नोएडा साइबर क्राइम थाना पुलिस ने चार शातिर साइबर ठगों को अरेस्ट किया है. ये आरोपी खुद को टेक्निकल सपोर्ट एक्सपर्ट बताकर अमेरिका और यूरोप के नागरिकों को निशाना बनाते थे और उनसे लाखों-करोड़ों रुपये की ठगी करते थे. पुलिस के मुताबिक, यह गैंग संगठित तरीके से काम कर रहा था और तकनीक का इस्तेमाल कर विदेशी नागरिकों को अपने जाल में फंसाता था.
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान बिलाल, देव कपाही, अभिषेक और कुशाग्र के रूप में हुई है. ये सभी आरोपी दिल्ली और राजस्थान के अलग-अलग इलाकों के रहने वाले हैं. पुलिस ने इनके पास से 4 लैपटॉप, 8 मोबाइल फोन, 4 हेडफोन और 2 राउटर बरामद किए हैं. इन उपकरणों का इस्तेमाल आरोपी ठगी के पूरे ऑपरेशन को चलाने में करते थे.
डीसीपी साइबर क्राइम शैव्या गोयल ने बताया कि यह गिरोह इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर टेक सपोर्ट के नाम से पेड विज्ञापन चलाता था.
इन विज्ञापनों में एक टोल-फ्री नंबर दिया जाता था, जिससे यह दिखाया जाता था कि यह किसी बड़ी और भरोसेमंद टेक कंपनी की सेवा है. जब कोई विदेशी नागरिक अपने कंप्यूटर या मोबाइल में समस्या आने पर इन नंबरों पर कॉल करता था, तो कॉल सीधे आरोपियों के सिस्टम तक पहुंच जाती थी.
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इसके बाद आरोपी बेहद प्रोफेशनल अंदाज में बात करते थे और खुद को तकनीकी विशेषज्ञ बताते थे. वे पीड़ितों को यह कहकर डराते थे कि उनके कंप्यूटर या मोबाइल में वायरस आ गया है या उनका सिस्टम हैक हो चुका है. डर और घबराहट का फायदा उठाते हुए आरोपी पीड़ित को स्क्रीन शेयरिंग ऐप डाउनलोड करने के लिए कहते थे. जैसे ही पीड़ित ऐसा करता, आरोपी उसकी डिवाइस का पूरा एक्सेस हासिल कर लेते थे.
डिवाइस का कंट्रोल मिलने के बाद आरोपी पीड़ित के सिस्टम में मौजूद निजी और बैंकिंग से जुड़ी जानकारी तक पहुंच जाते थे. कई मामलों में आरोपी कंप्यूटर स्क्रीन को ब्लैक कर देते थे, जिससे पीड़ित को लगता था कि उसका सिस्टम पूरी तरह हैक हो गया है. इस स्थिति में घबराकर पीड़ित आरोपियों के कहे अनुसार पैसे देने के लिए तैयार हो जाता था.
पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी पीड़ित के बैंक खाते की स्थिति देखकर ठगी की रकम तय करते थे. यदि खाते में कम बैलेंस होता था, तो वे 350 से 2000 अमेरिकी डॉलर तक वसूलते थे. वहीं, अगर पीड़ित के खाते में अधिक रकम होती थी, तो कॉल को उनके 'सीनियर' के पास ट्रांसफर कर दिया जाता था, जो बड़े स्तर पर ठगी को अंजाम देता था.
ठगी से मिलने वाली रकम को आरोपी सीधे अपने बैंक खातों में नहीं लेते थे, बल्कि क्रिप्टोकरेंसी और हवाला नेटवर्क के जरिए मंगाते थे, ताकि उनकी पहचान छुपी रहे. इसके बाद गिरोह के सदस्य आपस में रकम का बंटवारा कर लेते थे. पुलिस को जांच के दौरान करोड़ों रुपये के लेनदेन के सबूत मिले हैं, जिससे यह साफ होता है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और बड़े पैमाने पर ठगी कर रहा था.
डीसीपी शैव्या गोयल ने यह भी बताया कि गिरफ्तार आरोपी पढ़े-लिखे हैं, विदेशी लहजे में बात करते थे, जिससे पीड़ितों को उन पर आसानी से भरोसा हो जाता था. इसी भरोसे का फायदा उठाकर आरोपी ठगी को अंजाम देते थे. पुलिस अब इस गिरोह से जुड़े अन्य सदस्यों और बड़े नेटवर्क की जांच कर रही है.
भूपेन्द्र चौधरी