‘ईमानदारी नहीं छोड़ी तो गन्ने के खेत में कंकाल मिलेगा’, जब IAS रिंकू सिंह राही को मिली धमकी

आईएएस रिंकू सिंह राही की कहानी ईमानदारी की भारी कीमत को दिखाती है. घोटाले का खुलासा करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी मिली थी. अब सिस्टम से निराश होकर उन्होंने तकनीकी इस्तीफा दे दिया है और पीसीएस सेवा में लौटना चाहते हैं. उन्होंने कहा कि उन्हें काम करने का अवसर नहीं मिला. पहले उनका वीडियो भी विवादों में रहा, जिसके बाद उन्हें राजस्व परिषद भेजा गया, जहां उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई.

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रिंकू सिंह राही ने इस्तीफा दे दिया है. Photo ITG रिंकू सिंह राही ने इस्तीफा दे दिया है. Photo ITG

संतोष शर्मा

  • लखनऊ,
  • 01 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 5:18 PM IST

ईमानदारी की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है, इसका उदाहरण आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही की कहानी में साफ नजर आता है. एक समय घोटाले का पर्दाफाश करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी मिली, यहां तक कहा गया कि अगर ईमानदारी नहीं छोड़ी तो गन्ने के खेत में लाश नहीं कंकाल मिलेगा. अब उसी अधिकारी ने सिस्टम से निराश होकर आईएएस पद से तकनीकी इस्तीफा दे दिया है.

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रिंकू सिंह ने अपने करियर के शुरुआती दौर का भी जिक्र किया है, जब वह मुजफ्फरनगर में जिला समाज कल्याण अधिकारी थे. वहीं उन्होंने विभाग में बड़े घोटाले का खुलासा किया था, जिसमें सरकारी धन फर्जी खातों में ट्रांसफर किया जा रहा था. इस घोटाले को उजागर करने के बाद उन्हें तत्कालीन प्रमुख सचिव की ओर से धमकी मिली कि ईमानदारी नहीं छोड़ी तो गन्ने के खेत में लाश नहीं कंकाल मिलेगा.

आईएएस रिंकू सिंह राही का इस्तीफा इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है. उन्होंने जो त्यागपत्र दिया है, वह सामान्य नहीं बल्कि तकनीकी त्यागपत्र है. इसका मतलब यह है कि वह अपनी पूर्ववर्ती सेवा यानी पीसीएस में वापस जाना चाहते हैं. अपने 7 पेज के इस्तीफे में उन्होंने साफ किया है कि जब उन्हें आईएएस के तौर पर काम करने का अवसर ही नहीं मिल रहा, तो इस पद पर बने रहने का कोई औचित्य नहीं है.

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रिंकू सिंह का वीडियो हुआ था वायरल
जुलाई 2025 में शाहजहांपुर के पुवाया में एसडीएम के रूप में तैनाती के दौरान रिंकू सिंह उस समय सुर्खियों में आए थे, जब उनका वकीलों के सामने कान पकड़कर उठक-बैठक लगाने का वीडियो वायरल हुआ. इस पर उन्होंने सफाई देते हुए कहा था कि उन्होंने यह कदम खुद को जनता का सेवक मानते हुए और अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रेरित करने के उद्देश्य से उठाया था. हालांकि इस घटना के बाद उनकी काफी किरकिरी हुई और 30 जुलाई 2025 को उन्हें राजस्व परिषद से संबद्ध कर दिया गया.

राजस्व परिषद में करीब दो महीने तक उन्हें कोई काम नहीं दिया गया. इससे आहत होकर उन्होंने 29 सितंबर 2025 को ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत पर वेतन न लेने की अर्जी दी. अपने इस्तीफे में उन्होंने लिखा कि उन्होंने जनहित से जुड़े मुद्दों पर काम करने की कोशिश की, लेकिन आवश्यक तकनीकी सहयोग तक उपलब्ध नहीं कराया गया.

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