World Frog Day: इंसानों के लिए क्यों जरूरी हैं मेंढक? खत्म हुए तो न पानी बचेगा न फसल

20 मार्च को विश्व मेंढक दिवस मनाया जाता है. मेंढक ईकोसिस्टम के अहम किरदार हैं – कीड़े खाकर फसलों की रक्षा करते हैं. पक्षियों-सांपों का भोजन बनते हैं. पानी की क्वालिटी का संकेत देते हैं. लेकिन फंगल बीमारी, जलवायु परिवर्तन और रहने की जगह के नुकसान से उनकी संख्या तेजी से घट रही है. भारत में 450+ प्रजातियों में 25% खतरे में हैं.

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मेंढक पूरी दुनिया की फसलों, पानी और फूड चेन के लिए बेहद जरूरी हैं. (Photo: Getty) मेंढक पूरी दुनिया की फसलों, पानी और फूड चेन के लिए बेहद जरूरी हैं. (Photo: Getty)

आजतक साइंस डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 20 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 10:34 AM IST

मेंढक... नाम सुनते ही टर्र-टर्र की आवाज सुनाई देने लगती है. इनपर कई कहावतें फेमस हैं. जैसे- कुएं का मेंढक, बरसात के मेंढक, मेंढकी को जुकाम होना और मेंढक को तालाब में ही आनंद है. लेकिन ये कहावते अपनी जगह हैं. मेंढक हमारे ईकोसिस्टम में बड़ा रोल प्ले करते हैं. इनकी मौजूदगी हमारे भोजन, कृषि और पानी की क्वालिटी पर असर डालती हैं. 20 मार्च को मनाया जाने वाला विश्व मेंढक दिवस इनकी जरूरत को बताता है. 

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मेंढक ईकोलॉजी के कनेक्टर हैं. ये प्रकृति के अहम किरदार हैं, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मेंढकों की संख्या में गिरावट जारी रही तो ईकोलॉजी पर बड़ा असर पड़ेगा.  

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मेंढक दुनिया के सबसे अधिक संख्या वाले उभयचर (amphibians) हैं, जो जल और जमीन दोनों ईकोलॉजी के बीच ब्रिज का काम करते हैं. वे कीड़े खाते हैं. खुद पक्षियों, सांपों व मछलियों का भोजन बनते हैं. इस तरह मेंढक  कीट बायोमास को वर्टीब्रेट बायोमास को बदलने का जरूरी काम करते हैं.

यदि मेंढक गायब हो जाएं, तो कीड़ों की आबादी तेजी से बढ़ सकती है, जिससे फसलों को भारी नुकसान होगा. साथ ही, पक्षियों, सांपों और मछलियों जैसे जीवों के भोजन की सीरीज भी टूट जाएगी.

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मेंढक कई तरह से पर्यावरण और मानव जीवन को लाभ पहुंचाते हैं...

  • कीड़ों का कंट्रोल: खेतों में हानिकारक कीड़ों को खाकर फसलों की रक्षा करते हैं.
  • इंडिकेटर प्रजाति: उनकी सेहत पर्यावरण और पानी की क्वालिटी का संकेत देती है.
  • फूड सीरीज की कड़ी: कीड़ों और बड़ें जीवों के बीच महत्वपूर्ण लिंक हैं.
  • चिकित्सा खोज: उनकी त्वचा से निकलने वाले रसायन नई दवाओं के विकास में उपयोगी हैं.
  • पानी साफ करना: टैडपोल (मेंढक के बच्चे) शैवाल खाकर जलाशयों को साफ रखते हैं.

1980 के दशक से दुनिया भर में  एम्फीबियन की आबादी में तेज गिरावट दर्ज की जा रही है. IUCN की 2023 की ग्लोबल एम्फीबियन असेसमेंट के अनुसार...

  • मेंढकों की 37 प्रजातियां पहले ही विलुप्त हो चुकी हैं. 
  • एम्फीबियन पृथ्वी के सबसे अधिक संकटग्रस्त वर्टिब्रेट समूह हैं.
  • ये मैमल्स, पक्षियों और सरीसृपों से भी अधिक खतरे में हैं.

