क्या है "Reverse Parenting" जिसका चीन में बढ़ रहा है ट्रेंड? माता -पिता भी इस तरह कर रहे व्यवहार 

बदलते दौर के साथ माता-पिता अपने बच्चों को जिम्मेदार बनाने के लिए रिवर्स पेरेंटिंग का सहारा ले रहे हैं. चीन में कई युवा माता-पिता इस नए अप्रोच के साथ प्रयोग कर रहे हैं. 

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बदलते दौर के साथ माता-पिता अपने बच्चों को जिम्मेदार बनाने के लिए रिवर्स पेरेंटिंग का सहारा ले रहे हैं. (Photo : Pexels) बदलते दौर के साथ माता-पिता अपने बच्चों को जिम्मेदार बनाने के लिए रिवर्स पेरेंटिंग का सहारा ले रहे हैं. (Photo : Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 20 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 2:34 PM IST

आजकल चीन के कई घरों में माता-पिता अपने बच्चों के पालन-पोषण का नया तरीका अपना रहे हैं, जिसे रिवर्स पेरेंटिंग के नाम से जाना जाता है. चीन के युवा पीढ़ी के माता-पिता के बीच यह तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. आदेश देने या लंबे-चौड़े मैसेज के बजाय वे खुद बच्चों की भूमिका में उतर रहे हैं.  

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार रिवर्स पेरेंटिंग का यह नया तरीका चीन में युवा पीढ़ी के माता-पिता के बीच लोकप्रिय हो रहा है. 

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क्या है "Reverse Parenting"?

रिवर्स पेरेंटिंग का विचार बहुत सिंपल है, इसमें माता-पिता अपने बच्चों के व्यवहार की नकल करते हैं ताकि अधिक समान बातचीत को बढ़ावा दिया जा सके. इसकी शुरुआत नवंबर 2022 में पूर्वोत्तर चीन के हेलोंगजियांग प्रांत की एक मां से जुड़ी वायरल हुए घटना के बाद सामने आया. 

कड़ाके की ठंड में महिला की तीन साल की बेटी ने सिर्फ लाइट वेट की प्रिंसेस वाली ड्रेस पहनकर बाहर जाने की जिद की. बच्ची ने आत्मविश्वास से कहा कि कार्टून की राजकुमारियां ठंड में रहती हैं. इसके बाद उसकी मां ने उसे कोट पहनाने के बजाय, उसे बाहर जाने दिया और शांति से उसके पीछे-पीछे चली गई. 

लोग कर रहे हैं तारीफ

पेरेंटिंग के इस तरीके को लेकर कई सोशल मीडिया यूजर्स तारीफ कर रहे हैं. उनका मानना ​​था कि बार-बार समझाने की तुलना में बच्चे को उस चीज का अनुभव देना काफी हद तक प्रभावी हो सकता है. इस घटना के बाद, युवा चीनी माता-पिता के बीच "रिवर्स पेरेंटिंग" का चलन तेजी से बढ़ा,जो तब से तीन अलग-अलग रूपों में विकसित हो चुका है. 

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पहली भूमिका में बदलाव होना. इसमें माता-पिता खुद को बच्चों के सामने कमजोर या जरूरतमंद दिखाते हैं, मानों उन्हें देखभाल की जरूरत हो. इसका उद्देश्य बच्चों में जिम्मेदारी की भावना पैदा करना और उनके व्यवहारिक और भावनात्मक विकास में सुधार करना है. 

दूसरा तरीका “परिणाम अनुभव” कहलाता है. इसमें बच्चों को उनके अपने फैसलों का नतीजा खुद समझने दिया जाता है. यानी अगर वे कोई गलत या अस्वस्थ आदत अपनाते हैं, तो उन्हें उसके परिणाम का अनुभव करने दिया जाता है, ताकि वे खुद समझें और उस आदत को छोड़ने के लिए प्रेरित हों. 

उदाहरण के लिए समझे...

मध्य चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर से भी ऐसा ही एक मामला सामने आया, जब एक आठ साल के लड़के ने गेमिंग में करियर बनाने के लिए स्कूल छोड़ने की जिद की, तो उसके माता-पिता ने तुरंत मना नहीं किया. उन्होंने उसके फैसले को स्वीकार कर लिया, लेकिन सख्त योजना बनाई, जिसमें लड़के को दिन में 16 घंटे गेम खेलना था. शुरू में तो वह बहुत उत्साहित था, लेकिन महज तीन दिनों में ही उसने चार बार हार मान ली. इस अनुभव ने उसे यह एहसास दिलाया कि गेमिंग उतना आसान या मजेदार नहीं था जितना उसने सोचा था. 

वहीं, अगर तीसरे तरीके की बात करें, तो इसे मिरर रिएक्शन के नाम से जानते हैं. इसमें माता-पिता अपने बच्चों की भावनाओं या कामों की नकल करते हैं ताकि उन्हें आत्मनिरीक्षण करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके. उदाहरण के लिए, वे अपने बच्चे के गुस्से या नखरों की नकल करते हैं. झांग यू नाम की एक महिला ने बीजिंग इवनिंग पोस्ट को बताया कि जब उनकी तीन साल की बेटी को आइसक्रीम देने से मना कर दिया गया, तो वह गुस्से में जमीन पर लेट गई. उसे डांटने के बजाय मैं भी उसके साथ ही फ्लोर पर लेट गई और रोने लगी. उन्होंने बताया कि हैरानी की बात यह है कि यह तरीका कारगर साबित हुआ और उनकी बेटी जल्द ही रोना बंद कर दिया और आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगी. 

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