बगलामुखी माता की जयंती कल... कुंडली में कमजोर है बृहस्पति तो इस मंत्र से करें पूजा

माता बगलामुखी की जयंती बैसाख महीने की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है, जो इस बार 24 अप्रैल को है. पीला रंग माता के स्वरूप और तांत्रिक साधना में विशेष महत्व रखता है, जो ज्ञान, स्थिरता और नकारात्मक ऊर्जा से रक्षा का प्रतीक है.

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माता बगलामुखी की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व है माता बगलामुखी की पूजा में पीले रंग का विशेष महत्व है

विकास पोरवाल

  • नई दिल्ली,
  • 23 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 6:16 PM IST

माता बगलामुखी की जयंती बैसाख महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इस बार यह तिथि 24 अप्रैल यानी शुक्रवार को है. देवी बगलामुखी का यह विशेष दिन है जो सकारात्मक ऊर्जा का दिन बन जाता है. देवी के प्रभाव से कुंडली के ग्रह दोष भी ठीक हो जाते हैं, लेकिन इन सबके बीच जो बात सबसे अधिक रहस्य वाली है, वह है देवी का पीला रंग और उनका सिद्ध गायत्री मंत्र.

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माता को कहा जाता है पीतांबरी देवी
माता बगलामुखी पूरी तरह पीली आभा में दिखाई देती हैं. उन्हें पीला रंग प्रिय माना जाता है. उनकी पूजा-पद्धति, स्वरूप और तांत्रिक साधना तीनों में इस रंग का विशेष महत्व है. यही कारण है कि उन्हें 'पीताम्बरा देवी' भी कहा जाता है. पीला रंग केवल एक साधारण पसंद नहीं, बल्कि उनके दिव्य गुणों और शक्तियों का प्रतीक है.

स्तंभन शक्ति की देवी हैं बगलामुखी
बगलामुखी माता को 'स्तंभन शक्ति' की देवी कहा जाता है. मान्यता है कि वे अपने भक्तों के शत्रुओं की वाणी, बुद्धि और शक्ति को स्थिर कर देती हैं. पीला रंग इसी स्थिरता, संतुलन और नियंत्रण का प्रतीक माना जाता है. यह रंग मन को एकाग्र करता है और नकारात्मक ऊर्जा को रोकने की क्षमता से भी जुड़ा है. इसीलिए माता की साधना में पीले रंग का प्रयोग विशेष रूप से किया जाता है.

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माता की पूजा में हल्दी का बहुत जरूरी है. हल्दी को शुद्धता, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. बगलामुखी साधना में हल्दी की माला से जप, पीले वस्त्र धारण करना और पीले फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है. यह सब उनके पीत स्वरूप के अनुसार ही होता है और साधना को प्रभावी बनाता है.

बृहस्पति ग्रह से है देवी का जुड़ाव
ज्योतिषीय दृष्टि से भी पीले रंग का विशेष महत्व है. यह रंग बृहस्पति ग्रह से जुड़ा है, जिसे ज्ञान, वाणी और बुद्धि का कारक माना जाता है. चूंकि माता बगलामुखी वाणी और विचारों पर नियंत्रण प्रदान करती हैं, इसलिए पीला रंग उनके स्वरूप से गहराई से जुड़ जाता है.

तांत्रिक परंपरा में बगलामुखी साधना को बहुत शक्तिशाली माना गया है. तंत्र शास्त्र के अनुसार, पीले रंग का उपयोग साधक को शीघ्र सिद्धि और सुरक्षा देता है. यही कारण है कि साधक विशेष अनुष्ठानों में पीले वस्त्र पहनते हैं और पीले आसन का उपयोग करते हैं. माता बगलामुखी को पीला रंग इसलिए प्रिय है क्योंकि यह उनकी शक्ति, स्थिरता, ज्ञान और दैवी ऊर्जा का प्रतीक है. उनकी पूजा में इस रंग का उपयोग केवल परंपरा नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक मान्यता और विश्वास का हिस्सा है.

देवी को प्रसन्न करने के लिए और बृहस्पति ग्रह को ठीक करने के लिए आप बगलामुखी गायत्री मंत्र से देवी की पूजा करें, इसका जरूर लाभ मिलता है.

|| ॐ वगलामुख्यै विद्महे स्तम्भिन्यै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् || 

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बृहस्पति से संबंधित है पीला रंग
ज्योतिष में पीला रंग बृहस्पति (गुरु) का प्रतिनिधित्व करता है. बृहस्पति को ज्ञान, वाणी, बुद्धि और धर्म का कारक माना जाता है. माता बगलामुखी का एक प्रमुख कार्य भी वाणी और बुद्धि को नियंत्रित करना है, चाहे वह शत्रु की वाणी को रोकना हो या साधक को सही निर्णय लेने की शक्ति देना. इस तरह बृहस्पति और बगलामुखी माता के गुणों में एक जैसी समानता दिखाई देती है.

माता को चढ़ते हैं पीले प्रसाद
जब कोई व्यक्ति पीले प्रसाद के साथ माता की पूजा करता है, तो यह बृहस्पति की सकारात्मक ऊर्जा को भी सक्रिय करने का प्रतीक माना जाता है. खासकर जिनकी कुंडली में गुरु कमजोर हो, वे बगलामुखी साधना और पीले प्रसाद के माध्यम से लाभ पाने की मान्यता रखते हैं. इसीलिए देवी की पूजा में पीले प्रसाद चढ़ाने की मान्यता है.

माता को चढ़ाया जाने वाला प्रसाद जैसे बेसन के लड्डू, बूंदी, चने की दाल, हल्दी मिश्रित मिठाइयां, ये सभी पीले रंग के होते हैं. हल्दी को शुद्धता, रक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है. जब पीला प्रसाद अर्पित किया जाता है, तो यह माता की 'पीत शक्ति' से जुड़ाव को बढ़ाता है. तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, इससे साधना अधिक प्रभावी होती है और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा मिलती है.
 

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