कानपुर का किडनी कांड: बिना स्टाफ के ऑपरेशन, सर्जनों की स्पेशल टीम और अब तक 60 ट्रांसप्लांट

कानपुर के किडनी कांड में कई बड़े खुलासे हुए हैं. बताया जा रहा है कानपुर में अब तक 60 से ज्यादा ऑपरेशन सामने आए हैं. बिना रिकॉर्ड और बिना स्टाफ के सर्जरी करने का चौंकाने वाला तरीका सामने आया. फर्जी डॉक्टर और टेलीग्राम नेटवर्क के जरिए डील होती थी. 80 लाख खर्च करने वाली मरीज की हालत गंभीर है. पुलिस ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया है और पूरे नेटवर्क की जांच की जा रही है. 

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कानपुर किडनी कांड में गिरफ्तारी डॉक्टर दंपति और उनके सहयोगी (Photo: ITG) कानपुर किडनी कांड में गिरफ्तारी डॉक्टर दंपति और उनके सहयोगी (Photo: ITG)

सिमर चावला

  • कानपुर ,
  • 01 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:43 AM IST

कानपुर के किडनी कांड की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है वैसे-वैसे बड़े खुलासे होते जा रहे हैं. कानपुर में अब तक 60 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट हो चुके हैं, इतना ही नहीं जांच एजेंसियों को जो जानकारी मिली, उसने सबको चौंका दिया. बताया जा रहा है कि इन ट्रांसप्लांट को अंजाम देने का तरीका बेहद सुनियोजित और किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसा था.

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ऑपरेशन वाले दिन अस्पताल का सामान्य स्टाफ हटा दिया जाता था. इसके बाद एक विशेष सर्जिकल टीम आती थी, जो सिर्फ उसी दिन के लिए बुलायी जाती थी. ऑपरेशन तेजी से किया जाता और फिर मरीजों को तुरंत अलग-अलग स्थानों पर शिफ्ट कर दिया जाता था, ताकि कोई लिंक न बन पाए. सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इन मरीजों का कोई स्थायी मेडिकल रिकॉर्ड नहीं रखा जाता था. न ही ऑपरेशन की आधिकारिक एंट्री होती थी और न ही बाद की फॉलोअप प्रक्रिया को दर्ज किया जाता था. यानी पूरा सिस्टम इस तरह बनाया गया था कि अगर कभी जांच हो भी, तो सबूत जुटाना बेहद मुश्किल हो.

पुलिस के मुताबिक इस रैकेट की भनक उन्हें पिछले साल ही लग गई थी. कुछ संदिग्ध गतिविधियों और शिकायतों के आधार पर निगरानी शुरू की गई, लेकिन नेटवर्क इतना व्यवस्थित और गोपनीय था कि इसकी मुख्य कड़ी तक पहुंचना आसान नहीं था. कई महीनों तक खामोशी से सूचनाएं जुटाई गईं, तब जाकर इस पूरे खेल की पहली बड़ी कड़ी सामने आई. कार्रवाई की शुरुआत उस वक्त हुई जब शहर के ‘आरोही हॉस्पिटल’ पर छापा पड़ा और उसे सील कर दिया गया. यह कदम जैसे ही उठाया गया, जांच का दायरा तेजी से बढ़ा और कई दूसरी कड़ियां जुड़ने लगीं. इसके बाद जांच ‘आहूजा हॉस्पिटल’ तक पहुंची, जहां से कई अहम सुराग हाथ लगे. यहीं से यह साफ होने लगा कि मामला छोटे स्तर का नहीं, बल्कि एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा है.

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50-60 ऑपरेशन का अनुमान, विदेशी कनेक्शन भी

जांच में अब तक यह अनुमान लगाया जा रहा है कि सिर्फ कानपुर में ही 50 से 60 के बीच अवैध सर्जरी की गई होंगी. वहीं एक विदेशी महिला का ट्रांसप्लांट भी सामने आया है, जिसने इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन की ओर इशारा किया है. आहूजा हॉस्पिटल में ही 7-8 ट्रांसप्लांट होने की बात सामने आई है. हालांकि जांच एजेंसियां मान रही हैं कि यह आंकड़ा और बढ़ सकता है, क्योंकि कई मामलों की जानकारी अभी सामने आनी बाकी है. इस पूरे रैकेट में सबसे चौंकाने वाला किरदार एक ऐसे व्यक्ति का है, जिसकी शैक्षिक योग्यता महज आठवीं पास है. शिवम अग्रवाल उर्फ काना नाम का यह शख्स पहले एम्बुलेंस चालक था, लेकिन धीरे-धीरे उसने खुद को डॉक्टर के रूप में पेश करना शुरू कर दिया. गले में स्टेथोस्कोप डालकर वह मरीजों और उनके परिजनों का भरोसा जीतता था. जरूरतमंद लोगों को वह ऐसे समझाता कि उन्हें लगे कि उनके सामने कोई विशेषज्ञ बैठा है. इसके बाद वह उन्हें इस अवैध ट्रांसप्लांट नेटवर्क तक पहुंचाता था. उसकी गिरफ्तारी के बाद ही इस पूरे गिरोह की परतें खुलनी शुरू हुईं. पुलिस को उससे कई ऐसे सुराग मिले, जिनके आधार पर आगे की कार्रवाई संभव हो पाई.

