ये कैसी बुतपरस्ती है? CSK में MS धोनी की विरासत क्यों डगमगा रही है

क्या महेंद्र सिंह धोनी के बिना चेन्नई सुपर किंग्स सफल नहीं हो पाएगी? जब से एमएस धोनी ने कप्तानी छोड़ी है, लग तो ऐसा ही रहा है. क्यूंकि पिछले सीजन और इस सीजन में कहानी पूरी तरह से बदलती दिख रही है, जो सीएसके पूरे आईपीएल का राजा थी वो अब हर पल पर स्ट्रगल कर रही है.

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क्या चेन्नई सुपर किंग्स का सिंघासन बच पाएगा? (AI Generated Image) क्या चेन्नई सुपर किंग्स का सिंघासन बच पाएगा? (AI Generated Image)

मोहित ग्रोवर

  • नई दिल्ली,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 11:02 AM IST

टाइम मशीन में बैठकर सीधा 1996 में पहुंचिए. शिकागो बुल्स का जलवा था और बास्केटबॉल की दुनिया में माइकल जॉर्डन एक भगवान की तरह थे. जॉर्डन ने जब पहली बार रिटायरमेंट लिया, तो शिकागो बुल्स—जो दुनिया की सबसे खतरनाक टीम मानी जाती थी—अचानक एक साधारण टीम बनकर रह गई. फैंस को यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस कोर्ट पर जॉर्डन 'उड़ते' थे, वहां अब सिर्फ शोर बचा है, रूह नहीं. जॉर्डन वापस आए, जीत दिलाई, लेकिन जब वो फाइनल विदा हुए, तो बुल्स को उस सदमे से बाहर निकलने में दशकों लग गए.

ये किस्सा इसलिए ज़रूरी है क्यूंकि कुछ ऐसा ही 'मेन कैरेक्टर एनर्जी' वाला हाल आज के वक्त में चेन्नई सुपर किंग्स यानी CSK का है.

सीएसके सिर्फ एक आईपीएल टीम नहीं है, वो एक इमोशन है जिसका पासवर्ड सिर्फ एमएस धोनी के पास था. जब तक धोनी कप्तानी कर रहे थे, फैंस को हारते हुए मैच में भी 'चिल' रहने की आदत थी, क्योंकि सबको पता था कि 'थाला' है तो कुछ न कुछ जुगाड़ कर ही लेगा. लेकिन अब, जब धोनी ने कमान ऋतुराज को सौंप दी है, तो सीएसके के खेल में वो 'Vibe' मिसिंग लग रही है. आईपीएल 2025 हो या फिर अब आईपीएल 2026, सीएसके ऐसा लग रहा है कि जैसे वनडे वर्ल्ड में जिम्बाब्वे या आयरलैंड की टीम आ गई हो.

विरासत का बोझ: जब ओरा बड़ा हो जाता है
जेन-ज़ी वाले स्टाइल में कहें तो धोनी सीएसके के लिए वो 'कंफर्ट मूवी' थे जिसे हम बार-बार देख सकते थे. अब ऋतुराज गायकवाड़ के पास कैप्टेंसी तो है, लेकिन उनके सिर पर धोनी की लेगेसी का इतना भारी वजन है कि खुलकर सांस लेना मुश्किल है. जब भी सीएसके कोई मैच हारती है, सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ जाती है— ‘धोनी भाई होते तो फील्डिंग ऐसी होती.’ यह तुलना ही नई लीडरशिप की सबसे बड़ा दुश्मन है.

वैसे ये सिर्फ सीएसके की कहानी नहीं है, किसी भी सिस्टम में जब 'मुख्य केंद्र' हटता है, तो केवल एक कुर्सी खाली नहीं होती, बल्कि वो पूरा भरोसा टूट जाता है जिसे बनने में सालों लगे थे. धोनी ने चेन्नई को एक टीम नहीं, एक 'कल्ट' बनाया था. उन्होंने 'प्रोसेस' को भगवान माना और नतीजों को बाय-प्रोडक्ट. लेकिन जब प्रोसेस चलाने वाला ऑपरेटर ही बदल जाए, तो मशीन शोर करने लगती है. और वो शोर अब सीएसके फैन्स को हिट कर रहा है.

दिल टूटने वाले और भी हैं
ख़ेल और पॉप कल्चर ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां एक बड़े लीडर के जाने के बाद पूरी सल्तनत बिखर गई.

