ड्रोन के बाद अब कॉकरोच! जर्मनी की नई टेक्नोलॉजी से जासूसी का तरीका बदल सकता है

वॉर में इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भरपूर यूज हो रहा है. ड्रोन पुराना हो गया अब जासूसी और जंग के दौरान रोबॉटिक कॉकरोच को उतारा जा सकता है. जर्मनी की एक कंपनी ने तैयार किया है अनोखा रोबोटिक कॉकरोच जो जासूसी के साथ जंग में भी उतारा जा सकता है.

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SWARM Cockroach SWARM Cockroach

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 13 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 12:38 PM IST

टेक्नोलॉजी की दुनिया में कई बार ऐसी चीजें सामने आती हैं जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसी लगती हैं. लेकिन जर्मनी में एक ऐसी तकनीक विकसित की जा रही है जो सचमुच फिल्मों की कहानी जैसी है.

यहां वैज्ञानिक कॉकरोच को रोबोट में बदलने की कोशिश कर रहे हैं ताकि उन्हें जासूसी और सैन्य मिशनों में इस्तेमाल किया जा सके. इन्हें कॉकरोच साइबॉर्ग भी कहा जा रहा है. 

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जर्मनी की स्टार्टअप कंपनी SWARM Biotactics ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें असली कॉकरोच के ऊपर छोटे-छोटे इलेक्ट्रॉनिक बैकपैक लगाए जाते हैं.

इन बैकपैक में सेंसर, कैमरा और कम्युनिकेशन सिस्टम होते हैं, जिनकी मदद से यह कीड़े दुश्मन के इलाके में जाकर जानकारी जुटा सकते हैं. 

यह टेक खासतौर पर उन जगहों के लिए बनाई जा रही है जहां इंसान, ड्रोन या पारंपरिक रोबोट पहुंच नहीं पाते. जैसे ढही हुई इमारतें, संकरी सुरंगें या युद्ध क्षेत्र. इन जगहों पर ये छोटे-छोटे जैविक रोबोट आसानी से घुसकर जानकारी इकट्ठा कर सकते हैं.

कैसे काम करता है ‘रोबोटिक कॉकरोच’?

इन कॉकरोच के ऊपर जो माइक्रो बैकपैक लगाया जाता है उसमें कई तरह के उपकरण लगे होते हैं. इनमें सेंसर, कैमरा और कम्युनिकेशन मॉड्यूल शामिल होते हैं. यह सिस्टम रियल-टाइम डेटा भेज सकता है और आसपास के माहौल की जानकारी भी जुटा सकता है.

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इतना ही नहीं, वैज्ञानिक इन कीड़ों की मूवमेंट को भी नियंत्रित कर सकते हैं. इसके लिए हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजे जाते हैं, जिनकी मदद से ऑपरेटर दूर बैठकर भी कॉकरोच की दिशा नियंत्रित कर सकते हैं.

कुछ मामलों में ये कीड़े AI की मदद से समूह यानी (SWARM) में भी काम कर सकते हैं, जिससे बड़े इलाके की निगरानी करना आसान हो जाता है.

आखिर कॉकरोच ही क्यों चुने गए?

वैज्ञानिकों के मुताबिक कॉकरोच प्रकृति के सबसे मजबूत और टिकाऊ जीवों में से एक हैं. ये बेहद संकरी जगहों में भी घुस सकते हैं और कठिन परिस्थितियों में भी जिंदा रह सकते हैं. यही वजह है कि इन्हें ऐसे मिशनों के लिए आइडियल माना जा रहा है.

इसके अलावा ये हल्के उपकरण भी अपने शरीर पर लेकर चल सकते हैं. अभी इन पर करीब 10 से 15 ग्राम तक का माइक्रो बैकपैक लगाया जा सकता है, जिससे कैमरा और सेंसर जैसे उपकरण लगाए जा सकते हैं.

जंग ही नहीं, रेस्क्यू मिशन में भी इस्तेमाल

यह तकनीक सिर्फ सैन्य जासूसी के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य कामों में भी इस्तेमाल हो सकती है. उदाहरण के लिए भूकंप या किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ढही हुई इमारतों में फंसे लोगों को खोजने के लिए भी इन रोबोटिक तिलचट्टों को भेजा जा सकता है.

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इनकी मदद से ऐसे इलाकों में भी सेंसर पहुंचाए जा सकते हैं जहां इंसानों के लिए जाना बेहद खतरनाक होता है. दुनिया भर में अब युद्ध की रणनीति तेजी से बदल रही है. ड्रोन, AI और रोबोट पहले ही युद्ध का हिस्सा बन चुके हैं. ऐसे में जैविक रोबोट यानी Bio-Robotics अगला बड़ा कदम माना जा रहा है.

 

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