकिन अगर बातचीत विफल होती है, तो हालात दोबारा बिगड़ सकते हैं.

तेल बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और मध्य पूर्व की सुरक्षा, सब कुछ इस बातचीत पर निर्भर करता है. पिछले कुछ हफ्तों में तेल की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखा गया है, जिसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा है. ऐसे में यह बातचीत सिर्फ दो देशों के बीच का मामला नहीं रह गया है, बल्कि पूरी दुनिया इससे प्रभावित हो रही है.

फिलहाल स्थिति यही है कि बातचीत जारी है, लेकिन रास्ता अभी लंबा है. दोनों पक्ष अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं, लेकिन बातचीत बंद नहीं हुई है, यही सबसे बड़ी उम्मीद है. अब सबकी नजरें अगले दौर पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि क्या दोनों देश किसी समझौते के करीब पहुंच पाएंगे या फिर यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा. आने वाले कुछ घंटे और दिन यह तय करेंगे कि इस्लामाबाद शांति का गवाह बनेगा या फिर एक और बड़े टकराव की शुरुआत यहीं से होगी.

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