सबसे बड़ा खतरा: घातक फंगल बीमारी

मेंढकों के लिए सबसे बड़ा ऐतिहासिक खतरा काइट्रिडियोमाइकोसिस नामक फंगल रोग रहा है. यह दो फंगस से फैलता है... 

  • Batrachochytrium dendrobatidis (Bd) — मेंढकों को प्रभावित करता है.
  • Batrachochytrium salamandrivorans (Bsal) — सैलामैंडर को प्रभावित करता है.

यह बीमारी  एम्फीबियन की त्वचा पर हमला करती है, जिससे उनकी सांस लेने और शरीर के इलेक्ट्रोलाइट संतुलन की ताकत खत्म हो जाती है. वैश्विक स्तर पर 60% से अधिक एम्फीबियन प्रजातियां इस बीमारी से प्रभावित हुई हैं. यह बीमारी एशिया में उत्पन्न हुई. मेंढक के पैरों और पालतू सैलामैंडर के व्यापार के जरिए दुनिया भर में फैली.

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क्लाइमेट चेंज और घर पर खतरा

मेंढकों के लिए दूसरा बड़ा खतरा जलवायु परिवर्तन है, जो लगभग 39% प्रजातियों को प्रभावित कर रहा है. मेंढक प्रजनन के लिए मानसून के सटीक समय पर निर्भर होते हैं. यदि समय से पहले बारिश हो जाए और फिर सूखा पड़ जाए, तो उनका प्रजनन चक्र पूरी तरह विफल हो सकता है.

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इसके अलावा, 37% प्रजातियां रहने लायक जगह के नुकसान से प्रभावित हैं. वेटलैंड्स का खत्म होना. जंगलों की कटाई और शहरीकरण के कारण मेंढकों के प्रजनन और भोजन के स्थान तेजी से घट रहे हैं.

भारत में क्या है मेंढकों की स्थिति

भारत में 450 से अधिक एम्फीबियन प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से लगभग 25% खतरे में हैं, जबकि 20% प्रजातियों के बारे में पर्याप्त डेटा ही उपलब्ध नहीं है. हैरानी की बात यह है कि वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट-1972 के तहत केवल 157 में से 6 संकटग्रस्त प्रजातियों को ही संरक्षण मिला है. बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के वैज्ञानिक हुमायूं अब्दुल अली की रिपोर्ट के बाद भारत ने 1987 में मेंढकों के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया था. 

भारत में मेंढकों के प्रकार और संकट दोनों कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित हैं...

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  • पश्चिमी घाट — अलग-अलग प्रकार की प्रजातियां. 
  • पूर्वोत्तर भारत — यहां के मेंढक बेहद सेंसिटिव हैं.  
  • अंडमान और निकोबार द्वीप — स्थानिक (endemic) प्रजातियां. यहां  Purple Frog जैसी दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं, जो भारत की जैव विविधता का अनोखा उदाहरण हैं.

भारत और दुनिया भर में मेंढकों को बचाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं...

  • पश्चिम बंगाल में जोरेपोखरी सैलामैंडर अभयारण्य — भारत का एकमात्र सैलामैंडर अभयारण्य.
  • CSIR-CCMB का मतलब वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद लगातार मेंढकों की मॉनिटरिंग करता है.  
  • दार्जिलिंग का पद्मजा नायडू हिमालयन जूलॉजी पार्क में ब्रीडिंग कराई जाती है. उन्हें बचाया जाता है.  
  • कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डाइवर्सिटी और CITES जैसे वैश्विक समझौते भी  एम्फीबियन के संरक्षण में भूमिका निभा रहे हैं.

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आम लोग कैसे मदद कर सकते हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि आम नागरिक भी इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. iNaturalist जैसे ऐप के जरिए लोग मेंढकों की तस्वीरें और आवाज रिकॉर्ड कर वैज्ञानिकों को डेटा उपलब्ध करा सकते हैं. खासकर मानसून के दौरान यह डेटा बेहद उपयोगी होता है. 

मेंढक केवल एक साधारण जीव नहीं, बल्कि पृथ्वी के  संतुलन का आधार हैं. उनकी गिरती संख्या एक चेतावनी है कि पर्यावरणीय संकट गहराता जा रहा है. यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल मेंढकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी फूड चेन और मानव जीवन को प्रभावित करेगा.                                                                                                        रिपोर्टः अनन्या सिंह

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