पैंगोंग झील का असली जादू देखना है, जानें लेह से वहां जाने का सबसे स्मार्ट तरीका

लद्दाख ट्रिप का असली आकर्षण पैंगोंग त्सो का बदलते रंगों वाला नीला पानी है, लेकिन इसका बेहतरीन नजारा देखने के लिए सही टाइमिंग बेहद जरूरी है. सही प्लानिंग, सेहत और सुरक्षा का ध्यान रखकर पैंगोंग झील का अनुभव यादगार बनाया जा सकता है.

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लेह से पैंगोंग का यादगार सफर (Photo: Pexels) लेह से पैंगोंग का यादगार सफर (Photo: Pexels)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 20 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 9:59 AM IST

लद्दाख की यात्रा का असली रोमांच पैंगोंग झील के उस नीले पानी को देखने में है, जो हर बदलते घंटे के साथ अपना रंग बदलता है. लेकिन इस जादुई नजारे को अपनी आंखों में कैद करना इतना भी आसान नहीं है. अक्सर लोग लेह तो पहुंच जाते हैं, लेकिन खराब प्लानिंग की वजह से या तो वो रास्ते के जाम में फंस जाते हैं या फिर झील तक पहुंचते-पहुंचते इतनी देर हो जाती है कि वहां का असली सुंदरता ही गायब हो जाता है.

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अगर आप भी चाहते हैं कि आपकी लद्दाख ट्रिप एकदम परफेक्ट हो, तो बस आपको अपनी घड़ी की सुइयों पर नजर रखनी होगी. तो चलिए जानते हैं कि लेह से निकलने का वो कौन सा सही समय है जो आपकी इस यात्रा को यादगार बना देगा और रास्ते में आपको किन बातों का ख्याल रखना है.

पैंगोंग झील लेह शहर से करीब 225 किलोमीटर दूर है. सुनने में यह दूरी कम लग सकती है, लेकिन पहाड़ों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों और ऊंचाइयों की वजह से यहां पहुंचने में कम से कम 5 से 6 घंटे का समय लग जाता है. अगर आप झील के पानी पर सूरज की पहली किरणों की चमक देखना चाहते हैं, तो आपको लेह से सुबह 3 या 4 बजे के बीच हर हाल में निकलना होगा. सुबह जल्दी निकलने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आप चंग ला दर्रे पर होने वाले ट्रैफिक से बच जाते हैं और दोपहर तक आराम से झील के किनारे पहुंच जाते हैं.

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जल्दी निकलने का एक और मजा यह है कि रास्ते में आपको थिकसे और शे जैसे खूबसूरत मठ देखने का मौका मिलता है. जब आप सुबह-सुबह इन शांत रास्तों से गुजरते हैं, तो पहाड़ों की ताजी हवा आपकी सारी थकान मिटा देती है. अगर आप फोटोग्राफी के शौकीन हैं, तो सुबह की रोशनी में झील का जो नीला रंग निकलकर आता है, वह किसी फोटो फिल्टर से कहीं ज्यादा खूबसूरत होता है. कोशिश करें कि पैंगोंग में एक रात रुकने का प्लान बनाएं, ताकि आप वहां के तारों भरे आसमान का भी मजा ले सकें. लेकिन अगर आप उसी दिन वापस आना चाहते हैं, तो शाम को 7-8 बजे तक लेह लौटने का लक्ष्य रखें.

सफर के दौरान सुरक्षा और सेहत का स्मार्ट प्लान

लद्दाख का सफर जितना खूबसूरत है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है. यहां का रास्ता कच्चा और पथरीला है, इसलिए हमेशा एक मजबूत गाड़ी ही किराए पर लें. छोटी गाड़ी लेकर चंग ला दर्रे को पार करना काफी मुश्किल हो सकता है, जहां ऑक्सीजन की कमी और बर्फबारी का डर रहता है. इसके अलावा, एक बात गांठ बांध लें कि शाम ढलने से पहले लेह वापस लौट आएं. रात के समय लद्दाख के सुनसान रास्तों पर गाड़ी चलाना बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि वहां न तो मोबाइल नेटवर्क काम करता है और न ही दूर-दूर तक कोई मदद मिलती है.

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सबसे जरूरी बात आपकी सेहत से जुड़ी है. लेह पहुंचते ही सीधे पैंगोंग के लिए मत दौड़ें. लद्दाख की ऊंचाई पर शरीर को ढलने में समय लगता है, जिसे 'एक्लिमैटाइजेशन' कहते हैं. कम से कम 2 दिन लेह में आराम करें, खूब पानी पिएं और जब आपका शरीर वहां के माहौल के हिसाब से सेट हो जाए, तभी झील की यात्रा शुरू करें. अगर आप बिना आराम किए सीधे पैंगोंग जाएंगे, तो सिरदर्द और सांस फूलने जैसी समस्या आपका पूरा ट्रिप खराब कर सकती है. तो बस, इन छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखें और निकल पड़ें लद्दाख के इस शानदार सफर पर.
 

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