कनाडा का पश्चिमी प्रांत Alberta एक बार फिर अलगाव की मांग को लेकर चर्चा में है. Stay Free Alberta संगठन द्वारा शुरू की गई जनमत संग्रह की पहल ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया है. संगठन का दावा है कि उसने लाखों हस्ताक्षर जुटाकर यह दिखा दिया है कि प्रांत में एक बड़ा वर्ग कनाडा से अलग होने के विचार का समर्थन करता है.
इस पूरे आंदोलन की जड़ में वह भावना है जिसे लंबे समय से “वेस्टर्न एलियनेशन” कहा जाता है. इसका मतलब है कि कई अल्बर्टा निवासी मानते हैं कि संघीय सरकार, जो ओटावा में स्थित है, उनके प्रांत के हितों को पर्याप्त महत्व नहीं देती.
सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ा हुआ है. अल्बर्टा को कनाडा के सबसे समृद्ध ऊर्जा-समृद्ध क्षेत्रों में गिना जाता है, खासकर तेल और गैस उत्पादन की वजह से. अलगाव समर्थकों का आरोप है कि संघीय सरकार की जलवायु नीतियां और पर्यावरण संबंधी नियम इस उद्योग को प्रभावित करते हैं और प्रांत की आर्थिक क्षमता को सीमित करते हैं. उनका मानना है कि अगर अल्बर्टा स्वतंत्र हो जाए तो वह अपने संसाधनों पर पूरा नियंत्रण रख सकेगा और अपनी अर्थव्यवस्था को अपनी शर्तों पर चला सकेगा.
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दूसरा बड़ा कारण राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष है. कई समर्थकों का कहना है कि कनाडा की संघीय राजनीति में अल्बर्टा की आवाज कमजोर पड़ जाती है, और बड़े फैसलों में प्रांत के हितों को नजरअंदाज किया जाता है. यह भावना सालों से धीरे-धीरे बढ़ती रही है और अब यह खुलकर अलगाव की मांग के रूप में सामने आ रही है.
इस बीच, इस आंदोलन को कानूनी और सामाजिक विरोध का भी सामना करना पड़ रहा है. Athabasca Chipewyan First Nation सहित कई स्वदेशी समूहों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है. उनका कहना है कि अलग देश बनने की स्थिति में उनके ऐतिहासिक संधि अधिकारों पर असर पड़ेगा और यह उनकी जीवनशैली और भूमि अधिकारों को भी प्रभावित कर सकता है.
इस पूरे विवाद पर अदालत में भी सुनवाई चल रही है. पहले एक न्यायालय ने संकेत दिया था कि इस तरह का जनमत संग्रह संविधान और फर्स्ट नेशंस अधिकारों के खिलाफ हो सकता है. अब यह तय होना बाकी है कि क्या नागरिक-स्तर पर शुरू की गई यह प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है या नहीं.
राजनीतिक रूप से देखें तो यह मुद्दा अभी अल्पमत में है, लेकिन लगातार चर्चा में बना हुआ है. हालिया सर्वेक्षणों के अनुसार, लगभग 25 प्रतिशत लोग ही अलगाव का समर्थन करते हैं, जबकि एक बड़ा हिस्सा इसके खिलाफ है. इसके बावजूद, यह आंदोलन लगातार मजबूत होता दिख रहा है क्योंकि इसके पीछे आर्थिक असंतोष, पहचान की राजनीति और क्षेत्रीय उपेक्षा की भावना जुड़ी हुई है.
हुमरा असद