मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में गुरुवार की रात जब टी20 वर्ल्ड कप 2026 का सेमीफाइनल अपने चरम पर था, तब ऐसा लग रहा था कि भारत के हाथ से मैच फिसल सकता है. 253 जैसा विशाल स्कोर बनाने के बावजूद टीम इंडिया पूरी तरह सुरक्षित नहीं थी. इंग्लैंड के 22 साल के बल्लेबाज जैकब बेथेल ने ऐसी आक्रामक पारी खेली कि आखिरी ओवरों में मुकाबला सांसें रोक देने वाला बन गया.
इसी निर्णायक क्षण में गेंद जसप्रीत बुमराह के हाथ में आई और उन्होंने एक बार फिर साबित कर दिया कि क्यों उन्हें इस दौर का सबसे खास तेज गेंदबाज माना जाता है. डेथ ओवरों में बुमराह ने कमाल का नियंत्रण दिखाते हुए अपने अंतिम दो ओवरों में सिर्फ 14 रन दिए. जब बाकी गेंदबाजों की गेंदें चौके-छक्कों में तब्दील हो रही थीं, तब बुमराह ने अपनी विविधता, सटीक लाइन-लेंथ और तेज दिमाग से इंग्लैंड की रफ्तार रोक दी.
भारत ने मुकाबला 7 रन से जीत लिया और फाइनल में अपनी जगह पक्की कर ली. मैच के बाद प्लेयर ऑफ द मैच बने संजू सैमसन ने बुमराह की तारीफ करते हुए कहा, 'जसप्रीत बुमराह एक पीढ़ी में एक बार मिलने वाली प्रतिभा हैं. इसका पूरा श्रेय उन्हें जाता है.'
लेकिन हर बार जब बुमराह किसी बड़े मैच में भारत को संकट से निकालते हैं, तब एक सवाल मन में उठता है- आखिर इस असाधारण गेंदबाज को सबसे पहले किसने पहचाना?
इस कहानी के केंद्र में हैं अहमदाबाद के एक बुजुर्ग कोच- किशोर त्रिवेदी.
अहमदाबाद का वह छोटा मैदान
अहमदाबाद में एसपीआईपीए कॉर्पोरेट रोड के पास एक साधारण सा क्रिकेट मैदान है. कोई बड़ी अकादमी नहीं, न ही चमक-दमक वाली सुविधाएं. इसी मैदान पर 79 साल किशोर त्रिवेदी आज भी अपनी रॉयल क्रिकेट अकादमी चलाते हैं.
तेज गेंदबाजों को तराशने में माहिर त्रिवेदी ने अपने करियर में कई खिलाड़ियों को प्रशिक्षित किया. उनके बेटे सिद्धार्थ त्रिवेदी राजस्थान रॉयल्स (RR) के लिए आईपीएल खेल चुके हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी खोज हैं- जसप्रीत बुमराह.
त्रिवेदी की बुमराह से पहली मुलाकात तब हुई जब वह 16 साल के थे और अहमदाबाद के निर्मल हाई स्कूल में पढ़ते थे. दुबले-पतले इस लड़के की गेंदबाजी तेज जरूर थी, लेकिन उसका एक्शन पारंपरिक नहीं था. गेंद फेंकने का अंदाज ऐसा था जिसे देखकर कई लोग उसे सुधारने की सलाह देते.
लेकिन त्रिवेदी ने उस एक्शन में कमी नहीं, बल्कि संभावना देखी.
उन्होंने नेट्स में कुछ दिन तक बुमराह को गौर से देखा. जल्द ही उन्हें समझ में आ गया कि उनके हाथ की ‘हाइपरएक्सटेंशन’ गेंद को सामान्य गेंदबाजों की तुलना में अलग कोण से रिलीज करने में मदद करती है. इससे बल्लेबाजों के लिए गेंद को पढ़ना मुश्किल हो जाता था.
शरारती लड़के को बनाया अनुशासित खिलाड़ी
हालांकि उस समय बुमराह पूरी तरह क्रिकेट पर केंद्रित नहीं थे. कभी अभ्यास में आते, तो कई दिन गायब भी हो जाते. दोस्तों के साथ समय बिताना उन्हें ज्यादा पसंद था.
किशोर त्रिवेदी ने उन्हें सख्त अनुशासन में ढालने का फैसला किया. उन्होंने बुमराह की मां दलजीत से कहा कि कुछ सालों तक बेटे की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दें, ताकि वह उसे गंभीर खिलाड़ी बना सकें.
