हमारी आंख दुनिया को उल्टा देखती है... वो तो हमारा दिमाग है जो उसे सीधा करता है

हमारी आंखों का लेंस रोशनी की किरणों को मोड़ता है, जिससे रेटिना पर दुनिया की तस्वीर उल्टी (ऊपर-नीचे और दाएं-बाएं पलटी) बनती है. रेटिना ये संकेत ऑप्टिक नर्व से दिमाग तक भेजता है. दिमाग जन्म से सीखकर इस उल्टी तस्वीर को स्वचालित रूप से सीधी व्याख्या करता है, इसलिए हम दुनिया को हमेशा सीधा देखते हैं.

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आंखों में जो इमारत आपको सीधी दिख रही है वो असल में आंख के अंदर उल्टी बनी हुई है. (Photo: Pixabay) आंखों में जो इमारत आपको सीधी दिख रही है वो असल में आंख के अंदर उल्टी बनी हुई है. (Photo: Pixabay)

ऋचीक मिश्रा

  • नई दिल्ली,
  • 05 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 12:56 PM IST

हमारी आंखें एक अद्भुत कैमरे की तरह काम करती हैं. बाहर की दुनिया से आने वाली रोशनी आंख में प्रवेश करती है. रेटिना नाम की परत पर एक तस्वीर बनाती है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि यह तस्वीर उल्टी (इनवर्टेड) होती है – ऊपर की चीज नीचे और नीचे की चीज ऊपर दिखती है. फिर भी हम दुनिया को हमेशा सीधा ही देखते हैं. इसका राज क्या है? 

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रोशनी आंख में कैसे प्रवेश करती है?

बाहर की किसी चीज (जैसे पेड़) से रोशनी की किरणें आंख में आती हैं. सबसे पहले ये किरणें कॉर्निया (आंख की सामने की पारदर्शी परत) से गुजरती हैं. फिर प्यूपिल (काला गोला) से होती हुई लेंस (आंख का प्राकृतिक लेंस) तक पहुंचती हैं. 

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लेंस एक उत्तल लेंस (कन्वेक्स लेंस) की तरह होता है, जो रोशनी की किरणों को मोड़ता (रिफ्रैक्ट) करता है. उत्तल लेंस की खासियत है कि यह किरणों को क्रॉस करा देता है – ऊपर से आने वाली किरण नीचे जाती है और नीचे से आने वाली ऊपर. इससे रेटिना पर तस्वीर उल्टी बन जाती है.

यह उल्टी तस्वीर रेटिना पर पड़ती है. रेटिना आंख की पीछे की परत है, जहां लाखों प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं (फोटोरिसेप्टर्स) होती हैं. ये कोशिकाएं रोशनी को विद्युतीय संकेतों में बदलती हैं.

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दिमाग का कमाल: उल्टी तस्वीर को सीधी बनाना

ये संकेत ऑप्टिक नर्व (दृष्टि तंत्रिका) से होते हुए दिमाग तक पहुंचते हैं. दिमाग इन संकेतों को प्रोसेस करता है और हमें दुनिया सीधा दिखाता है. असल में दिमाग कोई तस्वीर को पलटता नहीं है. दिमाग में कोई तस्वीर होती ही नहीं – सिर्फ विद्युतीय संकेतों का पैटर्न होता है.

दिमाग जन्म से ही सीखता है कि ऊपर से आने वाली रोशनी रेटिना के नीचे पड़ती है, तो वह ऊपर है. यह सीखना अन्य इंद्रियों (जैसे स्पर्श, गुरुत्वाकर्षण) से मदद लेता है.

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मजेदार प्रयोग: क्या दिमाग फिर से सीख सकता है?

वैज्ञानिकों ने विशेष चश्मे बनाए जो दुनिया को उल्टी दिखाते हैं. जब लोग इन्हें पहनते हैं...

पहले कुछ दिन सब उल्टा लगता है – चलना मुश्किल हो जाता है. लेकिन 4-5 दिनों बाद दिमाग एडजस्ट कर लेता है. सब फिर सीधा दिखने लगता है. चश्मा उतारने पर फिर पहले कुछ समय उल्टा लगता है, लेकिन जल्दी नॉर्मल हो जाता है. यह साबित करता है कि सीधा या उल्टा कोई फिक्स्ड चीज नहीं – दिमाग की व्याख्या पर निर्भर है.

क्यों आंखें ऐसी बनीं?

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यह ऑप्टिक्स का प्राकृतिक नियम है. कैमरा या पिनहोल कैमरा में भी तस्वीर उल्टी बनती है. इवोल्यूशन में यह डिजाइन सबसे अच्छा साबित हुआ. कुछ जानवरों की आंखें अलग होती हैं, लेकिन हमारी आंखों में यह व्यवस्था सबसे कुशल है.

अगली बार जब आप दुनिया देखें, तो याद रखें – आपकी आंखें उल्टी तस्वीर बनाती हैं, लेकिन आपका दिमाग उसे इतनी खूबसूरती से सीधा कर देता है कि हमें पता भी नहीं चलता. विज्ञान वाकई कमाल का है.

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