1. मैनचेस्टर यूनाइटेड और सर एलेक्स फर्ग्यूसन
फुटबॉल की दुनिया में मैनचेस्टर यूनाइटेड का नाम कभी खौफ का दूसरा नाम था. सर एलेक्स फर्ग्यूसन ने 26 साल तक इस क्लब को अपने बच्चे की तरह पाला. 2013 में उनके रिटायरमेंट के बाद क्लब ने अरबों डॉलर खर्च किए, दुनिया के सबसे महंगे खिलाड़ी खरीदे और टॉप लेवल के कोच (जोस मोरिन्हो, लुई वान गाल) बदले. लेकिन हकीकत ये है कि 13 साल बाद भी यूनाइटेड आज भी अपनी पहचान ढूंढ रही है. फर्ग्यूसन सिर्फ कोच नहीं थे, वो क्लब के 'गॉडफादर' थे. उनके जाते ही खिलाड़ियों में वो 'विजेता वाली मानसिकता' खत्म हो गई. सीएसके के साथ भी यही डर है कि कहीं धोनी के बाद वो भी 'मिड-टेबल' टीम बनकर न रह जाएं. (अभी तो वो भी मुश्किल लग रहा है) 

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सर एलेक्स फर्ग्युसन


2. एप्पल और स्टीव जॉब्स
टेक की दुनिया में स्टीव जॉब्स का ओरा ऐसा था कि लोग एप्पल के प्रोडक्ट्स की पूजा करते थे. 2011 में उनके निधन के बाद टिम कुक ने कमान संभाली. टिम कुक ने कंपनी को आर्थिक रूप से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी बना दिया, लेकिन आलोचक आज भी कहते हैं कि वह 'मैजिक' और वह 'इनोवेशन' जॉब्स के साथ ही चला गया. आज एप्पल सिर्फ फीचर्स बेचता है, विजन नहीं. सीएसके का हाल भी कुछ ऐसा ही है—मैनेजमेंट वही है, जर्सी वही है, लेकिन वो जो मैदान पर 'जादू' होता था, वो अब गायब है.

3. गेम ऑफ थ्रोन्स और हाउस स्टार्क
रीयल लाइफ ही क्यूं अगर फिक्शन की बात करें, तो 'गेम ऑफ थ्रोन्स' में नेड स्टार्क के जाने के बाद जैसा बिखराव हुआ, वैसा ही कुछ हर उस ऑर्गनाइजेशन में होता है जहां लीडरशिप का ट्रांज़िशन सही नहीं होता. जब परिवार का मुखिया जाता है, तो बाकी के सदस्य अपनी-अपनी दिशा में भागने लगते हैं. सीएसके के कोर ग्रुप में भी अब वो तालमेल नहीं दिखता जो 'थाला' के कंट्रोल में रहता था.

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सीएसके की मौजूदा 'सिचुएशनशिप'
ख़ैर छोड़िए लौटकर सीएसके पर आते हैं. फिलहाल टीम एक 'ट्रांजिशन फेज' में है, जिसे आसान भाषा में 'स्ट्रगल' ही कह सकते हैं. ऋतुराज एक बेहतरीन प्लेयर हैं, लेकिन कप्तानी सिर्फ फील्ड सेट करना नहीं होता, वो प्रेशर झेलना होता है. धोनी के टाइम पर खिलाड़ियों को पता था कि अगर वे फेल भी हुए, तो कैप्टन उन्हें 'प्रोटेक्ट' कर लेगा. अब हर खिलाड़ी पर अपनी जगह बचाने का प्रेशर साफ दिखता है.
सीएसके का मिडिल ऑर्डर अब उतना 'क्लच' परफॉर्म नहीं कर पा रहा जितना पहले करता था. ग्राउंड पर वो जो 'डर' विपक्षी टीम के मन में होता था कि "अभी तो धोनी बचा है", वो अब खत्म होता जा रहा है. धोनी की मौजूदगी विपक्षी टीम के दिमाग से खेलती थी; उनके बिना अब विरोधी टीमें ज्यादा निडर होकर खेलती हैं.

इमोशनल अटैचमेंट और 'कैनन इवेंट'
जेन-ज़ी के कल्चर में एक टर्म है 'कैनन इवेंट' यानी ऐसी घटना जिसे टाला नहीं जा सकता और जो आपके कैरेक्टर डेवलपमेंट के लिए ज़रूरी है. धोनी का कप्तानी छोड़ना सीएसके के लिए वही कैनन इवेंट है. फैंस को यह समझना होगा कि इमोशनल अटैचमेंट एक ड्रग की तरह है. जब तक आप पुरानी यादों के नशे में रहेंगे, आप नए लीडर को स्वीकार नहीं कर पाएंगे.

