कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) के खिलाफ 27 गेंदों में 54 रनों की नाबाद पारी… स्कोरकार्ड पर यह सिर्फ एक आंकड़ा है, लेकिन लखनऊ सुपर जायंट्स (LSG) के मुकुल चौधरी के लिए यह एक सपना पूरा होने जैसा पल था. एक ऐसा सपना, जो उनके जन्म से पहले ही उनके पिता की आंखों में बस चुका था... और जबआईपीएल में कोलकाता के खिलाफ आखिरी ओवरों में चौधरी का बल्ला गरजा, तो यह सिर्फ एक मैच जीतने की कहानी नहीं रही, बल्कि संघर्ष, भरोसे और मौके को पहचानने की मिसाल बन गई.
ईडन में मुकाबला बेहद रोमांचक था. केकेआर ने एलएसजी के सामने चुनौतीपूर्ण लक्ष्य रखा था और एक समय ऐसा लग रहा था कि मैच लखनऊ के हाथ से फिसल जाएगा. विकेट गिरते जा रहे थे, दबाव बढ़ता जा रहा था, लेकिन इसी मोड़ पर 21 साल के मुकुल चौधरी क्रीज पर टिके रहे. उन्होंने ना सिर्फ हालात को समझा, बल्कि उसे अपने हिसाब से मोड़ दिया. 27 गेंदों में 54 रन की पारी में उन्होंने 7 छक्के और 2 चौके लगाए- हर शॉट में आत्मविश्वास झलक रहा था.
इस पारी की सबसे खास बात सिर्फ रन नहीं थे, बल्कि उनका टाइमिंग और सिचुएशन अवेयरनेस था. 8वें विकेट के लिए आवेश खान के साथ 54 रनों की अटूट साझेदारी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. दिलचस्प यह रहा कि इस साझेदारी में आवेश का योगदान सिर्फ एक रन का था, जबकि बाकी सारा काम चौधरी ने अपने दम पर किया. यह वही फेज था, जहां मैच पूरी तरह पलट गया और एलएसजी ने तीन विकेट से जीत दर्ज कर ली.
मैच के बाद जब चौधरी ‘प्लेयर ऑफ द मैच’ अवॉर्ड लेने पहुंचे, तो उनकी बातें उतनी ही सादगी भरी थीं, जितनी उनकी बल्लेबाजी आक्रामक. उन्होंने कहा, 'मेरा सफर तो मेरे जन्म से पहले ही शुरू हो गया था. मेरे पिता का सपना था कि उनका बेटा क्रिकेट खेले. उस समय हमारी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि मैं जल्दी शुरुआत कर सकूं, इसलिए मैंने 12-13 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू किया.'
यह बयान अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है. जहां आज के दौर में बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही क्रिकेट अकादमियों में दाखिल हो जाते हैं, वहीं चौधरी ने देर से शुरुआत की. लेकिन शायद यही देरी उनके अंदर एक अलग भूख लेकर आई. उन्होंने अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि उनके घर के पास एसबीसी क्रिकेट अकादमी नाम की एक नई अकादमी खुली थी, जहां उन्होंने पांच-छह साल तक ट्रेनिंग ली. इसके बाद बेहतर मौके और प्रतिस्पर्धा के लिए उन्होंने जयपुर का रुख किया, जहां पिछले चार साल से वह लगातार मेहनत कर रहे हैं.
उनके करियर का टर्निंग पॉइंट भी काफी दिलचस्प रहा. चौधरी ने बताया, 'मैं उत्तर प्रदेश के खिलाफ अंडर-19 का मैच खेल रहा था. वह मेरा सिर्फ दूसरा मैच था और एक लो-स्कोरिंग मुकाबला था, जिसमें मैंने कुछ अहम रन बनाए. तभी मेरे पिता को लगा कि मैं आगे जाकर बड़ा क्रिकेटर बन सकता हूं.' यह वही पल था, जहां एक पिता का भरोसा और बेटे की मेहनत एक दिशा में चल पड़े.
दबाव को लेकर चौधरी का नजरिया भी काफी अलग और परिपक्व है. उन्होंने साफ कहा, “दबाव तो हमेशा रहता है, लेकिन मैं इसे एक अवसर के तौर पर देखता हूं. मुझे लगता है कि भगवान ने मुझे यह मौका दिया है, इसलिए मैं अपनी क्षमता पर भरोसा करता हूं. यह वो मंच है, जहां आप कुछ बड़ा कर सकते हैं या अपना नाम बना सकते हैं. इसलिए मैं दबाव की बजाय मौके पर फोकस करता हूं.'
यही सोच उनकी बल्लेबाजी में भी साफ दिखी, जब मैच आखिरी ओवरों में पहुंचा, तो हर गेंद पर समीकरण बदल रहा था, लेकिन चौधरी का इरादा साफ था. आखिरी गेंद तक टिके रहना. उन्होंने कहा, 'मेरा प्लान बस यही था कि अंत तक नाबाद रहूं, क्योंकि मुझे यकीन है कि अगर मैं अंत तक खेलता हूं, तो टीम को जीत दिला सकता हूं.'