इसके बाद बुमराह की दिनचर्या बदल गई. अगर वह अभ्यास से गायब रहते, तो अगले दिन उन्हें पूरे समय नेट्स के पीछे खड़ा रहना पड़ता. धीरे-धीरे उन्होंने समझ लिया कि बड़े खिलाड़ी बनने के लिए नियमित मेहनत जरूरी है.
… लेकिन त्रिवेदी सिर्फ सख्त कोच नहीं थे. वह बुमराह के सबसे बड़े समर्थक भी बने. जब दूसरे खिलाड़ी उनके अजीब एक्शन का मजाक उड़ाते और उन्हें 'चकर' कहते, तब त्रिवेदी ने साफ कहा कि इस एक्शन में कोई खामी नहीं है और इसे बदलने की जरूरत नहीं.
यही फैसला बाद में बुमराह की सबसे बड़ी ताकत बन गया.
सिर्फ रफ्तार नहीं, दिमाग भी
त्रिवेदी ने जल्दी ही समझ लिया था कि बुमराह की सफलता सिर्फ गति पर निर्भर नहीं रह सकती. उन्होंने उन्हें गेंदबाजी के बारीक पहलू सिखाए- यॉर्कर, बाउंसर, कटर और अलग-अलग गति से गेंद फेंकने की कला.
सबसे अहम बात उन्होंने यह सिखाई कि गेंदबाज को बल्लेबाज के दिमाग को पढ़ना चाहिए.
वानखेड़े में इंग्लैंड के खिलाफ सेमीफाइनल में यह कला साफ दिखाई दी. बुमराह ने इंग्लैंड के कप्तान हैरी ब्रूक को अपनी पहली ही गेंद पर आउट कर दिया. उन्होंने तेज गेंद की जगह कटर डाली, जिससे ब्रूक शॉट खेलने में जल्दी कर बैठे और गेंद हवा में चली गई. अक्षर पटेल ने शानदार कैच लपककर भारत को शुरुआती सफलता दिला दी.
इसके बाद जैकब बेथेल क्रीज पर आए और शुरुआत में बुमराह को छक्का भी जड़ा. लेकिन बुमराह ने तुरंत रणनीति बदली. उन्होंने गति कम की, कटर और अलग-अलग लेंथ की गेंदों से बल्लेबाज को उलझा दिया.
बेथेल ने अपनी पारी में 48 गेंदों पर 105 रन बनाए, लेकिन बुमराह की 13 गेंदों पर वह सिर्फ 17 रन ही बना सके. यह अंतर बताता है कि बुमराह ने मैच के निर्णायक क्षणों में कितना नियंत्रण दिखाया.
छोटी अकादमी से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज
त्रिवेदी के मार्गदर्शन में बुमराह ने गुजरात के लिए सैयद मुश्ताक अली ट्रॉफी खेली. उसी दौरान मुंबई इंडियंस (MI) के स्काउट और पूर्व भारतीय कोच जॉन राइट की नजर उन पर पड़ी. इसके बाद आईपीएल का रास्ता खुला और जल्द ही बुमराह भारतीय टीम तक पहुंच गए.
आज वह दुनिया के सबसे खतरनाक तेज गेंदबाजों में गिने जाते हैं. इंग्लैंड के कप्तान हैरी ब्रूक ने भी मैच के बाद कहा कि बुमराह इस समय शायद दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज हैं.
कोच की छोटी-सी इच्छा
रॉयल क्रिकेट अकादमी के एक बैनर पर लिखा है- 'जसप्रीत बुमराह- इस नाम को किसी परिचय की जरूरत नहीं.' किशोर त्रिवेदी आज भी रोज मैदान पर आते हैं और युवा गेंदबाजों को प्रशिक्षण देते हैं. बुमराह की सफलता उन्हें गर्व से भर देती है.
वह अक्सर कहते हैं, 'इतने छोटे से कोचिंग सेंटर से दुनिया का सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज निकला- इससे बड़ी खुशी क्या होगी.' फिर वह थोड़ी देर रुकते हैं और मुस्कुराते हुए एक इच्छा जाहिर करते हैं- 'बस, काश बुमराह कभी-कभी यहां आ जाया करें.' शायद वह दिन भी आएगा...
...लेकिन जब भी जसप्रीत बुमराह भारत को जीत दिलाते हैं, तब देश को यह भी याद रखना चाहिए कि इस कहानी की शुरुआत अहमदाबाद के उसी छोटे से मैदान से हुई थी, जहां एक कोच ने भीड़ से अलग दिखने वाले एक लड़के में भविष्य का महान गेंदबाज देख लिया था.
रिपोर्ट - किंशुक कुसारी
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