साहिल चौधरी नाम के प्रोफेशनल ने लिखा कि जर्मनी की सख्त 40 घंटे वाली वर्क वीक ने उनके काम करने का तरीका पूरी तरह बदल दिया. उनके मुताबिक भारत में काम के दौरान लगातार कॉल, फॉलो-अप और बार-बार होने वाली मीटिंग्स में काफी समय निकल जाता था. वहीं जर्मनी में मीटिंग्स पहले से तय एजेंडा के साथ होती हैं और ज्यादातर फैसले एक ही चर्चा में हो जाते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय ऑफिसों में काम के बीच कई तरह की बाधाएं होती हैं, जैसे अचानक आने वाले फोन, गॉसिप, रील्स और चाय ब्रेक. जबकि जर्मनी में लोग अपने कैलेंडर में ‘फोकस टाइम’ या ‘DND’ ब्लॉक कर देते हैं और दूसरे लोग उसका सम्मान करते हैं.
साहिल ने आगे लिखा कि भारत में अक्सर देर रात तक काम करना सामान्य माना जाता है, क्योंकि हमेशा कोई न कोई उपलब्ध रहता है. वहीं जर्मनी में कर्मचारियों से ऑफिस समय के बाद काम करने की उम्मीद कम की जाती है, जिससे टीमों को अपने काम को बेहतर तरीके से प्राथमिकता देनी पड़ती है.
देखें पोस्ट
उन्होंने पोस्ट में लिखा कि मुझे एहसास हुआ कि भारत में मैं ज्यादा काम नहीं कर रहा था, बल्कि अव्यवस्था में काम कर रहा था. उनका कहना था कि जर्मनी की 40 घंटे वाली सीमा ने ऐसे काम करने की आदतों के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी.
यह पोस्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और कई यूजर्स ने इस पर सहमति जताई. एक यूजर ने लिखा कि लंबे समय तक काम करना अब लोगों के लिए सम्मान की बात बन गया है, जबकि कई बार यह सिर्फ खराब सिस्टम और लगातार होने वाली बाधाओं का संकेत होता है.
दूसरे यूजर ने लिखा कि असली फर्क घंटों का नहीं, बल्कि उन घंटों के इस्तेमाल का होता है. अगर काम के दौरान फोकस और स्पष्टता हो तो कम समय में भी ज्यादा काम हो सकता है.
कई लोगों ने यह भी कहा कि भारत में देर रात तक काम करना अब सामान्य बना दिया गया है, जबकि इसका आउटपुट हमेशा बेहतर नहीं होता.
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