उमस भरी गर्मी, सड़क किनारे रस्सी से बंधी तिरपाल और खाने के लिए लंगर की कतार में धक्के खाते परिवार...ये नजारा है उत्तर प्रदेश (UP) के नोएडा सेक्टर-135 का. यहां बाढ़ पीड़ित पिछले 5 दिन से खुले आसमान के नीचे गुजर-बसर कर रहे हैं. उनके पास रहने-खाने का अपना कोई ठिकाना नहीं बचा है.
बड़ी-बड़ी गाड़ियों से लोग खाना लेकर यहां आते हैं और लोगों की कतारें लगना शुरू हो जाती हैं. ज्यादा खाना इकट्ठा करने के लिए पूरा परिवार लाइन में लग जाता है, क्योंकि यहां किसी को नहीं पता कि अगली शाम उनके लिए कोई खाना लेकर आएगा या नहीं.
दरअसल, नोएडा सेक्टर-135 से 4-5 किलोमीटर दूर यमुना नदी बहती है. हरियाणा के हथिनीकुंड बैराज से जब यमुना नदी में पानी छोड़ा गया तो दिल्ली के कुछ हिस्सों के साथ-साथ नोएडा सेक्टर 135 (वजीदपुर) का काफी इलाका भी जलमग्न हो गया.
इस इलाके में ज्यादातर फार्म हाउस बने हुए हैं. हर फार्म हाउस में मजदूर लोग सपरिवार काम करते औ वहीं रहते हैं. बाढ़ ने जब इस इलाके को डुबो दिया तो यहां रह रहे लोगों को रातोरात सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा. aajtak.in ने बाढ़ का कहर झेलने वाले ऐसे ही कुछ लोगों से बातचीत कर उनका दर्द जाना.
सोचा था कुत्तों को लेने फिर लौटूंगा, लेकिन...
बाढ़ पीड़ित खुशीराम बताते हैं 'फार्म हाउस के काम से हमें रोजाना जल्दी उठना पड़ता है, इसलिए मैं-मेरी पत्नी, 4 लड़के और लड़की-दामाद खाना खाने के बाद रात 9 बजे सो गए. देर रात दरवाजे के पास पानी बहने की आवाज आई. उठकर देखा तो धीरे-धीरे घर में बाढ़ का पानी भर रहा था. मैंने तुरंत हल्ला किया और सभी को नींद से जगा दिया.'
खुशीराम के शब्दों में, 'मैंने तुरंत घर से एक किलोमीटर दूर रहने वाले रिश्तेदार को फोन किया. उन्होंने बताया कि उनके घर में भी पानी घुस गया है और वो सबकुछ छोड़कर ऊंचे स्थान की तरफ भाग रहे हैं. मैं बुरी तरह डर गया. घरवालों से सबकुछ छोड़कर तुरंत भागने के लिए कहा. चारों तरफ घुटनों तक पानी भर चुका था. बच्चों को सिर पर बैठाकर हम वहां से भागे. मेरे चार बेटे अपने साथ खाट भी ले आए.'
उन्होंने कहा,'पानी इतनी तेजी से बढ़ा कि कुछ सोचने-समझने का वक्त ही नहीं मिला. परिवार सहित भागने की जल्दबाजी में हमारे 3 कुत्ते फार्म हाउस पर ही छूट गए. सोचा था, परिवार को सुरक्षित जगह पर छोड़कर फिर लौटूंगा, लेकिन किनारे आने के बाद पानी इतना ज्यादा बढ़ गया कि पुलिस ने लौटने ही नहीं दिया. कुछ दिन पहले ही लड़की की शादी हुई है. दहेज का पूरा सामान अभी फार्म हाउस में ही रखा था. बाढ़ में वो भी खराब हो गया.'
सरकार की तरफ से कोई मदद मिली? जवाब में खुशीराम कहते हैं, 'अब तक तो कोई मदद नहीं मिली. आम लोग या संस्थाएं जो लंगर लगाते हैं, उसमें खाना खा रहे हैं. खुले में शौच जाना पड़ रहा है. उन्होंने दावा किया कि सेक्टर 135 में बाढ़ प्रभावितों की संख्या हजारों में है.
