उत्तर प्रदेश की सियासत में सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के एक फैसले ने पूर्वांचल की राजनीति को गरमा दिया है. राजभर ने अपनी पारंपरिक जहूराबाद विधानसभा सीट छोड़कर आजमगढ़ की अतरौलिया सीट से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. इस फैसले के बाद राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं तेज हो गई हैं. राजभर का यह कदम सिर्फ सीट बदलने का मामला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसके पीछे कई राजनीतिक संकेत और समीकरण छिपे हुए हैं. इसमें अंसारी परिवार का प्रभाव, जातीय गणित और भविष्य के गठबंधन की संभावनाएं अहम मानी जा रही हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर राजभर अपनी मजबूत मानी जाने वाली जहूराबाद सीट क्यों छोड़ना चाहते हैं. इसके पीछे गाजीपुर और मऊ क्षेत्र में अंसारी परिवार का बढ़ता प्रभाव एक बड़ी वजह माना जा रहा है. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में ओम प्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था. उस समय उन्हें अंसारी परिवार का समर्थन मिला था, जिसकी वजह से जहूराबाद सीट पर यादव और मुस्लिम वोटों का उन्हें फायदा मिला और वह चुनाव जीतने में सफल रहे.
जहूराबाद छोड़ अतरौलिया से चुनाव लड़ने का ऐलान
लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है. माना जा रहा है कि अंसारी परिवार पूरी तरह समाजवादी पार्टी के साथ खड़ा है. ऐसे में जहूराबाद में राजभर के पास सिर्फ अपने समुदाय के वोट ही बच सकते हैं. इसके अलावा सवर्ण समाज, जिसमें ठाकुर, ब्राह्मण और भूमिहार शामिल हैं, की नाराजगी भी राजभर के लिए एक बड़ी चुनौती बन रही है. इन सभी कारणों को देखते हुए राजभर अब एक सुरक्षित सीट की तलाश में हैं और इसी वजह से उन्होंने अतरौलिया सीट को चुना है.
राजभर ने सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि अपने बेटे के लिए भी आजमगढ़ की दीदारगंज सीट पर दावा ठोक दिया है. इस कदम ने एनडीए के भीतर नई खींचतान पैदा कर दी है. अतरौलिया सीट पर निषाद पार्टी का भी दावा रहा है. ऐसे में निषाद पार्टी के प्रमुख संजय निषाद ने राजभर के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने कहा कि गठबंधन में रहकर इस तरह की घोषणाएं करना सही नहीं है और राजभर को मर्यादा में रहना चाहिए.
संजय निषाद ने यह भी साफ किया कि उनसे इस बारे में कोई बातचीत नहीं हुई है.. वहीं राजभर का कहना है कि उन्होंने निषाद से बात कर ली. दोनों नेताओं के बयानों में यह टकराव साफ दिखाता है कि एनडीए के भीतर सीट शेयरिंग को लेकर स्थिति सहज नहीं है. राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह विवाद आने वाले चुनाव से पहले और भी बढ़ सकता है. क्योंकि पूर्वांचल में सीटों का बंटवारा सभी दलों के लिए बेहद अहम है.
अंसारी परिवार और बदले समीकरण बने बड़ी वजह
इस पूरे घटनाक्रम का एक और अहम पहलू है. वह है ओम प्रकाश राजभर की समाजवादी पार्टी के साथ कथित नजदीकियां. सियासी गलियारों में चर्चा है कि अतरौलिया सीट से चुनाव लड़ने की बात कहकर राजभर दरअसल सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं. अतरौलिया सीट के वर्तमान विधायक संग्राम सिंह यादव को अखिलेश यादव का करीबी माना जाता है. ऐसे में इस सीट पर दावा करना एक तरह से सपा नेतृत्व को संदेश देने की रणनीति भी हो सकती है.
हालांकि, दूसरी तरफ यह भी कहा जा रहा है कि अखिलेश यादव फिलहाल राजभर से नाराज हैं. उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को यह निर्देश दिया है कि 'पीले गमछे वालों' को पार्टी में एंट्री न दी जाए. इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राजनीति में संभावनाएं कभी खत्म नहीं होतीं. अगर बीजेपी के साथ सीटों को लेकर बात नहीं बनती है, तो राजभर एक बार फिर समाजवादी पार्टी के साथ जाने का फैसला कर सकते हैं.
राजभर का यह सियासी दांव कई मायनों में अहम है . एक तरफ वह अपने लिए सुरक्षित सीट तलाश रहे हैं, तो दूसरी तरफ वह गठबंधन की राजनीति में अपनी ताकत भी दिखाना चाहते हैं. पूर्वांचल की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं. ऐसे में राजभर का यह फैसला आने वाले चुनावों पर सीधा असर डाल सकता है.
सपा से बढ़ती नजदीकियों ने बढ़ाई सियासी हलचल
फिलहाल इतना साफ है कि ओम प्रकाश राजभर के इस कदम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल तेज कर दी है. जहूराबाद से अतरौलिया तक का यह सफर सिर्फ एक सीट बदलने का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई बड़े राजनीतिक संदेश छिपे हुए हैं. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजभर का यह दांव उन्हें कितना फायदा पहुंचाता है और उत्तर प्रदेश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है.
कुमार अभिषेक