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डिजिटल प्लेटफॉर्म पर होता था सौदा

जांच में यह भी सामने आया कि यह रैकेट सिर्फ फिजिकल नेटवर्क तक सीमित नहीं था, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी भरपूर इस्तेमाल करता था. मेरठ के एक डॉक्टर अफजाल का नाम सामने आया है, जो इस नेटवर्क के डिजिटल ऑपरेशन को संभालता था. उसने टेलीग्राम पर एक ग्रुप बना रखा था, जहां डोनर और रिसीवर के बीच सीधा संपर्क कराया जाता था. यहीं पर सौदे तय होते थे कितने पैसे मिलेंगे, कब ऑपरेशन होगा और पूरी प्रक्रिया कैसे पूरी की जाएगी. इसी प्लेटफॉर्म के जरिए मेरठ की पारुल तोमर को रिसीवर के रूप में जोड़ा गया, जिनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी थीं. वहीं बिहार के समस्तीपुर निवासी आयुष चौधरी, जो MBA का छात्र बताया जा रहा है, डोनर के रूप में सामने आया. यह पूरा लेन-देन इतनी सावधानी से किया जाता था कि बाहरी लोगों को इसकी भनक तक नहीं लगती थी.

80 लाख खर्च, फिर भी जिंदगी खतरे में

इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू उन मरीजों की हालत है, जो इस रैकेट के जाल में फंस गए. पारुल तोमर का मामला इसकी एक बड़ी मिसाल बनकर सामने आया है. करीब 80 लाख रुपये खर्च कर उन्होंने किडनी ट्रांसप्लांट कराया, लेकिन अब वही ऑपरेशन उनकी जिंदगी के लिए खतरा बन गया है. संक्रमण के चलते उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई और आखिरकार उन्हें लखनऊ रेफर करना पड़ा. डॉक्टरों के मुताबिक, ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को संक्रमण से बचाना सबसे बड़ी चुनौती होती है. इसके लिए विशेष आइसोलेशन यूनिट में रखा जाता है, जहां बाहरी लोगों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहता है. लेकिन जिस अस्पताल में पारुल का इलाज हुआ, वहां इस तरह की बुनियादी सावधानियां भी नहीं बरती गईं.

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लापरवाही ने बढ़ाया खतरा

जानकारी के अनुसार, अस्पताल में लोगों की आवाजाही जारी रही, जिससे संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ गया. यही वजह है कि पारुल की स्थिति तेजी से बिगड़ने लगी. उनका हीमोग्लोबिन गिरकर 6.3 तक पहुंच गया और यूरिन आउटपुट भी कम हो गया जो किसी भी ट्रांसप्लांट मरीज के लिए गंभीर संकेत माने जाते हैं. डॉक्टरों ने समय रहते उन्हें बेहतर इलाज के लिए SGPGI भेजने का फैसला लिया. फिलहाल वहां उनकी हालत नाजुक बनी हुई है और विशेषज्ञों की निगरानी में इलाज चल रहा है. डोनर आयुष चौधरी की हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि अगर समय पर सही इलाज नहीं मिला, तो उनकी स्थिति भी खराब हो सकती है.

कानपुर मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने साफ किया है कि उनके यहां किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा उपलब्ध नहीं है, क्योंकि इसके लिए जरूरी अनुमति नहीं मिली है. साथ ही, संबंधित दवाइयों की भी कमी है. यह बयान इस बात को और मजबूत करता है कि शहर में अधिकृत केंद्रों की कमी का फायदा ऐसे रैकेट उठा रहे हैं. पुलिस अब तक इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिनमें अस्पताल संचालक, डॉक्टर और अन्य सहयोगी शामिल हैं. लेकिन जांच एजेंसियों का मानना है कि यह सिर्फ शुरुआत है. नेटवर्क का असली आकार अभी सामने आना बाकी है.

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