दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में पिछले हफ्ते एक अजीब स्थिति देखने को मिली. यहां लोग खाने-पीने का सामान नहीं, बल्कि कूड़ा फेंकने वाले प्लास्टिक बैग खरीदने के लिए दुकानों पर टूट पड़े. हालात ऐसे हो गए कि रोजाना करीब 27 लाख 'पे-एज-यू-थ्रो' कचरा बैग बिकने लगे, जो सामान्य बिक्री से लगभग पांच गुना ज्यादा है.
दरअसल, सियोल में नियम है कि घरेलू कचरा फेंकने के लिए खास सरकारी बैग का ही इस्तेमाल करना होता है. ये बैग नाफ्था से बनते हैं, जो पेट्रोलियम से तैयार होता है. इसी बीच, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और होर्मुज के लगभग बंद होने की वजह से तेल सप्लाई पर दबाव आ गया. इससे लोगों को डर लगने लगा कि कहीं ये जरूरी बैग ही बाजार से गायब न हो जाएं.
दक्षिण कोरिया की न्यूज मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इसी कड़ी में एक वीडियो भी तेजी से वायरल हो रहा है. सियोल के यांगचोन-गु इलाके के एक अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स की सीसीटीवी फुटेज में एक महिला कचरा डिस्पोजल एरिया में घुसती दिखाई देती है. वह किसी और का भरा हुआ आधिकारिक कूड़ा बैग उठाती है, उसे खोलकर कचरा जमीन पर फेंक देती है.
ईरान जंग का पड़ रहा है असर
दक्षिण कोरिया अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल आयात करता है, जिसमें बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. ऐसे में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ते ही निवेशकों ने भी बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया. कोस्पी इंडेक्स में एक ही दिन में 12 फीसदी से ज्यादा की गिरावट दर्ज हुई, जो अब तक की सबसे बड़ी गिरावट मानी जा रही है. वहीं, कोरियाई करेंसी वॉन भी कमजोर होकर 17 साल के निचले स्तर तक पहुंच गई.
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सरकार ने उठाया कदम
स्थिति को संभालने के लिए सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. सरकार और विपक्ष ने मिलकर करीब 26.2 ट्रिलियन वॉन का अतिरिक्त बजट पास करने पर सहमति जताई है. इसका मकसद सप्लाई चेन को स्थिर करना और छोटे कारोबारियों, डिलीवरी वर्कर्स और युवाओं को सहारा देना है.
हालांकि, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इतना बड़ा खर्च महंगाई को और बढ़ा सकता है. उनका मानना है कि असली समस्या कीमतों से ज्यादा सप्लाई की है, खासकर उन उद्योगों में जो ऊर्जा पर निर्भर हैं, जैसे प्लास्टिक और निर्माण सामग्री.
सरकार ने लोगों को भरोसा दिलाने की कोशिश की है कि कूड़े के बैग की कमी नहीं होगी. पर्यावरण मंत्री ने कहा है कि अगर जरूरत पड़ी तो सामान्य प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी.
फिलहाल, सियोल में हालात यह दिखा रहे हैं कि तेल संकट का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजों तक पहुंच चुका है.
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