देवदूत बनकर आया ट्रैक्टर चालक, परिवार को बचाया
खुशीराम के परिवार से आधा किलोमीटर दूर सड़क किनारे कुछ टेंट लगे हैं. इसमें जितेंद्र कुमार (40) का परिवार है. 20 से 25 लोग हैं. जितेंद्र ने बताया,'सभी सो रहे थे. सुबह 6 बजे नींद खुली. घर में घुटने तक पानी भरा हुआ था. बामुश्किल बाइक स्टार्ट हुई. बीवी बच्चों को ऊंची जगह पर छोड़कर वापस लौटने ही वाला था कि पानी काफी ज्यादा बढ़ गया. घर के बाकी सदस्य फार्म हाउस पर ही फंसे हुए थे. तभी एक ट्रैक्टर चालक देवदूत बनकर आ गया. उसके हाथ-पैर जोड़कर उसे साथ फार्म हाउस ले गया और परिवार को ट्राली में बैठाकर यहां ले आया.
जितेंद्र कुमार ने आगे बताया, 'हम फार्म हाउस में काम करते हैं, यहां सड़क किनारे तिरपाल के नीचे दिन काटने पड़ रहे हैं. भंडारे में खाना खाते हैं. बिजली की कोई व्यवस्था नहीं है. पिछले दो दिन में पानी तो कम हुआ है, लेकिन पुलिस अब भी वापस जाने नहीं दे रही. सिर्फ डेयरी वाले जाते हैं और अपनी गायें लेकर आ जाते हैं. कुछ जिंदा मिल रही हैं तो कुछ मर भी चुकी हैं. 9 साल से रह रहे हैं, लेकिन इतनी बाढ़ कभी नहीं देखी. प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए जितेंद्र कुमार ने कहा कि बाढ़ आने से पहले उन्हें एक भी बार अलर्ट नहीं किया गया.'
सांप-बिच्छू का खतरा, फिर भी सड़क किनारे रहने की मजबूरी
बाढ़ पीड़ितों की भीड़भाड़ से दूर सड़क किनारे खाली जगह पर मुन्ना कुमार (50) का परिवार भी रह रहा है. वह यूपी के गाजीपुर से यहां आकर फार्म हाउस की रखवाली करते हैं. मुन्ना ने बताया कि उनका घर सड़क से लगा हुआ है, इसलिए बाढ़ का पानी उनके घर तक सबसे बाद में पहुंचा. जहां बाकी लोगों के घर में देर रात ही पानी आ गया था तो वहीं मुन्ना के फार्म हाउस में अगले दिन शाम 5 बजे तक पानी पहुंचा. उन्हें बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि यमुना का पानी यहां तक पहुंच सकता है.
बिजली की सप्लाई के लिए वह जिस जनरेटर का इस्तेमाल करते थे, वह भी डूब गया है. जब उनसे पूछा गया कि कई बाढ़ पीड़ित सामुदायिक भवन में हैं फिर वह सड़क के किनारे क्यों रह रहे हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा,' सामुदायिक भवन में बहुत ज्यादा भीड़ है. वहां बीमारी फैलने का खतरा और ज्यादा है.'
अपनी परेशानी जाहिर करते हुए मु्न्ना कुमार ने बताया कि सड़क किनारे रहने के कई जोखिम हैं. दिन-रात सांप निकलते रहते हैं. हमने किसी तरह खाट की व्यवस्था की है. क्योंकि अगर नीचे सोएंगे तो यहां सांप-बिच्छू घूमते रहते हैं, काट लेंगे.
घर में पानी घुसा तो बच्चों को कंधे पर बैठाकर भागे
बाढ़ पीड़ितों के लिए चलाए जा रहे भंडारे के ठीक सामने सड़क किनारे 62 साल की शांति देवी भी अपने परिवार के साथ मौजूद हैं. वह फार्म हाउस में काम करती हैं. उन्होंने बताया कि आस-पड़ोस के लोग लगातार यमुना के पानी की मॉनीटरिंग कर रहे थे. हम सब यही सोच रहे थे कि घर छोड़ने की नौबत तो नहीं आएगी, लेकिन रात एक बजे अचानक पानी फार्म हाउस में घुसने लगा. थोड़ी देर में कमर के ऊपर तक पानी आ गया.
हमने बच्चों को सिर पर बैठाया और भागने लगे. हमारे बहुत से जानवर डूब गए. शांति देवी ने पुलिस कर्मियों पर फार्म हाउस में ना जाने देने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि पानी तो कम हो गया है. अगर पुलिस-प्रशासन जाने दे तो प्रेशर से सफाई कर अपना डूबा हुआ सामान समेट लेंगे.
अक्षय श्रीवास्तव