एक घर में भी जब दादाजी या पिता जैसे स्तंभ चले जाते हैं, तो पूरा घर 'रिबूट' होने में वक्त लेता है. शुरुआत में गलतियां होती हैं, बजट बिगड़ता है, फैसले गलत होते हैं, लेकिन यही वो समय होता है जब नई लीडरशिप की नींव पड़ती है. ऋतुराज गायकवाड़ के सामने चुनौती मुंबई इंडियंस या केकेआर नहीं है, उनके सामने चुनौती धोनी की वो 5 ट्रॉफियां और करोड़ों फैंस की उम्मीदें हैं.

सीएसके के लिए वैसे रवींद्र जडेजा वाला चैप्टर भी एक 'कैनन इवेंट' था, जिसने दिखाया कि धोनी की विरासत संभालना कितना रिस्की है. 2022 में जड्डू जैसा वर्ल्ड-क्लास ऑलराउंडर कप्तानी के प्रेशर में ऐसा दबा कि उनकी अपनी 'नेचुरल वाइब' ही क्रैश हो गई. मैदान पर वो कॉन्फिडेंस डर में बदल गया और बीच सीजन कमान वापस धोनी को सौंपनी पड़ी. यह साबित करता है कि 'थाला' के ओरा में नया पौधा पनपना मुश्किल है; अगर आप धोनी बनने की कोशिश करेंगे, तो बिखर जाएंगे. अब यहां मैनेजमेंट की गलती थी या जडेजा की कमी थी, ये फैसला आप खुद ले सकते हैं.

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संघर्ष के टेक्निकल ग्लिच
धोनी की कप्तानी में सीएसके 'स्पिन-टू-विन' थ्योरी पर काम करती थी. धोनी जानते थे कि किस ओवर में किस बॉलर को लाना है और कब कीपर के पीछे से गेम को पलटना है. (एक था जो विकेट के पीछे से मैच पलट देता था वाला मीम) ऋतुराज के पास वो 'विजडम' आने में सालों लगेंगे. हालिया मैचों में हमने देखा है कि आखिरी ओवर्स में फैसला लेने में देरी हो रही है, डीआरएस (धोनी रिव्यू सिस्टम) अब सिर्फ एक आम रिव्यू बनकर रह गया है, और सबसे बड़ी बात—मैदान पर वो 'शांति' नहीं दिखती.

धोनी का कूल स्वभाव पूरी टीम को स्थिर रखता था. अब टीम थोड़ी पैनिक मोड में दिखती है. जब भी रन रेट बढ़ता है, चेहरों पर शिकन साफ दिख जाती है. यह 'पैनिक' ही स्ट्रगल की सबसे बड़ी निशानी है.

आगे का रास्ता: नया अवतार
पुराने किस्से जगजीत सिंह वाली लाइन गुनगुनाते हैं कि लंबी दूरी तय करने में वक्त तो लगता है. बहुत वक्त. मैनचेस्टर यूनाइटेड आज भी फर्ग्यूसन को ढूंढ रही है, एप्पल आज भी जॉब्स की छाया में है. सीएसके के लिए भी यह सफर आसान नहीं होगा, क्योंकि जब आप किसी को भगवान बना देते हैं, तो इंसान बनकर राज करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

सीएसके को अब 'थाला' की छाया से बाहर निकलना होगा. ऋतुराज को 'अगला धोनी' बनने के बजाय 'पहला ऋतुराज' बनना पड़ेगा. टीम मैनेजमेंट को भी यह समझना होगा कि अब पुरानी रणनीतियां काम नहीं आएंगी; अब नए खिलाड़ियों को अपना रास्ता खुद बनाना होगा.

धोनी का जाना (अभी सिर्फ कप्तानी से गए हैं, टीम में हैं) सीएसके के लिए एक 'इमोशनल वैक्यूम' है. यह एक ऐसा खालीपन है जिसे दुनिया का कोई भी टैलेंटेड प्लेयर नहीं भर सकता. लेकिन जिंदगी और खेल दोनों का नियम है—शो मस्ट गो ऑन. सीएसके का संघर्ष अभी चलेगा, फैंस के आंसू अभी और गिरेंगे, और शायद कुछ सीजन ट्राफियां भी हाथ न आएं. लेकिन यही वो समय है जब यह टीम अपनी नई आत्मा तलाशेगी.

आज की सीएसके उस बच्चे की तरह है जिसने अभी-अभी अपनी उंगली छोड़ना सीखा है. वो गिरेगा, घुटने छिलेंगे, लेकिन अंत में उसे खुद ही दौड़ना होगा. फिलहाल, सीएसके को अपनी नई पहचान ढूंढनी है, वरना वो सिर्फ सुनहरी यादों वाली एक टीम बनकर रह जाएगी.

वरना सीएसके के फैन्स तो ये बात कह ही रहे हैं कि:

क्या सितम है कि अब तेरी सूरत,
गौर करने पर याद आती है. — जौन एलिया

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