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लॉकडाउन ने बदला नैनीताल की झील का हाल, 3 गुना पारदर्शी हुआ पानी

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नैनीताल, देश का चर्चित हिल स्टेशन है जहां सीजन में पर्यटकों की भरमार रहती है. यहां की नैनी झील का पानी काफी प्रदूषित था लेकिन लॉकडाउन की वजह से पानी इतना साफ हो गया है कि काफी गहरे तक फिश मूवमेंट दिखाई देने लगी है. कभी इस झील की सफाई बनाए रखने के लिए सूर्यास्त के बाद यहां कोई रुकता नहीं था.

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आजादी के बाद से इतने वर्षों में नैनीताल ने बहुत कुछ खोया. निर्मल व स्वच्छ झील इतनी मैली हुई कि इसके पानी में कुछ ही अंदर तक दिखाई देता था. कोरोना वायरस की वजह से लगे लॉकडाउन में यदि सबसे ज्यादा फायदा हुआ है तो वह है नैनीताल की जीवनदायिनी नैनी झील. नैनी झील का पानी इस समय बहुत स्वच्छ और साफ हो चुका है.

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यह सब संभव हो पाया है लॉकडाउन से, क्योंकि इस दौरान पर्यटक गतिविधियां झील में थमने से पानी साफ हो गया है. हानिकारक बैक्टीरिया भी लगभग खत्म हैं. झील का पानी फिजिकल, केमिकल व बैक्टीरियल समेत तमाम पैरामीटर पर खरा उतरा है. झील का मटमैलापन भी बेहद कम हुआ है. लॉकडाउन की वजह से ही पानी की गुणवत्ता सुधरी है.

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प्रसिद्ध पर्यावरणविद् डॉ. अजय रावत कहते हैं कि जब से लॉकडाउन प्रारंभ हुआ है इसका सबसे सकारात्मक प्रभाव नैनीताल की जैव विविधता, नैनीताल के सौंदर्य और विशेष रूप से नैनी झील पर पड़ा है. पानी की क्वालिटी में बहुत सुधार आया है. पानी में जो पारदर्शिता है, वह बढ़ गई है.


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पर्यावरणविद् रावत ने पानी के पारदर्शी होने के जानकारी देते हुए कहा कि अभी तक फिश मूवमेंट गहराई में केवल 7 फीट तक दिखाई देता था अब वह 25 फीट तक भी दिखने लगा है. यदि इस समय कोई फोटो खींचना चाहे तो सरोवर के ऊपर जो आकाश, बादलों की या वृक्षों की छाया है, वह बड़ी स्पष्ट और साफ ढंग से दिखाई देती है.

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कुमाऊं विश्वविद्यालय में जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन के विभागाध्यक्ष गिरीश रंजन तिवारी बताते हैं कि लॉकडाउन होने के बाद से नैनी झील में बहुत सुधार आया है. 2018 में जलस्तर इन दिनों काफी नीचे चला गया था और उस साल पानी की बहुत ज्यादा किल्लत हो गई थी. इन दिनों नैनीताल की झील बहुत साफ है, प्रदूषण रहित है, जलस्तर उसका बड़ा हुआ है और यह देखने में भी बहुत ज्यादा खूबसूरत लग रही है.

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बता दें कि सरोवर नगरी नैनीताल विश्व भर में अपने नैसर्गिक सौंदर्य के लिए पहचानी जाती है. किसी जमाने में नैनी झील को इतना पवित्र माना जाता था कि सूर्यास्त के बाद कोई भी व्यक्ति यहां रुक नहीं सकता था, जिसके लिए यहां कठोर नियम बनाए थे.

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अंग्रेजों ने भी सरोवर नगरी के संरक्षण को काफी प्रयास किए. तब यह माना जाता था कि अगर रात में कोई व्यक्ति झील के आसपास रहा तो इससे झील की पवित्रता कम हो सकती है, जिसके चलते लोग दिन के वक्त ही नैनी झील के पास स्थित मां नैना देवी मंदिर में दर्शन को आते थे.

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