'जनरल कैटेगरी को 10% आरक्षण मिला तब किसी ने नहीं किया विरोध...', योगी सरकार के मंत्री बोले

UGC कानून पर विरोध के बीच संजय निषाद ने कहा कि जब जनरल कैटेगरी को 10 प्रतिशत EWS आरक्षण मिला था, तब किसी ने विरोध नहीं किया. उन्होंने सवाल उठाया कि अब सामाजिक भेदभाव रोकने के लिए कानून लाया गया तो हंगामा क्यों. संजय निषाद ने कहा कि संसद से बने कानून पहले लागू होने चाहिए, खामियां दिखें तो बाद में संशोधन संभव है.

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 कैबिनेट मंत्री संजय निषाद (Photo: Screengrab) कैबिनेट मंत्री संजय निषाद (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • कानपुर ,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:31 PM IST

देश में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों को लेकर जारी बहस के बीच यूपी सरकार में मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने कानपुर में खुलकर अपनी बात रखी. उन्होंने साफ कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां जो भी कानून संसद से पारित होकर आता है, वह जनता के हित को ध्यान में रखकर ही बनाया जाता है. किसी भी कानून को लागू होने से पहले ही नुकसानदेह बताना न केवल जल्दबाजी है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करने जैसा भी है.

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कानपुर में मीडिया से बातचीत के दौरान संजय निषाद ने कहा कि देश में कानून बनाने से पहले एक लंबी संवैधानिक प्रक्रिया होती है. आयोगों की रिपोर्ट आती है, विशेषज्ञों की राय ली जाती है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को भी ध्यान में रखा जाता है. UGC से जुड़ा नया कानून भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि यह कहना कि कोई कानून लागू होते ही समाज को नुकसान पहुंचाएगा, पूरी तरह गलत है. पहले कानून को लागू होने देना चाहिए. अगर उसके बाद कहीं कोई खामी सामने आती है, तो उस पर पुनर्विचार और संशोधन का रास्ता हमेशा खुला रहता है. यही लोकतंत्र की खूबसूरती है.

सबको इसका स्वागत करना चाहिए

संजय निषाद ने आरक्षण और सामाजिक न्याय के संदर्भ में संविधान सभा के फैसलों का जिक्र करते हुए कहा कि जब संविधान बनाया गया था, तब यह तय किया गया था कि देश में जो लोग सदियों से निचले पायदान पर रहे हैं, उन्हें ऊपर लाया जाएगा. समाज में बराबरी और सम्मान स्थापित करना ही संविधान का मूल उद्देश्य रहा है. इसी सोच के तहत अलग-अलग वर्गों के लिए समय-समय पर नीतियां बनाई गईं. उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जब आयोग की रिपोर्ट के आधार पर  जनरल कैटेगरी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया गया, तब किसी ने इसका विरोध नहीं किया. महिलाओं को आरक्षण मिला, तब भी समाज ने इसे स्वीकार किया. ऐसे में अगर आज सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए कोई कानून लाया जा रहा है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए, न कि बेवजह उसका विरोध.

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ओबीसी के लिए भी बढ़ गया था भेदभाव

संजय निषाद ने कहा कि रिपोर्टों में यह सामने आया है कि भेदभाव केवल अनुसूचित जाति और जनजाति तक सीमित नहीं है, बल्कि अब यह ओबीसी वर्ग के भीतर भी बढ़ा है. ऐसे में अगर किसी आयोग ने तथ्यों और आंकड़ों के आधार पर अपनी रिपोर्ट दी है और उसी रिपोर्ट के आधार पर कानून बनाया गया है, तो उसे जातिवाद से जोड़कर देखना गलत होगा. उन्होंने कहा कि समाज में सदियों से जातियों के आधार पर भेदभाव होता रहा है. संविधान इसी भेदभाव को खत्म करने के लिए लाया गया था. अगर पढ़ा-लिखा वर्ग भी आज जातिवाद की सोच के साथ कानूनों को देखेगा, तो इससे समाज में और भ्रम फैलेगा. कानून का मकसद किसी को डराना नहीं, बल्कि न्याय देना है.

कानून और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन की बात करते हुए संजय निषाद ने कहा कि जैसे महिलाओं की सुरक्षा के लिए कानून बनाए गए, वैसे ही सामाजिक भेदभाव को रोकने के लिए भी कानून जरूरी हैं. अगर कोई यह कहता है कि ऐसे कानून गलत हैं, तो इसका मतलब यह होगा कि वह कहीं न कहीं भेदभाव को बनाए रखना चाहता है. उन्होंने स्पष्ट कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से UGC से जुड़े नए कानून का समर्थन करते हैं.

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इस्तीफा निजी मामला है 

बीजेपी के कुछ नेताओं द्वारा इस्तीफा देने से जुड़े सवाल पर संजय निषाद ने इसे उनका निजी मामला बताया. उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का इस्तीफा देना या न देना उसकी व्यक्तिगत सोच और परिस्थितियों पर निर्भर करता है. इसका UGC कानून या सरकार की मंशा से सीधा संबंध नहीं जोड़ा जाना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि UGC जैसे मुद्दों को राजनीतिक रंग देना ठीक नहीं है. यह विषय शिक्षा, समानता और सामाजिक सम्मान से जुड़ा है. सरकार का उद्देश्य सभी वर्गों को सम्मान, सुरक्षा और समृद्धि देना है. कानून इसी दिशा में एक कदम होता है.

कानून का डर न हो, तो व्यवस्था कमजोर हो जाती

संजय निषाद ने जोर देते हुए कहा कि देश कानून से चलता है. कानून ही समाज में डर भी पैदा करता है और सम्मान भी दिलाता है. अगर कानून का डर न हो, तो व्यवस्था कमजोर हो जाती है. उन्होंने सवालिया अंदाज में कहा कि अगर संविधान की जरूरत नहीं थी, तो फिर देश को आजादी के बाद संविधान बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? अंग्रेजों और मुगलों के दौर से अलग एक न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाने के लिए ही संविधान और कानून बने. उन्होंने कहा कि आज देश में चुने हुए जनप्रतिनिधि कानून बनाते हैं और उनका पालन सुनिश्चित किया जाता है. यही लोकतंत्र की असली ताकत है. UGC से जुड़ा कानून भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसे संदेह की नजर से देखने के बजाय सकारात्मक सोच के साथ लागू होने देना चाहिए.

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