लंदन में करीब 1 करोड़ रुपये सालाना कमाने वाली भारतीय मूल की श्वेता देसाई ने जब ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में नई जिंदगी शुरू करने के लिए अपनी हाई-प्रोफाइल नौकरी छोड़ी, तो उन्हें अंदाजा नहीं था कि आगे का सफर इतना मुश्किल होगा. नई जगह पर पसंद की नौकरी नहीं मिलने के बाद उन्होंने एयरबीएनबी अपार्टमेंट्स की सफाई और मैनेजमेंट का काम शुरू किया. शुरुआत में यह बदलाव उनके लिए काफी मुश्किल जैसा था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने समझा कि कोई भी काम छोटा नहीं होता. आज श्वेता बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने के साथ महिलाओं के लिए सपोर्ट कम्युनिटी और अपना कोचिंग प्रोग्राम भी चला रही हैं. श्वेता का कहना है कि आर्थिक स्वतंत्रता ही असली आजादी देती है.
मुंबई से लंदन तक का सफर
श्वेता मुंबई में पैदा हुईं और पली-बढ़ीं. साल 2008 में वह पढ़ाई के लिए लंदन चली गई थीं. धीरे-धीरे उन्होंने वहां अपना करियर बनाया और एक बड़ी कंपनी में प्रोडक्ट हेड के पद तक पहुंच गईं. उनकी सालाना कमाई करीब 1 करोड़ रुपये थी. उनके पास अच्छी लाइफस्टाइल, महंगे कपड़े, डिजाइनर बैग और आर्थिक आजादी थी. वह अपने जीवन से खुश थीं.
साल 2023 में उनके पति को मेलबर्न में नौकरी मिल गई. परिवार के साथ रहने के लिए श्वेता ने लंदन की अपनी शानदार नौकरी छोड़ दी और ऑस्ट्रेलिया चली गईं. उन्हें लगा था कि वहां भी आसानी से अच्छी नौकरी मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. मेलबर्न का जॉब मार्केट लंदन से बहुत अलग था और उन्हें अपनी पसंद की नौकरी नहीं मिल पाई.
अपार्टमेंट्स की सफाई का काम शुरू किया
काफी समय तक कोशिश करने के बाद भी जब कुछ नहीं मिला, तो उन्होंने एयरबीएनबी अपार्टमेंट्स की सफाई और मैनेजमेंट का काम शुरू कर दिया. इस काम में घर साफ करना, चादरें बदलना, कपड़े धोना और मेहमानों के सवालों के जवाब देना शामिल था. शुरुआत में श्वेता को यह काम करते हुए बहुत अजीब महसूस हुआ. उन्हें लगता था कि उन्होंने अपनी पहचान खो दी है. जो महिला कभी बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर काम करती थी, अब वह अपार्टमेंट साफ कर रही थी. उन्हें अंदर से बहुत दुख होता था.
‘आप क्या करती हैं?’ सवाल से टूट जाती थीं श्वेता
उन्होंने बताया कि जब लोग उनसे पूछते थे कि आप क्या करती हैं, तो उनके पास कोई साफ जवाब नहीं होता था. कभी वह खुद को हाउसवाइफ कहतीं, कभी कहतीं कि अभी कुछ नया सीख रही हैं. लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें लगता था कि वह अपनी असली जिंदगी नहीं जी रही हैं. श्वेता ने कहा कि इस बदलाव ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ दिया था. उन्हें ऐसा लगता था जैसे उनकी पुरानी आइडेंटिटी खत्म हो गई हो. पहले लोग उन्हें उनके बड़े पद और अच्छी सैलरी से पहचानते थे, लेकिन अब सब बदल चुका था.
‘कोई भी काम छोटा नहीं होता’
धीरे-धीरे श्वेता ने समझा कि इंसान की पहचान सिर्फ नौकरी या पैसे से नहीं होती. उन्होंने महसूस किया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता. अपार्टमेंट साफ करने का काम भी सम्मानजनक है क्योंकि इससे लोगों को सुविधा मिलती है. इस काम ने उन्हें खुद से दोबारा जुड़ने में मदद की. अब श्वेता सिर्फ सफाई का काम ही नहीं करतीं, बल्कि बच्चों को अंग्रेजी भी पढ़ाती हैं. इसके अलावा वह अपना खुद का बिजनेस और कोचिंग प्रोग्राम भी शुरू कर रही हैं. सोशल मीडिया पर उनके वीडियो काफी वायरल हो रहे हैं और कई महिलाएं उनसे प्रेरणा ले रही हैं.
महिलाओं के लिए बनाई खास कम्युनिटी
श्वेता ने द रीबिल्ड रूम नाम से एक व्हाट्सएप कम्युनिटी भी शुरू की है. यह उन महिलाओं के लिए है जो जीवन में बड़े बदलावों से गुजर रही हैं, जैसे नौकरी छूटना, दूसरे शहर या देश में जाना या अपनी पहचान को लेकर संघर्ष करना. इस समूह में महिलाएं एक-दूसरे का साथ देती हैं और अपने अनुभव साझा करती हैं.
‘पैसा ही आजादी है’
श्वेता का कहना है कि बेरोजगारी और संघर्ष के इस समय ने उन्हें जिंदगी की सबसे बड़ी सीख दी. उन्होंने समझा कि पैसा बहुत जरूरी है क्योंकि इससे इंसान को अपनी पसंद की जिंदगी जीने की आजादी मिलती है. उनके अनुसार पैसा सिर्फ खर्च करने की चीज नहीं है, बल्कि यह आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास भी देता है. उन्होंने यह भी माना कि पहले वह अपनी नौकरी के पद और सैलरी को ही अपनी असली पहचान मानती थीं. लेकिन अब उन्हें एहसास हुआ कि इंसान की कीमत उसके पद से नहीं, बल्कि उसके व्यक्तित्व और मेहनत से होती है. आज श्वेता अपने जीवन से पहले से ज्यादा जुड़ी हुई महसूस करती हैं. उन्होंने संघर्ष के समय हार नहीं मानी और हर काम को सम्मान के साथ अपनाया.
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