तिब्बती पठार दुनिया का सबसे ऊंचा पठार है. लोग सोचते थे कि यह धीरे-धीरे लगातार ऊपर उठता गया. लेकिन अब एक नई रिसर्च ने यह पुरानी सोच बदल दी है. जियोलॉजी जर्नल में छपी स्टडी में पता चला है कि तिब्बती पठार दो बार में तेजी से ऊपर उठा और फिर नीचे बैठा. यह लगातार होने वाला प्रोसेस नहीं था, बल्कि ऊपर-नीचे होने वाले दो स्टेज थे.
वैज्ञानिकों ने दक्षिणी तिब्बत के बेसिन इलाकों में जमा पुरानी मिट्टी और चट्टानों की स्टडी की. इनमें डिट्रिटल जिरकॉन और एपेटाइट नामक खनिजों का एनालिसिस किया गया. इन नमूनों से पता चलता है कि पानी के बहाव वाले सिस्टम बार-बार बदलते रहे. कभी नदियां बाहर की ओर खुली थीं. फिर बंद हो गईं और फिर दोबारा खुल गईं. यह बदलाव पठार के ऊपर उठने और नीचे बैठने को दर्शाता है.
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रिसर्च के अनुसार तिब्बती पठार में दो मुख्य उभार के चरण आए. पहला स्टेज करीब 5.4 से 5.1 करोड़ साल हले हुआ. दूसरा स्टेज करीब 1.5 से 0.8 करोड़ साल पहले हुआ. हर बार ऊपर उठने के बाद पठार कुछ समय के लिए नीचे भी बैठ गया. इससे पहले वैज्ञानिक मानते थे कि पठार लगातार एक ही रफ्तार से ऊंचा होता रहा, लेकिन अब साफ है कि इसमें दो अलग-अलग बड़े पल्स थे. यानी दो बड़ी लहर जिससे ये इतना ऊपर उठा.
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गहरी पृथ्वी के अंदर क्या हुआ?
यह उभार और नीचे बैठना पृथ्वी की बहुत गहरी परत यानी लिथोस्फियर के कारण हुआ. पहला उभार तब हुआ जब पुरानी समुद्री प्लेट (Neo-Tethyan oceanic slab) टूट गई. दूसरा उभार तब हुआ जब भारतीय महाद्वीपीय लिथोस्फियर का एक हिस्सा अलग हो गया.
जब ये गहरी परतें अलग होती हैं तो नीचे से गर्म पिघला पदार्थ (Asthenosphere) ऊपर आता है. इससे जमीन ऊपर उठती है. ज्वालामुखी गतिविधि बढ़ती है. मैग्मा निकलता है. फिर बाद में फिर से भारतीय प्लेट नीचे दबने लगती है जिससे पठार थोड़ा नीचे बैठ जाता है. इस पूरे प्रोसेस को स्लैब ब्रेक-ऑफ और लिथोस्फेयर डिलैमिनेशन कहा जाता है.
जब पठार तेजी से ऊपर उठा तो ऊंची पहाड़ियां बन गईं. इससे बाहर से आने वाली नदियों का रास्ता बंद हो गया. पानी का बहाव बंद हो गया. इलाका बंद बेसिन बन गया. बाद में जब पठार नीचे बैठा तो पुरानी नदियां फिर से सक्रिय हो गईं और बहाव दोबारा शुरू हो गया. वैज्ञानिकों ने इन बदलावों को पुरानी चट्टानों में मिले खनिजों से ट्रैक किया.
यह स्टडी बताती है कि पठार सिर्फ ऊपर नहीं बढ़ता, बल्कि गहरी पृथ्वी की गतिविधियों के कारण ऊपर-नीचे होता रहता है. इससे मौसम, नदियों, पर्यावरण और यहां तक कि हिमालय क्षेत्र की जलवायु पर भी असर पड़ता है. तिब्बती पठार एशिया की कई बड़ी नदियों का स्रोत है, इसलिए इसकी ऊंचाई और आकार का बदलना करोड़ों लोगों के पानी और मौसम को प्रभावित करता है.
आजतक साइंस डेस्क