पहाड़ों की ताजी हवा हो या समंदर की लहरें, हर किसी के लिए वेकेशन का मतलब मौज-मस्ती और काम से ब्रेक होता है. लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि परिवार के पुरुष जब होटल की बालकनी में बैठकर चाय का लुत्फ ले रहे होते हैं, तब घर की महिलाएं अक्सर अगले वक्त के खाने-पीने की प्लानिंग या बच्चों के बिखरे हुए कपड़ों को समेटने में जुटी होती हैं. क्या वाकई भारतीय परिवारों में महिलाओं को छुट्टियों पर भी छुट्टी मिलती है, या बस उनके काम करने का पता बदल जाता है? तो चलिए जानते हैं, भारतीय महिलाओं के वेकेशन से जुड़ी वो कड़वी हकीकत जिसे हम अक्सर देखकर भी अनसुना कर देते हैं.
वेकेशन का वो चेहरा जो तस्वीरों में नहीं दिखता
दिल्ली की रहने वाली 46 वर्षीय पूनम शर्मा की कहानी इस कड़वी हकीकत का जीता-जागता आईना है. केरल की आठ दिनों की पारिवारिक यात्रा से लौटने के बाद पूनम तरोताजा महसूस करने के बजाय बुरी तरह पस्त थीं. विडंबना देखिए कि वेकेशन से घर कदम रखते ही उनके स्वागत में मैले कपड़ों का अंबार लगा था और अस्त-व्यस्त रसोई को फिर से व्यवस्थित करने की भारी चुनौती सामने थी. सच तो यह है कि छुट्टियों के दौरान भी पूनम की भूमिका में रत्ती भर बदलाव नहीं आया था. वे वहां भी बच्चों के खान-पान का इंतजाम करने, पति के कपड़े सहेजने और सबकी दवाओं से लेकर छोटी-मोटी जरूरतों का ध्यान रखने में ही उलझी रहीं. यह उस मानसिक बोझ की पराकाष्ठा है, जहां महिलाएं शारीरिक रूप से तो सफर पर निकल जाती हैं, लेकिन मानसिक रूप से कभी घर की जिम्मेदारियों के बंधन से आजाद नहीं हो पातीं.
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जब छुट्टियां आराम का मतलब नहीं होतीं
आमतौर पर यात्रा की बुकिंग और पैसों का जिम्मा पुरुष संभाल लेते हैं, लेकिन मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि घर और परिवार को संभालने का पूरा बोझ महिलाओं पर ही रहता है. मुंबई की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एब्सी सैम बताती हैं कि छुट्टियों में अक्सर बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल की अतिरिक्त जिम्मेदारी महिलाओं के हिस्से आती है. कई बार ऐसी स्थितियां भी बनती हैं जहां पुरुष पार्टी नाइट्स के लिए बाहर चले जाते हैं और महिलाएं 'बच्चों के लिए माहौल सही नहीं है' जैसे तर्कों के चलते होटल के कमरों में रहने को मजबूर होती हैं. हद तो तब होती है जब बजट बचाने के लिए साथ ले जाए गए कुकिंग उपकरणों की वजह से वेकेशन पर भी उन्हें चूल्हा-चौका करना पड़ता है.
सांस्कृतिक रूढ़ियां और स्वार्थी होने का डर
भारतीय समाज में बचपन से ही महिलाओं को दूसरों की जरूरतों को खुद से ऊपर रखना सिखाया जाता है. देखभाल को यहां श्रम नहीं, बल्कि एक पवित्र कर्तव्य माना जाता है. पुणे की कलाकार रिदम सिंह याद करती हैं कि कैसे उनके पिता के खाने-पीने के नखरों की वजह से उनकी मां की छुट्टियां हमेशा एक कठिन परीक्षा बन जाती थीं. यदि कोई महिला इन अनकही अपेक्षाओं को मानने से इनकार कर दे, तो समाज उसे तुरंत स्वार्थी करार दे देता है. इसी अपराधबोध के कारण महिलाएं अपनी बेचैनी दबाकर खुशमिजाजी का मुखौटा पहन लेती हैं ताकि परिवार का पैसा वसूल वेकेशन खराब न हो.
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जिम्मेदारियों के बोझ से मुक्त होना ही सच्ची छुट्टी
विशेषज्ञों के अनुसार, सच्चा सुकून तभी मिल सकता है जब हम छुट्टियों को केवल भौगोलिक बदलाव नहीं, बल्कि पुरानी भूमिकाओं से ब्रेक के रूप में देखें. असली वेकेशन वह है जहां किसी कठोर दिनचर्या का दबाव न हो और किसी की जिम्मेदारी उठाए बिना खुद के साथ समय बिताने की आजादी हो. हालांकि, आज की पीढ़ी में बदलाव की आहट जरूर सुनाई दे रही है. कई पुरुष अब यात्रा के दौरान जिम्मेदारियों में बराबर के भागीदार बन रहे हैं और यह समझने लगे हैं कि छुट्टी का असली मतलब तभी है, जब घर की महिलाएं भी सच में आराम कर सकें. जब तक जिम्मेदारियों का यह असमान बंटवारा खत्म नहीं होता, तब तक महिलाओं के लिए छुट्टियां सिर्फ जगह बदलने का नाम ही बनी रहेंगी.
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