उनकी पारी में लगे सात छक्कों ने दर्शकों को रोमांचित कर दिया, लेकिन खुद चौधरी के लिए सबसे खास उनका पहला छक्का था. उन्होंने कहा, 'मैं पिछले दो मैचों से छक्का नहीं लगा पा रहा था, इसलिए आज जो पहला छक्का लगा, वह मेरे लिए सबसे खास था. हेलिकॉप्टर शॉट भी अच्छा था, लेकिन पहला छक्का दिल के ज्यादा करीब रहेगा. मैंने सोचा था कि भले ही गेंदबाज चार परफेक्ट गेंदें डाल दे, लेकिन एक गेंद जरूर ऐसी होगी, जिस पर मैं मैच का छक्का मार सकता हूं.'
मुकुल चौधरी की यह पारी सिर्फ एक मैच जिताने वाली पारी नहीं थी, बल्कि यह उस सोच की जीत थी, जो दबाव में टूटती नहीं, बल्कि मौके को पहचानकर खुद को साबित करती है. यह कहानी है एक ऐसे खिलाड़ी की, जिसने देर से शुरुआत की, लेकिन सपनों को बड़ा रखा… और जब मौका मिला, तो उसे दोनों हाथों से पकड़ लिया.
यहां देखिए--- मुकुल चौधरी का जलवा
आखिरी ओवर… 7 रन, 2 गेंद… और सामने खड़े थे मुकुल चौधरी. जो आगे हुआ, वह सिर्फ क्रिकेट नहीं, बल्कि एक फिल्मी क्लाइमेक्स जैसा था, जहां हर फ्रेम में सस्पेंस, हर शॉट में रोमांच और अंत में एक नायक.
ओवर - 19.5
वैभव अरोड़ा की गेंद, यॉर्कर की कोशिश… लेकिन बस एक इंच की चूक. और यही चूक मैच की दिशा बदल गई. मुकुल ने बिना देर किए पूरा दम लगाकर बल्ला घुमाया... गेंद सीधा डीप कवर के ऊपर से छक्के के लिए उड़ गई. यह सिर्फ एक छक्का नहीं था, यह दबाव को चीरता हुआ शॉट था. कमेंट्री बॉक्स तक से आवाज आई, 'ये लड़का आखिर बना किस चीज़ का है!' सच में, उस एक शॉट ने केकेआर के खेमे में सन्नाटा भर दिया.
अब समीकरण- 1 गेंद, 1 रन
सुपर ओवर की आहट साफ थी. फील्ड सेट हो चुकी थी, हर खिलाड़ी अलर्ट... लेकिन क्रिकेट को शायद कुछ और ही मंजूर था.
ओवर 19.6
फिर अरोड़ा, इस बार शॉर्ट बॉल ऑफ स्टंप के बाहर. मुकुल ने पहली बार गलत टाइमिंग की- बल्ला घूमा, लेकिन गेंद से कोई संपर्क नहीं. विकेटकीपर के पास गेंद गई और उसी पल .....
आवेश खान... बिना हेलमेट, लेकिन रफ्तार पूरी दौड़ पड़े. यह सिर्फ एक रन नहीं था, यह जीत की दौड़ थी. विकेटकीपर ने थ्रो करने की कोशिश की, लेकिन हल्की सी चूक… और वही एक पल मैच का फैसला बन गया.
रघुवंशी ने थ्रो लेने में एक सेकंड ज्यादा लिया… और वही एक सेकंड केकेआर से मैच छीन ले गया. गेंद स्टंप्स पर नहीं लगी, आवेश क्रीज में पहुंच गए और लखनऊ सुपर जायंट्स ने मैच 'स्क्रैप' कर लिया.
उधर, मुकुल चौधरी क्रीज पर गिर पड़े. जैसे शरीर ने सारी ताकत उसी आखिरी पल में झोंक दी हो. उन्होंने आसमान की तरफ देखा- शायद शुक्रिया कहा और अगले ही पल साथी खिलाड़ी उन्हें घेर लेते हैं. यह सिर्फ जीत का जश्न नहीं था, यह एक सपने के सच होने का जश्न था.
केकेआर के खिलाड़ी कुछ समझ ही नहीं पाए... क्या हुआ, कैसे हुआ. एक पल पहले जीत उनकी मुट्ठी में थी, और अगले ही पल सब फिसल गया. उन्हें जवाब कहीं और नहीं, बस उस नंबर 15 की जर्सी पहनने वाले खिलाड़ी में ढूंढना था....
मुकुल चौधरी... यह वही खिलाड़ी था, जिसने आखिरी दो गेंदों में मैच का चेहरा बदल दिया. पहले एक ‘लूव्र म्यूजियम’ में टांग देने लायक छक्का… और फिर बिना बल्ला लगाए भी जीत दिला देने वाला रन.
आईपीएल में ऐसे पल ही खिलाड़ियों को ‘स्टार’ बनाते हैं... और इस रात, मुकुल चौधरी ने सिर्फ मैच नहीं जीता, उन्होंने यह भी बता दिया कि यह तो बस शुरुआत है. आगे शायद और भी कई टीमें होंगी, जिन्हें वह इसी तरह आखिरी पलों में तोड़ देंगे.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क