एक पेन ड्राइव में कैद 679 तस्वीरें... और उन तस्वीरों के पीछे 33 मासूम जिंदगियां. बांदा से सामने आया यह मामला इंसानियत को झकझोर देने वाली कहानी है. यहां भरोसे, लालच और डिजिटल दुनिया के अंधेरे ने मिलकर ऐसा जाल बुना, जिसमें मासूमियत को बाजार बना दिया गया. सालों तक छिपा यह नेटवर्क जब खुला, तो हर परत के साथ एक नया खौफ सामने आया.
इस पूरे मामले की शुरुआत एक अंतरराष्ट्रीय इनपुट से हुई. जांच एजेंसियों को सूचना मिली कि भारत से कोई शख्स बच्चों से जुड़े आपत्तिजनक वीडियो और तस्वीरें इंटरनेट पर अपलोड कर रहा है. यह मामला इतना गंभीर था कि इसमें इंटरपोल के जरिए जानकारी साझा की गई.
जांच जब आगे बढ़ी तो एक पेन ड्राइव बरामद हुई- और यहीं से खुला वो राज जिसने सबको सन्न कर दिया. इस पेन ड्राइव में 679 आपत्तिजनक तस्वीरें और वीडियो मौजूद थे. हर तस्वीर एक कहानी थी... दर्द, डर और जबरन छीनी गई मासूमियत की कहानी.
भरोसे के पीछे छिपा दरिंदा
जांच में सामने आया कि इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में एक सरकारी कर्मचारी- पूर्व जूनियर इंजीनियर रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती थे. समाज में सम्मानित दिखने वाला यह व्यक्ति अंदर से एक संगठित अपराध का हिस्सा था.
रामभवन चित्रकूट में किराए के कमरे में रहता था और वहीं से इस घिनौने काम को अंजाम देता था. उसकी पत्नी इस अपराध में बराबर की भागीदार थी. दोनों ने मिलकर बच्चों को अपने जाल में फंसाया- कभी लालच देकर, कभी धमकाकर.
कैसे फंसाए जाते थे मासूम?
जांच में सामने आया कि आरोपी बच्चों को बहलाने के लिए कई तरीके अपनाते थे. पैसे और गिफ्ट का लालच, मोबाइल और वीडियो गेम्स का आकर्षण और भरोसा जीतकर धीरे-धीरे शोषण करने लगता था. कई पीड़ित ऐसे थे जिनकी उम्र महज 3 से 10 साल के बीच थी. बच्चों को समझ भी नहीं था कि उनके साथ क्या हो रहा है.
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डरावना यह था कि इन बच्चों के साथ किए गए अपराधों को रिकॉर्ड किया जाता था. फिर इन्हें इंटरनेट यानी डार्क वेब के जरिए विदेशों में भेजा जाता था, जहां से आरोपी मोटी कमाई करते थे.
'ऑनलाइन मंडी'... डिजिटल दुनिया का काला चेहरा
यह मामला सिर्फ यौन शोषण तक सीमित नहीं था. यह एक संगठित डिजिटल नेटवर्क था. जांच में पता चला कि 2010 से 2020 के बीच यह गिरोह लगातार सक्रिय रहा. दो लाख से ज्यादा आपत्तिजनक फाइलें (वीडियो और फोटो) अलग-अलग देशों में भेजी गईं. करीब 47 देशों तक इस सामग्री का नेटवर्क फैला हुआ था. यानी, एक छोटे शहर से शुरू हुआ यह अपराध वैश्विक स्तर तक पहुंच चुका था.
पीड़ितों की हालत: सिर्फ शरीर नहीं, जिंदगी भी टूटी
इस केस का सबसे दर्दनाक पहलू पीड़ित बच्चों की हालत रही. मेडिकल रिपोर्ट्स में सामने आया कि कई बच्चों के शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचा. कुछ बच्चों के अंगों की संरचना तक बदल गई. कई बच्चों को लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ा. लेकिन शारीरिक नुकसान से भी ज्यादा गहरा घाव था मानसिक. डर, अवसाद और लोगों पर भरोसा खत्म होना... कई बच्चे आज भी उस ट्रॉमा से बाहर नहीं आ पाए हैं.
CBI जांच: सबूतों ने खोल दी पूरी साजिश
इस मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई. CBI ने डिजिटल फॉरेंसिक, मेडिकल रिपोर्ट्स और गवाहों के आधार पर मजबूत केस तैयार किया. 74 गवाहों के बयान, डिजिटल डिवाइस से मिले सबूत और अंतरराष्ट्रीय लिंक की पुष्टि... इन सबूतों ने साफ कर दिया कि यह कोई एक-दो घटनाओं का मामला नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अपराध था.
कोर्ट का फैसला- रेयरेस्ट ऑफ रेयर'
लंबी सुनवाई के बाद POCSO कोर्ट ने इस मामले को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' कैटेगरी में रखा. कोर्ट ने कहा कि यह अपराध अत्यंत जघन्य है. इसमें बच्चों का शोषण किया गया. आरोपी ने भरोसे का दुरुपयोग किया. इसी आधार पर अदालत ने रामभवन और उसकी पत्नी को मौत की सजा सुनाई. साथ ही करीब 12 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया. कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी पीड़ित बच्चों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए.
कभी चॉकलेट तो कभी गिफ्ट का देता था लालच
वह व्यक्ति बच्चों को छोटे-छोटे लालच देता- कभी चॉकलेट, कभी मोबाइल गेम, कभी गिफ्ट. धीरे-धीरे बच्चों को अपने जाल में फंसाता और फिर उन्हें ऐसी जगह ले जाता, जहां से उनकी जिंदगी हमेशा के लिए बदल जाती. यह सब अचानक नहीं हुआ. यह एक सुनियोजित, लंबे समय तक चलने वाला नेटवर्क था. सवाल है कि क्या हमारे बच्चे सच में सुरक्षित हैं? क्या डिजिटल दुनिया हमारे बच्चों के लिए खतरा बनती जा रही है? और सबसे अहम- क्या हम अपने आसपास हो रही चीजों को सच में समझ पा रहे हैं?
लोगों का कहना है कि आज डिजिटल दुनिया जितनी सुविधाजनक है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है. बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर जरूरी है. अजनबियों से संपर्क खतरनाक हो सकता है. छोटे लालच बड़े अपराध में बदल सकते हैं. 679 तस्वीरें सिर्फ डेटा नहीं थीं... वे 33 जिंदगियों की चीख थीं.
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