जनगणना में पूछे जाने वाले कई सवाल आम लोगों की जिंदगी से सीधे जुड़े हैं. 34 सवालों वाले इस फॉर्म में परिवार, रिश्ते, रहने की व्यवस्था और घर के मुखिया तक को लेकर कई दिलचस्प नियम बनाए गए हैं. सबसे ज्यादा चर्चा उस नियम की हो रही है जिसमें कहा गया है कि अगर किसी पुरुष की दो पत्नियां हैं, तो उसे दो अलग-अलग परिवार माना जाएगा. वहीं अगर किसी महिला के दो पति हैं, तो उसे एक ही परिवार की श्रेणी में रखा जाएगा.
जनगणना फॉर्म के मुताबिक परिवार की गिनती इस आधार पर की जाएगी कि रसोई और घरेलू व्यवस्था कैसे चल रही है. यदि एक पुरुष की दो पत्नियां हैं तो दोनों को अलग परिवार माना जाएगा. यही वजह है कि दो पत्नियां तो दो फैमिली वाला नियम सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. लोग इसे मजाकिया अंदाज में भी देख रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि जनगणना का उद्देश्य किसी के निजी जीवन पर टिप्पणी करना नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक ढांचे का डेटा तैयार करना है. सरकार यह जानना चाहती है कि देश में परिवारों की वास्तविक संरचना कैसी है और कितने लोग किस तरह के घरेलू ढांचे में रह रहे हैं.
परिवार का मुखिया कौन? अब घर वाले तय करेंगे
इस बार जनगणना में एक और बड़ा बदलाव परिवार के मुखिया को लेकर किया गया है. अब तक आमतौर पर घर के सबसे बुजुर्ग पुरुष को ही मुखिया माना जाता था, लेकिन नए नियमों में यह अनिवार्य नहीं होगा. परिवार के सदस्य जिस व्यक्ति को मुखिया मानेंगे, उसी का नाम दर्ज किया जाएगा. यानी अब घर की बहू, पत्नी, बेटी या दादी भी परिवार की मुखिया हो सकती हैं. समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह बदलाव भारतीय परिवार व्यवस्था में हो रहे सामाजिक परिवर्तन को दर्शाता है. शहरों में ही नहीं, गांवों में भी अब महिलाएं आर्थिक और सामाजिक फैसलों में बड़ी भूमिका निभा रही हैं. ऐसे में जनगणना के जरिए इस बदलाव को आधिकारिक रूप से दर्ज करने की तैयारी की जा रही है.
दुकान में सोते हैं तो क्या होगा
जनगणना फॉर्म में रहने की स्थिति को लेकर भी कई स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं. अगर कोई परिवार दुकान में सोता पाया जाता है, तो उस स्थान को सामान्य मकान या कमरा नहीं माना जाएगा. इसी तरह बरामदा, गैलरी और छज्जे को भी रहने योग्य कमरे की श्रेणी में शामिल नहीं किया जाएगा. सरकार का उद्देश्य यह पता लगाना है कि कितने परिवारों के पास पर्याप्त आवासीय सुविधाएं उपलब्ध हैं और कितने लोग अभी भी सीमित संसाधनों में जीवन गुजार रहे हैं. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह डेटा भविष्य की आवास योजनाओं और शहरी विकास नीति तय करने में अहम भूमिका निभाएगा.
नौकर भी बन सकता है परिवार का सदस्य
जनगणना के नियमों में घरेलू सहायकों को लेकर भी दिलचस्प व्यवस्था बनाई गई है. अगर कोई घरेलू नौकर या सहायक परिवार के साथ उसी घर में रहता है और उसी रसोई का खाना खाता है, तो उसे भी परिवार का हिस्सा माना जाएगा. उसका विवरण भी परिवार के सदस्यों के साथ फॉर्म में दर्ज किया जाएगा. यानी सिर्फ खून के रिश्ते ही परिवार तय नहीं करेंगे, बल्कि साथ रहने और भोजन साझा करने की स्थिति भी महत्वपूर्ण मानी जाएगी. यह नियम उन लाखों घरेलू सहायकों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है जो वर्षों से परिवारों के साथ रह रहे हैं लेकिन आधिकारिक आंकड़ों में अलग श्रेणी में दर्ज होते रहे हैं.
चार दोस्त भी बन सकते हैं एक परिवार
नई जनगणना में युवाओं की बदलती जीवनशैली को भी ध्यान में रखा गया है. यदि चार दोस्त एक कमरे में साथ रहते हैं और सामूहिक रूप से जीवनयापन करते हैं, तो उन्हें भी एक परिवार माना जा सकता है. ऐसे समूह में कोई भी व्यक्ति परिवार का मुखिया घोषित किया जा सकेगा. बड़े शहरों में नौकरी और पढ़ाई के लिए रहने वाले युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. किराए के फ्लैट और साझा कमरों में रहने वाले ऐसे लोगों की वास्तविक स्थिति को समझने के लिए यह नियम अहम माना जा रहा है.
डेटा से तय होंगी भविष्य की योजनाएं
जनगणना सिर्फ आबादी गिनने की प्रक्रिया नहीं होती. इसी डेटा के आधार पर सरकारें भविष्य की योजनाएं बनाती हैं. स्कूल, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी, आवास और राशन जैसी योजनाओं की जरूरत का आकलन भी जनगणना के आंकड़ों से होता है. यही वजह है कि इस बार परिवार की संरचना, कमरों की संख्या, साथ रहने वाले लोगों और घरेलू व्यवस्था को लेकर अधिक विस्तार से जानकारी जुटाने की तैयारी की गई है. विशेषज्ञों के मुताबिक बदलते भारत को समझने के लिए पारंपरिक परिवार की परिभाषा से आगे बढ़ना जरूरी हो गया है. अब अकेले रहने वाले लोग, साझा फ्लैट में रहने वाले युवा, घरेलू सहायकों के साथ रहने वाले परिवार और महिलाओं के नेतृत्व वाले घर तेजी से बढ़ रहे हैं.
सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस
जैसे ही जनगणना फॉर्म से जुड़े ये नियम सामने आए, सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई. कई लोगों ने दो पत्नियां तो दो फैमिली वाले नियम पर मजेदार मीम्स बनाए, जबकि कुछ लोगों ने इसे सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार करने वाला कदम बताया. कुछ यूजर्स ने सवाल उठाया कि अगर परिवार की परिभाषा बदल रही है, तो आने वाले समय में सरकारी योजनाओं और सामाजिक आंकड़ों पर इसका क्या असर पड़ेगा. वहीं कई लोगों ने परिवार की मुखिया के तौर पर महिलाओं को मान्यता देने वाले नियम का स्वागत किया. उनका कहना है कि यह बदलाव समाज में महिलाओं की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करने जैसा है.
सिमर चावला